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लोकसभा चुनाव 2019: हाजीपुर में पशुपति पारस के लिए है रामविलास पासवान की विरासत बचाने की कड़ी चुनौती

पिछले चार दशक से अधिक समय में पहली बार इस सीट से रामविलास पासवान की बजाए उनके भाई पशुपति कुमार पारस चुनाव लड़ रहे हैं. 

लोकसभा चुनाव 2019: हाजीपुर में पशुपति पारस के लिए है रामविलास पासवान की विरासत बचाने की कड़ी चुनौती
पशुपति पारस हाजीपुर सीट से राम विलास पासवान की जगह चुनाव लड़ रहे हैं. (फाइल फोटो)

हाजीपुरः 'अपने-पराये किसी नेता से आस नहीं है, सीट जनता की होती है, किसी की पुश्तैनी नहीं लेकिन वोट जाति के आधार पर करेंगे.' केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान का गढ़ कही जाने वाली हाजीपुर सीट पर यह विचार आमतौर पर सभी समुदाय के एक बड़े वर्ग में दिख रहा है. 

पिछले चार दशक से अधिक समय में पहली बार इस सीट से रामविलास पासवान की बजाए उनके भाई पशुपति कुमार पारस चुनाव लड़ रहे हैं. पशुपति कुमार के सामने पासवान की विरासत को संभालकर रखने की बड़ी चुनौती है.

पटना की सीमा से महज पांच किलोमीटर दूर तेरसिया गांव केले की खेती के लिये प्रसिद्ध है. यहीं पर नागा मठ के बाहर बैठे किसान जोगेंद्र यादव को महागठबंधन के उम्मीदवार का नाम भी मालूम नहीं है, पर वह कहते हैं, लालू ही जीतेंगे.

गंगा पुल के पास संजय, धर्मेंद्र, संतोष, संजीव राय पेड़ की छांव में टेंपो का इंतजार करते मिले. वे दो टूक कहते हैं, 'अपने-पराये किसी नेता से आस नहीं है. लेकिन फिर भी वोट जाति के आधार पर ही करेंगे.' हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र में आने वाला यह इलाका राघोपुर विधान सभा क्षेत्र का दियारा है. राघोपुर से पहले राबड़ी देवी विधायक रही हैं, अभी तेजस्वी यादव यहां के विधायक हैं. तेरसिया दियर पंचायत में जाति के बाद दूसरा बड़ा मुद्दा शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधा की कमी है.

पेशे से फल व्यापारी लालगंज के रामओतार पासवान कहते हैं कि रामविलास पासवान ने काम किया है और यहां रेलवे का जोनल कार्यालय, होटल मैनेजमेंट संस्थान सहित तकनीकी संस्थान खुलवाये, फ्लाईओवर का निर्माण कराया. लेकिन एक बड़े वर्ग के लोगों का कहना है कि चार दशक तक हाजीपुर का प्रतिनिधित्व करने वाले पासवान के पास अंगुली पर गिनाने लायक ही उपलब्धियां हैं.

हाजीपुर के रामवचन शर्मा का कहना है कि हाजीपुर को आज तक 'माडल टाउन 'बन जाना चाहिए था लेकिन आज भी यह एक छोटे से कस्बे से अधिक कुछ नहीं दिखता. उन्होंने कहा कि नेताओं को समझना चाहिए कि सीट जनता की होती है, पुश्तैनी नहीं.

2019 का लोकसभा चुनाव हाजीपुर के लिए लोगों के लिए थोड़ा अलग होगा. इसका कारण ये है कि 1977 से इस सीट पर लगातार चुनाव लड़ रहे राम विलास पासवान इस बार नहीं होंगे. 42 वर्षों में यहां की जनता ने रामविलास पासवान को आठ बार अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद भेजा हालांकि उन्हें तीन बार पराजय का भी सामना करना पड़ा. राम विलास की यहां से जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण होती थी क्योंकि उनकी जीत का फासला बहुत बड़ा होता था.

इस बार रामविलास ने अपने भाई पशुपति पारस को मैदान में उतारा है. पशुपति पारस इस सीट पर राजग के उम्मीदवार है. वहीं विपक्षी गठबंधन ने शिवचंद्र राम को उम्मीदवार बनाया है और उनकी भी मजबूत पकड़ बताई जाती है. मुख्य मुकाबला इन्हीं दोनों के बीच है. राम विलास पासवान के भाई पशुपति पारस वर्तमान में बिहार सरकार में पशु एवं मत्स्य संसाधन मंत्री हैं. वह लोक जनशक्ति पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष और अलौली विधानसभा सीट से विधायक हैं.

लेकिन इस सीट पर वैशाली से वर्तमान सांसद रामा किशोर सिंह ने पशुपति पारस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. इस बार लोजपा ने वैशाली से रामा सिंह को टिकट नहीं दिया है जिससे वे नाराज बताये जा रहे हैं. वहीं, राजद उम्मीदवार शिवचंद्र राम के लिये टिकट बंटवारे से नाराज चल रहे लालू प्रसाद के बड़े पुत्र तेज प्रताप यादव ने परेशानी खड़ी कर दी है. बताया जाता है कि वह यहां से बालेन्द्र दास का समर्थन कर रहे हैं. राकांपा ने यहां से पूर्व मंत्री दसई चौधरी को उतारकर मुकाबले को रोचक बना दिया है.

जातीय आधार पर इस क्षेत्र में यादव, राजपूत, भूमिहार, कुशवाहा, पासवान और रविदास की संख्या सर्वाधिक है. अति पिछड़ों की भी अच्छी संख्या है जिनकी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

1952 में हाजीपुर सीट पर पहली बार चुनाव हुए थे जिसमें कांग्रेस के उम्मीदवार राजेश्वर पटेल जीते थे. राजेश्वर पटेल ने लगातार तीन बार 1952, 1957 और 1962 में इस सीट का प्रतिनिधित्व किया. 1967 के चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस के वाल्मीकि चौधरी, 1971 में कांग्रेस के ही राम शेखर सिंह जीते थे. 1977 में आपातकाल के बाद हुए चुनाव में राम विलास पासवान यहां से जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव जीते थे. राम सुंदर ऐसे नेता थे जिन्होंने राम विलास पासवान को दो बार इस सीट पर पटखनी दी.