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UP:1 कार्यकर्ता-5 लाभार्थी, मिस कॉल, बस इसी के दम पर BJP ने ढहा दिया जातीय किला

एक कार्यकर्ता को पांच लाभार्थियों की जिम्मेदारी दी गई, जिनसे उन्हें प्रतिदिन मिलना था और जिले के आईटी सेल के एक नंबर पर मिस्ड काल करानी थी. इस काम में पूरे राज्य में लगभग 30 लाख कार्यकर्ताओं को लगाया गया था. इनमें ज्यादातर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े समर्पित कार्यकर्ता थे.

UP:1 कार्यकर्ता-5 लाभार्थी, मिस कॉल, बस इसी के दम पर BJP ने ढहा दिया जातीय किला

नई दिल्ली: दिल्ली का दरवाजा उत्तर प्रदेश से खुलता है. इस समयसिद्ध कहावत को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने लोकसभा चुनाव 2019 (lok sabha elections 2019) के दौरान उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-रालोद का महागठबंधन बन जाने के बावजूद दिमाग में रखा, और ठान लिया कि इस तथाकथित महागठबंधन की गांठ उसे हर हाल में खोलनी और तोड़नी है. इसके लिए उसने चुस्त और दुरुस्त रणनीति तैयार की, जिसमें वह पूरी तरह सफल हुई. भाजपा ने राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 62 पर जीत दर्ज कर हर किसी को चकित कर दिया है.

महागठबंधन की गांठ
दरअसल, किसी भी लड़ाई को जीतने के लिए सेना की जरूरत होती है. थल सेना और वायुसेना दोनों की. यदि क्षेत्र समुद्र से लगा हुआ है, तो नौसेना भी चाहिए. लेकिन यहां भाजपा को जो जमीन जीतनी थी, उसके लिए उसे थल सेना और वायुसेना की जरूरत थी. यानी जमीन पर घुस कर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की और माहौल बनाने के लिए भाषणबाज नेताओं की. भाजपा के पास दोनों थे, बस उन्हें तैनात कर 'एक्टिव मोड' में डालने की जरूरत थी. भाजपा ने ऐसा ही किया.

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30 कार्यकर्ताओं की फौज
पार्टी ने केंद्र की विभिन्न योजनाओं उज्‍ज्‍वला योजना, आयुष्मान भारत, स्वच्छ भारत, प्रधानमंत्री आवास योजना, जनधन योजना, किसान सम्मान निधि से लाभ पा चुके लाभार्थियों की सूची बनाई, और हर शहर, गांव और मुहल्लों में संबंधित कार्यकर्ताओं को सूची पकड़ा दी. एक कार्यकर्ता को पांच लाभार्थियों की जिम्मेदारी दी गई, जिनसे उन्हें प्रतिदिन मिलना था और जिले के आईटी सेल के एक नंबर पर मिस्ड काल करानी थी. इस काम में पूरे राज्य में लगभग 30 लाख कार्यकर्ताओं को लगाया गया था. इनमें ज्यादातर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े समर्पित कार्यकर्ता थे.

वाराणसी से लगे मिर्जापुर के ऐसे ही एक कार्यकर्ता ने आईएएनएस को बताया, "यह हमारी जिम्मेदारी थी. हमें पांच लाभार्थियों की जिम्मेदारी दी गई थी. हमें हर हाल में हर रोज उनसे मिलना था और उन्हीं के मोबाइल से आईटी सेल के नंबर पर मिस्ड काल करानी थी, ताकि पार्टी को पता चल जाए कि हमने अपना काम किया."

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कार्यकर्ता ने नाम जाहिर न करने के अनुरोध के साथ बताया कि पूरे प्रदेश में इसी तरह की व्यवस्था की गई थी. उसने कहा, "आखिर हमें महागठबंधन से लड़ना था, तो इस तरह से काम करना ही पड़ेगा."

कार्यकर्ता ने आगे कहा, "चूंकि हम एक ही आदमी से हर रोज मिलते थे, इसलिए जैसे ही हम उनके पास पहुंचते, वे पहले ही बोल देते कि 'वोट मोदी जी को ही देंगे आप निश्चिंत रहिए'. फिर भी हम उनसे मिस्ड काल कराते थे. उनसे उज्ज्‍वला योजना में मिले गैस-चूल्हे का हाल पूछते, शौचालय और आवास का हाल पूछते. इससे उनके भीतर हमारे प्रति आत्मीयता बनती है."

कार्यकर्ता ने हालांकि यह भी कहा कि यह काम कठिन भी था. उसने कहा, "पहले पार्टी में इस तरह काम नहीं करना होता था. लेकिन अब बहुत मेहनत है. हम ऐसे ही नहीं बोल सकते कि यहां गए थे, वहां गए थे या इनसे मिले, उनसे मिले. अब काम में पूरी पारदर्शिता चाहिए, वरना दूसरे लोग कतार में खड़े हैं."

कुशल प्रबंधन और जमीनी रणनीति
इस पूरी कसरत के सूत्रधार रहे उप्र भाजपा के संगठन महामंत्री सुनील बंसल भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि लगभग 30 लाख कार्यकर्ताओं को प्रचार में लगाया गया था. उन्होंने आईएएनएस से कहा, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजनाएं और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की प्रबंधन कुशलता जमीन पर उतरी और हमें कामयाबी मिली. हमारे संगठन के लगभग 30 लाख कार्यकर्ता पिछले एक साल से योजनाओं के प्रचार-प्रसार में लगे हुए थे."

उन्होंने बताया कि 53 सीटों पर भाजपा का जीतना तय था. 27 सीटों पर कड़ा मुकाबला था और ऐसी सीटों पर ही हमारे प्रबंधन, कार्यकर्ताओं के जोश और उत्साह ने बहुत मदद पहुंचाई. तो भाजपा ने इस तरह जमीन पर अपनी मजबूती बनाई. यह अलग बात है कि आवारा पशुओं की समस्या, खेती की बुरी हालत से किसान परेशान थे, मगर वे ऐसी जमीन भी थे, जहां दूसरी पार्टी के कार्यकर्ता नहीं पहुंच पा रहे थे. भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनसे जुड़ाव स्थापित किया. उन्हें तब तक बार-बार बताया कि मोदी सरकार ने आपके लिए ये काम किया है, जब तक कि उनसे वोट नहीं ले लिया.

लेकिन बात इतने से भी नहीं बनने वाली थी. क्योंकि बेरोजगारी के कारण युवा वर्ग बुरी तरह परेशान और नाराज था. युवाओं को अपने पाले में करने के लिए भाजपा के पास कोई औजार नहीं था. बेरोजगारी 45 साल के सबसे उच्च स्तर पर पहुंच चुकी थी. नोटबंदी और जीएसटी ने कोढ़ में खाज का काम किया था. और सामने सपा-बसपा-रालोद का अपराजेय कहा जाने वाला गठबंधन था.

इसी बीच पुलवामा में बीएसएफ के काफिले पर पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने हमला कर दिया, 40 जवान मारे गए. उसके बाद भारतीय वायुसेना ने बालाकोट में आतंकी शिविर पर एयर स्ट्राइक की. भाजपा और इसके नेताओं ने भाषणों में खुलकर इसका श्रेय लिया और अपनी शौर्यगाथा का बखान किया- 'हमने पाकिस्तान को घर में घुस कर मारा.'

फिर क्या देश में राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा की लहर चल पड़ी. देश की आवाम खासतौर से युवा वर्ग राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर अपनी बेरोजगारी भूलकर मोदी का मुरीद हो गया. जाति की ही नहीं, सारी गांठें खुल गईं. उसके बाद जो हुआ, चुनाव परिणाम के रूप में सामने है. भाजपा अपनी सहयोगी अपना दल के साथ मिलकर उप्र में 62 सीटें जीतने में कामयाब हो गई. सपा-बसपा गठबंधन को मात्र 15 सीटें मिलीं. कांग्रेस एक सीट पर सिमट गई. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी अपनी पारंपरिक सीट अमेठी हार गए.

(इनपुट: एजेंसी आईएएनएस)