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बिहार की राजनीति में 'सन ऑफ मल्लाह' की क्यों हो रही इतनी पूछ?

लोकसभा चुनाव 2019 (Lok sabha elections 2019) : बिहार में महागठबंधन में विकासशील इंसान पार्टी (VIP) को 3 सीटें दिए जाने की बात लोगों का ध्यान खींच रही है.

बिहार की राजनीति में 'सन ऑफ मल्लाह' की क्यों हो रही इतनी पूछ?
लोकसभा चुनाव 2019 (Lok sabha elections 2019) : मुकेश सहनी बिहार में मल्लाह (निषाद) समाज के सबसे बड़े नेता बनने की कोशिश में हैं.

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव 2019 (Lok sabha elections 2019) में महागठबंधन का असली रंग बिहार में ही देखने को मिल रहा है. महागठबंधन ने शुक्रवार को ऐलान कर दिया कि कौन सा दल कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा, जिसमें आरजेडी को 20 सीट, एक सीट सीपीआई(माले) को दी जाएगी. कांग्रेस को 9, आरएलएसपी 5, हम 3 और वीआईपी पार्टी को 3 सीट दी गई हैं. इस ऐलानगी में विकासशील इंसान पार्टी (VIP) को 3 सीटें दिए जाने की बात लोगों का ध्यान खींच रही है. राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों के जेहन में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इस नई-नवेली पार्टी को महागठबंधन में 3 सीटें क्यों देनी पड़ी. सवाल उठ रहे हैं कि महागठबंधन के सबसे बड़े नेता लालू प्रसाद यादव जैसे समाज वैज्ञानिक मुकेश सहनी पर इतना बड़ा दांव क्यों लगाया है. आइए इन सवालों का हल ढूंढने की कोशिश करते हैं.

मल्लाह को क्यों मिल रही है इतनी तवज्जो?
बिहार में मल्लाह (निषाद) की आबादी तकरीबन 3-4 फीसदी है. वोट बैंक के हिसाब से यह आंकड़ा मामूली है, लेकिन गठबंधन के दौर में एक-एक वोट की लड़ाई शुरू हो चुकी है. पिछले वोटिंग पैटर्न पर नजर डालें तो बिहार की मुजफ्फरपुर, दरभंगा, औरंगाबाद, उजियारपुर और खगड़िया लोकसभा सीट पर मल्लाह समाज निर्णायक भूमिका में रहे हैं. हालांकि इसमें से केवल मुजफ्फरपुर इकलौती ऐसी सीट है, जहां मल्लाह की आबादी साढ़े तीन लाख से ज्यादा है, यानी यहां इस समाज के लोगों का वर्चस्व है. 

मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट पर 2014 में हुए चुनाव में बीजेपी के अजय निषाद जीते. अजय निषाद को 4,69,295 वोट मिले थे. इससे पहले इस सीट पर अजय निषाद के पिता पूर्व केंद्रीय मंत्री कैप्टन जयनारायण निषाद 4 बार सांसद रहे.

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मल्लाह की सामाजिक-आर्थिक स्थिति
बिहार में मल्लाह अति पिछड़ी जाति (EBC) कैटेगरी में हैं. यानी ये समाज में छूत नहीं हैं. ऊंची जाति के लोगों के साथ इनका उठना-बैठना है. आर्थिक लिहाज से भी इस जाति के लोग थोड़े संपन्न हैं. दरअसल, मल्लाह जाति के लोगों का पुश्तैनी काम मछली पकड़ने से लेकर इन्हें बेचने के कारोबार से जुड़ा है. पिछले दो-तीन दशक में मल्लाहों की बड़ी आबादी शहरों में शिफ्ट हुई है और वे यहीं अपने कारोबार को बढ़ा रहे हैं. 

इस लिहाज से यह समाज काफी हद तक रोजगार से जुड़ा है. माना जाता है कि जो लोग भी समाज में रोजगार पैदा करते हैं वे बड़े तबके को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. उदाहरण के तौर पर अगर किसी मछली कारोबारी के यहां पांच कर्मचारी काम करते हैं तो स्वाभाविक है कि इनमें से एक या दो अपने मालिक से प्रभावित होंगे. इस वजह से माना जा सकता है कि निषाद की आबादी भले ही 3-4 फीसदी है, लेकिन ये समाज के दूसरे लोगों को प्रभाव में लेने में सक्षम हैं.

ओबीसी/ईबीसी जातियों में मल्लाह दिखा रहे दमखम
1990 के दशक में मंडल-कमंडल की राजनीति शुरू हुई थी. इस दौर में बिहार में संख्या बल की ताकत के दम पर यादव समाज (करीब 14 फीसदी) सत्ता हासिल कर पाया, जिसके सबसे बड़े नेता लालू प्रसाद यादव बने. बिहार की ओबीसी/ईबीसी कैटेगरी में शामिल जातियों में शिक्षा और संपन्नता के हिसाब से कुर्मी, कोयरी और बनिया को दूसरे पायदान पर रखा जा सकता है. इस हिसाब से 2000 के दशक की शुरुआत होने पर कुर्मी और वैश्‍य कॉम्बिनेशन ने मिलकर बिहार की सत्ता हासिल की, जो अब तक जारी है. बिहार में कुर्मी की आबादी करीब 3-4 फीसदी ही है. इसके बावजूद नीतीश कुमार सत्ता हासिल करने में सफल रहे. वैष्य समाज बीजेपी के साथ खड़ा हुआ और सुशील मोदी उनके सबसे बड़े नेता बने. इस कॉम्बिनेशन में नीतीश कुमार महादलित बनाकर अनुसूचित समाज के कुछ लोगों को तो बीजेपी रामविलास पासवान को अपने अपने साथ जोड़कर ताकत बनाए हुए हैं.

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एनडीए में नहीं गली मुकेश सहनी की दाल
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बिहार की राजनीति में अचानक से 'सन ऑफ मल्लाह' मुकेश सहनी का नाम उभर कर आया. उस वक्त मुकेश सहनी ने नारा दिया 'आगे बड़ी लड़ाई है, एनडीए में भलाई है.' बताया जाता है कि कि फिल्म इंडस्ट्री में सेट डिजाइन से लेकर फिल्म निर्माण के व्यवसाय से जुड़े मुकेश सहनी के पास काफी संपत्ति है. मूलरूप से दरभंगा के रहने वाले मुकेश सहनी ने साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए का पूरा साथ दिया था. हालांकि बाद में एनडीए में नीतीश कुमार की दोबारा वापसी हो जाने पर मुकेश सहनी जैसे नए नेताओं के लिए वहां कुछ खास अवसर नहीं रह गया था.

इस बीच मुकेश सहनी ने पटना के गांधी में मैदान में राज्यभर के मल्लाह समाज के लोगों एकत्र करके अपनी ताकत का अहसास कराया. वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर बताते हैं कि पिछले दो-तीन दशक में बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव से बड़ा समाज वैज्ञानिक कोई नहीं है. शायद इसी वजह से लालू के बेटे तेजस्वी यादव ने मुकेश सहनी को महागठंधन में शामिल करने और इतनी तवज्जो देने का फैसला लिया है.

सुरेंद्र किशोर कहते हैं कि बिहार में यादव राज कर चुके हैं. कुर्मी और वैश्‍य सत्ता में हैं. इसी कड़ी में ओबीसी/ईबीसी कैटेगरी से आने वाली जाति मल्लाह (निषाद) भी सत्ता में अपनी दखल चाह रही है.

बीजेपी और जेडीयू का साथ देते रहे हैं मल्लाह
पिछले दो दशक में बिहार की राजनीति में मल्लाह बीजेपी और जेडीयू का साथ देते आए हैं. इस वक्त बिहार में मल्लाह समाज के दो बड़े नेता हैं. पहले मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट से बीजेपी के सांसद अजय निषाद तो दूसरे जेडीयू नेता और बिहार सरकार में मंत्री मदन सहनी हैं. मल्लाह समाज खुद को अति पिछड़ी जाति के कैटेगरी से निकालकर दलित वर्ग में शामिल करने की मांग कर रही हैं. वीआईपी पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी भी इसी मांग के साथ निषाद समाज के बड़े नेता बनने की कोशिश में हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने निषादों को अपने साथ जोड़े रखने के लिए निषादों की इस मांग को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार से इन्हें अनुसूचित जाति की कैटेगरी में शामिल करने की सिफारिश कर चुके हैं.

मुकेश सहनी के चेहरे के सहारे तेजस्वी की कोशिश है कि वह मल्लाह के वोटबैंक को एनडीए से अलग कर अपने साथ जोड़ सकें. हालांकि ये तो 23 मई को लोकसभा चुनाव 2019 का परिणाम आने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि मल्लाह समाज किसके साथ है.