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#ZeeNewsGold: भारत की राजनीति के बारे में कुछ ऐसा सोचते थे चंद्रशेखर और अर्जुन सिंह

ZEE NEWS का नया शो ZEE NEWS GOLD. ZEE NEWS GOLD यानी ख़बरों का सुनहरा दौर. ZEE न्यूज के इस प्रयास पर आप अपनी राय #ZeeNewsGold पर ट्वीट करें. जी न्यूज गोल्ड आप हर शनिवार रात 10:30 और रविवार रात 08:30 बजे देख सकते हैं.

#ZeeNewsGold: भारत की राजनीति के बारे में कुछ ऐसा सोचते थे चंद्रशेखर और अर्जुन सिंह

नई दिल्ली: आजकल ख़बरों की भीड़ है. नई ख़बरों की बरसात है. न्यूज़ चैनलों में भी होड़ लगी हुई है. ख़बरों की इस सुपरफास्ट दौड़ में किसी के पास रुक कर असली विषयों को समझने का समय नहीं है. इसीलिए ख़बरों से रिसर्च गायब होता जा रहा है. यही कारण है कि बहुत सारी ख़बरें आपको समझ में नहीं आतीं, क्योंकि उसका संदर्भ आपको नहीं बताया जाता. किसी भी खबर को समझने के लिए उसकी पृष्ठभूमि में, उसके इतिहास में जाना ज़रूरी है. इसलिए आज (6 अप्रैल) से हम ये नई शुरुआत कर रहे हैं. हम कुछ देर के लिए ख़बरों की सुपरफास्ट दौड़ को रोक कर आपको इतिहास में ले चलेंगे. ताकि आप जागरूक बन सकें, किसी भी विषय पर अपनी सही राय बना सकें और सही फ़ैसला ले सकें. 

ZEE NEWS का नया शो ZEE NEWS GOLD. ZEE NEWS GOLD यानी ख़बरों का सुनहरा दौर. ZEE न्यूज के इस प्रयास पर आप अपनी राय #ZeeNewsGold पर ट्वीट करें. जी न्यूज गोल्ड आप हर शनिवार रात 10:30 और रविवार रात 08:30 बजे देख सकते हैं.

ZEE NEWS देश का सबसे पुराना न्यूज़ चैनल है. पिछले 30 सालों से देश में ऐसी कोई घटना नहीं हुई, जो ZEE NEWS की लाइब्रेरी में दर्ज ना हो. आज से हम ZEE NEWS की विशाल लाइब्रेरी आपके लिए खोल रहे हैं. हम आपको ख़बरों के उस स्वर्णिम युग में ले चलेंगे, जहां ज्ञान और अनुभव का ख़ज़ाना है. इस ख़ज़ाने को आप अपने परिवार में, अपने दोस्तों में, अपने पड़ोसियों में और अपने रिश्तेदारों के बीच चाहे जितना बांटें, ये ख़ज़ाना कभी ख़त्म नहीं होने वाला है. तो चलिए टीवी न्यूज़ के उस स्वर्णकाल में- जिसे कहते हैं ''ZEE NEWS गोल्ड''. यानी ख़बरों का ''ख़रा सोना''.

आज से 21 साल पहले ज़ी न्यूज़ पर एक शो आया करता था- जिसका नाम था “दिशा संवाद”. इस कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता थे- पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर.   चंद्रशेखर 10 नवंबर 1990 से 21 जून 1991 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे. लेकिन उनकी अहमियत सिर्फ इतनी भर नहीं है. आज की पीढ़ी चंद्रशेखर के ऊंचे कद का अंदाज़ा इस बात से भी लगा सकती है कि वो कई दलों को मिलाकर बनाई गई जनता पार्टी के अध्यक्ष थे. ये वही जनता पार्टी थी, जिसने 1977 में इंदिरा गांधी को हराकर पहली बार देश में गैरकांग्रेसी सरकार बनाई थी. चंद्रशेखर का रुतबा इतना बड़ा था कि जब विपक्ष के तमाम दल एकजुट हुए तो उनके हाथ में अपनी कमान सौंप दी. 

वही चंद्रशेखर साल 1998 में ZEE NEWS पर एक ऐतिहासिक शो प्रस्तुत किया करते थे. 
21 साल पुरानी इस बातचीत में चंद्रशेखर के साथ थे- स्वर्गीय अर्जुन सिंह. अर्जुन सिंह उस वक्त कांग्रेस के बड़े नेता थे और भारतीय राजनीति का एक बड़ा चेहरा थे. अर्जुन सिंह मध्य प्रदेश के विधायक और मुख्यमंत्री रहे. सांसद रहे. पंजाब के राज्यपाल रहे. और 1991 की नरसिम्हा राव सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री भी रहे. चंद्रशेखर और अर्जुन सिंह की ये बातचीत धर्म और राजनीति के मुद्दे से शुरू हुई. ऐसे में जबकि आपलोग लोकसभा चुनाव के लिए वोट देने जा रहे हैं, ये मुद्दा आज भी प्रासंगिक है.

चंद्रशेखर: क्या हम कभी ये सोचते कि हम लोगों ने जिन्होंने धर्म निरपेक्षता का नारा दिया उन्होंने पूरी तरह से इस पहलु को भुलाकर के केवल एक तरफा बातें की और हमने ये समझ लिया कि धर्म जैसे दकियानूसी नारा ही क्यों रह गया. केवल हिंदू धर्म की बात मैं नहीं कहता हर धर्म को एक दकियानूसी भावना समझकर हमनें कहीं पूरी तरह से धार्मिक भावनाओं की उपेक्षा तो नही की?  उसकी जो सहिष्णुता का रूप था वो लोगों के सामने रखने में हम असफल हो गए. और फिर कट्टरपंथी लोगों को ये खुलकर के नए तरीके से नया खेल खेलना का मौका मिल गया?

अर्जुन सिंह: इसको मैं स्वीकार करता हूं. और इसके लिये किसी न किसी मात्रा में हम सब दोषी हैं और जब इस प्रकार की भावनाएं जनमानस में बनती हैं तो ऐसे ही उदाहरण दिये जाते हैं और ये बताने की कोशिश की जाती है जैसे अमुक-अमुक लोगों के विचार धर्म के विपरीत है. और वो अधर्म को ही अपनी मान्यता का आधार मानते हैं. लेकिन फिर भी मेरी ये मान्यता है कि अंतत: भारत की जो धर्मालु जनता है जो धर्म को मानती है वही सबसे बड़ा इसका संरक्षक होगी हिन्दुस्तान में. इस व्यापक मान्यता को स्थिर करने में कि धर्म अपने लिये है दूसरे को समझने के लिये है, हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिये नही. 

चंद्रशेखर और अर्जुन सिंह. दोनों की बातों पर ध्यान दीजिए. अर्जुन सिंह ने कहा- धर्म हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए नहीं है. चंद्रशेखर ने कहा- धर्मनिरपेक्षता का नारा देने वालों ने केवल इकतरफा बातें की. अब आप खुद से सवाल कीजिए. 21 साल पहले जो हालात थे, उनमें बदलाव आया क्या? क्या धर्म को हथियार बनाने वालों का धंधा मंदा पड़ा? क्या धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इकतरफा विचारों का प्रचार रुका? चंद्रशेखर और अर्जुन सिंह की आगे की बातचीत सुनाने से पहले मैं आपको याद दिला दूं कि खुद सुप्रीम कोर्ट भी ये कह चुका है कि चुनाव के दौरान धर्म, जाति और भाषा के आधार पर वोट देने की अपील नहीं की जा सकती है.

चंद्रशेखर: तो क्या ऐसी जरूरत नहीं कि फिर हम लोग ऐसा प्रयास करें इस देश में कि धर्म को एक औपचारिकता के रूप में एक कट्टरपंथी दृष्टिकोण के रूप में न मानकर मानव के कर्तव्यों का पालन करने की दृष्ट्रि में प्रेरणा देने वाले एक संस्था के रूप हम लोगों के बीच में ले जा सके. 

अर्जुन सिंह: मेरे समझ में इसमें सबसे बड़ा योगदान हमारे देश के धर्मगुरुओं का हो सकता है क्योंकि धर्म की व्याख्या और धर्म के बारे में जानकारी देते हुए धर्म और धर्मांधता के बीच की जो विभाजन रेखा है इसको अच्छी तरह से वे लोग उजागर कर सकते हैं. जो सामान्य लोग हैं राजनीतिक क्षेत्र में काम करने वाले या सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले अगर वो इतना ही करें कि इस विभाजन रेखा को पहले तो स्वयं स्वीकार करे तो वहां से बात शुरू होगी और एक ऐसा समूह निश्चित रूप से बन सकता है.

चंद्रशेखर और अर्जुन सिंह की इस बातचीत में आपको कोई काम की चीज़ मिली क्या? मुझे इसमें देश के एक बड़े विवाद का समाधान दिखाई दे रहा है. अर्जुन सिंह ने चंद्रशेखर से कहा कि हमारे धर्मगुरु समस्याओं के समाधान में बड़ा योगदान दे सकते हैं. ध्यान दीजिए कि ZEE NEWS के इस कार्यक्रम के 21 साल बाद आज देश की सबसे बड़ी अदालत मध्यस्थता के ज़रिये राम मंदिर मुद्दे को सुलझाने की कोशिश कर रही है. ज़ाहिर है ऐसी उम्मीदें काफी पहले से ज़िंदा हैं. यानी देर से ही सही, लेकिन हमारे देश के धर्मगुरु चाहें तो अबकी बार एक मिसाल तैयार कर सकते हैं. लेकिन इसके लिए कट्टरता को किनारे करना होगा.

चंद्रशेखर: धार्मिक कट्टरता तो राजनीति में प्रवेश तभी करती है जब लोग अपनी आवश्यकताओं को पूरा होते या उन पर कम से कम चर्चा होते हुए नहीं देखते और राजनीति को बदलने की जिम्मेदारी हमारे और आप जैसे लोगों पर है ताकि हम एक बार फिर राजनीति को उन सवालों से जोड़ें जिन सवालों से जुड़े रहने का राजनीति का सही मायने में तात्पर्य है. 

अर्जुन सिंह: मैं आपसे पूर्णत: सहमत हूं निश्चित रूप से इन चीज़ों के बारे में राजनैतिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के बीच में सबसे पहले इस पर विचार शुरु होना चाहिए और जब तक कोई कल्पना नही होगी जब तक कोई विचार का धरातल नही होगा तब तक राजनीति केवल उच्श्रंखलता का ही स्वरूप ले सकती है. और जैसा आपने कहा कि वो मुद्दे जो इंसान से जुड़े हैं उसके रोजाना की जिंदगी से जुड़े हैं रोटी कपड़ा मकान से जुड़े हैं उसके भविष्य के लिये क्या चाहता है. कैसे उसको पूरा करें उससे जोडेंगे तो ही हम भारत के भविष्य को स्वर्णिम बना सकते हैं.
 

चंद्रशेखर: हम याद रखें, चाहे जितना भी वैभव की बातें हम करें, चाहे जितना भी उत्थान और विकास की चर्चा हम करें अगर करोड़ों लोग भूखे, बेबस और लाचार रहेंगे तो सरकार को चलाना असंभव हो जाएगा. भूख, बेबसी और लाचारी. 

ZEE NEWS पर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जिस वक्त ये मुद्दे उठा रहे थे, भारत अपनी आज़ादी के पचास साल पूरे कर चुका था. 50 साल किसी भी देश की तरक्की के लिए कम वक्त नहीं होता. लेकिन, आधी सदी के बाद भी अगर भूख, बेबसी और लाचारी से आज़ादी ना मिले तो ज़िम्मेदारी किसकी है ? कम से कम कांग्रेस से तो इस सवाल का जवाब बनता है. क्योंकि शुरुआत के 50 वर्षों में मोरारजी देसाई और वीपी सिंह की सरकारों को छोड़ दें तो हर सरकार या तो कांग्रेस की थी या कांग्रेस के समर्थन से बनी थी. चंद्रशेखर के साथ आगे की बातचीत में शामिल हैं- उस ज़माने में कांग्रेस के एक और बड़े नेता माधव राव सिंधिया. चंद्रशेखर ने माधवराव सिंधिया से पूछा- आखिर देश कैसे चलाया जाए?

चंद्रशेखर: माधवराव जी आज हमारे सामने एक सबसे बड़ा सवाल है कि इस देश को किस तरह से सरकार चलाए ताकि लोगों का विश्वास मिल सके
माधवराव - अच्छी शासन प्रणाली तभी स्थापित हो सकती है जब किसी को ज़िम्मेदार ठहराया जाए. अपने कार्य पद्धति के लिए और जनप्रतिनिधियों को प्रत्येक 5 वर्ष तो आम मत फिर से पाने के लिए आम नागरिक के पास जाना पड़ता है. पर उसकी भी जब वो मंत्री है या शासन में है तो अकाउंटिबिलिटी होनी चाहिए.. वो अकाउंटिबिलिटी है पार्लियामेंट. एक्ज़ीक्यूटिव अकाउंटेबल टू पार्लियामेंट. साथ ही साथ अपने अधिकारी वर्ग जो हैं नौकरशाही.. इनको भी एक अकाउंटिबिलिटी का प्रिंसिपल हमको स्थापित करना होगा.. और मैं सोचता हूं कि रिस्पॉन्स के कुछ मिनिमम स्टैंडर्ड्स कुछ न्यूनतम स्तर हमको तय कर लेने चाहिए.. मेन बेसिस फॉर गुड गवर्नेंस, एक तो समन्वय स्थापित होना ऊपर के लेवल पर और वर्टिकल लेवल पर और अकाउंटिबिलिटी.. ये दो प्रिंसिपल्स अगर हम.. ये दो बुनियादी सिद्धांत अगर हम जमा पाए तो एक अच्छी शासन प्रणाली स्थापित हो सकती है.. और इसके लिए हमें ज़ोर देना चाहिए..

आगे बढ़ने से पहले आपको बता दें कि माधवराव सिंधिया उस वक्त कांग्रेस के बड़े नेता थे. वो 1984 की राजीव गांधी सरकार और 1991 की नरसिम्हा राव सरकार में मंत्री रह चुके थे. खास बात ये कि 1984 के लोकसभा चुनाव में माधवराव सिंधिया ने अटल बिहारी वाजपेयी को हराया था. परिवारवाद के इस दौर में आपको ऐसे कम परिवार मिलेंगे, जिनका ताल्लुक देश की अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों से हो. माधवराव सिंधिया की मां विजयाराजे सिंधिया बीजेपी के संस्थापकों में थीं. उनकी बहन वसुंधरा राजे भी बीजेपी में हैं. लेकिन, माधवराव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया आजकल कांग्रेस के बड़े नेता हैं. इस कार्यक्रम को देखते हुए आपको ये नहीं भूलना चाहिए कि गरीबी माधव राव सिंधिया  के ज़माने में भी एक मुद्दा थी और गरीबी ज्योतिरादित्य सिंधिया के ज़माने में भी एक मुद्दा है. 

चंद्रशेखर: ये बात ज़रूर है कि हमारे देश में नौकरशाही के लोग वो काम नहीं कर पाते जो उन्हें तेज़ी से करना चाहिए. लेकिन क्या इसके लिए हम ज़िम्मेदार नहीं हैं कि हम उन्हें सही दिशा नहीं दे पाते. कभी-कभी राजसत्ता में बैठे हुए लोग ऐसे रास्ते पर नौकरशाही को ले जाने की कोशिश करते हैं जो रास्ता सही रास्ता नहीं है. एक बार उनसे ग़लत काम अगर आपने करा दिया. दस ग़लत काम करने के लिए उनको प्रेरणा मिलती है. 

माधवराव-निश्चित रूप से ज़िम्मेदारी मंत्रियों के ऊपर भी पड़ती है. जो विभाग चलाते हैं, जनप्रतिनिधियों के ऊपर पड़ती है. आजकल मैं समझता हूं जिस तरीके से एक वोटिंग पैटर्न हो गया है.

लोग कार्यक्रम की ओर विचारधारा की ओर प्रोग्राम की ओर कम देखने लगे हैं. दुर्भाग्य से वोट आजकल डाला जा रहा है अधिकतर जातिवाद के आधार पर संप्रदाय को देखते हुए. कभी-कभी कम्यूनल बेसिस पर वोट डाला जाता है. संकीर्ण भावना, एक संकीर्ण दृष्टिकोण भी अपनाया जाता है कहीं-कहीं कुछ इलाकों में इस देश में. इसलिए फिर जो जनप्रतिनिधि आते हैं जिन अपेक्षाओं से उनको चुना गया है उन अपेक्षाओं के अनुसार उनको काम करना पड़ता है. तो उनकी प्राथमिकताएं कुछ अलग हो जाती हैं. आइडियोलॉजी या क्रियान्वयन. प्रोग्राम के क्रियान्वयन को प्राथमिकता नहीं दिया जाता. 

''प्रोग्राम के क्रियान्वयन को प्राथमिकता नहीं देते''- ये बात कही कांग्रेस के एक बड़े नेता ने आज से 21 साल पहले. क्या आज कांग्रेस के लोग प्रोग्राम की, पॉलिसी की बात करते हैं, कार्यक्रमों को आगे कैसे बढ़ाएं इसपर कोई ब्लू प्रिंट तैयार करते हैं? एक ज़िम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाते हैं? आज जब महागठबंधन बनाम मोदी की राजनीति चल रही है, जिम्मेदारी का इतना अभाव क्यों है? बुनियादी सवाल चुनाव की चर्चा से दूर क्यों हैं?

चंद्रशेखर: सरकार को इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि हमारे सामने बुनियादी सवाल क्या है प्राथमिकता किन सवालों को देनी है. हमारे पास साधन कितने हैं और उन साधनों का कितना हम उपयोग कर सकते हैं. हमारे यहां कठिनाई सरकारों के सामने ये है कि प्राथमिकताएं तय करने में हम कहीं ग़लती कर जाते हैं. लोकशाही के जरिए अगर देश को चलाना है तो हमें स्पष्ट रूप से कहना पड़ेगा कि हम अकेले इस देश को नहीं बना सकते. इस देश को बनाने के लिए करोड़ों का सहयोग चाहिए.

देश किसी अकेले के चाहने से नहीं बदल सकता. देश बनता और बदलता है आप जैसे दर्शकों यानी भारतवासियों के सहयोग से. हमें उम्मीद है कि आपको भी आज समझ में आया होगा कि देश के सामने अहम सवाल क्या होने चाहिए. इन सवालों का जवाब जरूरी है क्योंकि आप लोकसभा चुनाव के लिए वोट देने जा रहे हैं. लोकतंत्र में यही मौका होता है, जब आपके लिए अच्छे और बुरे की पहचान बेहद ज़रूरी होती है. यही वो मौका होता है, जब आप अपने भविष्य को सही दिशा दे सकते हैं. ZEE NEWS ये मानता है कि आप चार कदम पीछे चलकर दौड़ शुरू करेंगे तो बेहतर दौड़ेंगे. अगले हफ्ते फिर मिलेंगे. देखते रहिए ZEE NEWS गोल्ड, जहां हर हफ्ते ZEE NEWS की लायब्रेरी से निकालकर हम आपके लिए लाएंगे ख़बरों का खरा सोना.

चंद्रशेखर: इधर कुछ दिनों से हिंदुत्व का नारा जोर से चला है और उस नारे से न केवल देश की राजनीति प्रभावित करने का प्रयास हो रहा है, बल्कि हमारे अतीत की सारी मान्यताओं को एक नया रूप देने का प्रयास चल रहा है. ऐसा लगता है आज हमारे बीच में अर्जुन सिंह हैं, जिन्होंने राजनीति में बहुत दिनों से विभिन्न पदों पर रह कर जिम्मेदारी को निभाया है ऐसे नारों से उनका सीधा परिचय भी है. कभी-कभी नारों को परास्त करने के लिए इन्होंने कठोर कदम भी उठाए हैं. अर्जुन सिंह जी ये जो नारे लगाए जा रहे हैं इसका असर कल के भारत पर क्या होने वाला है जो मिली जुली हमारी संस्कृति है इस सभ्यता को कितना आघात इससे पहुंचने का खतरा है. और इस नारे को आप किस रूप में देखते है.

अर्जुन सिंह: मैं तो मानता हूं कि धर्म निरपेक्षता का मूल हिंदू धर्म से ही निकलता है. कौन ऐसा धर्म है दुनिया में जो किसी दूसरे धर्म के सम्मान की बात नही सोचता है. जो इंसान को इंसानियत के नजर से देखने का इंकार करता है, जो समाज के अंदर परस्पर समानता के आधार पर व्यवहार करने के लिये प्रेरित नहीं करता. तो ये जो समानताएं हैं अगर इनका आपको निचोड़ देखना है तो हिंदू धर्म में है. तो आज हिंदुत्व के नारे को उसका विकृत स्वरूप प्रस्तुत करने की कोशिश हो रही है. आवश्यकता ये है कि हममें से प्रत्येक जो अपनी बात रख सकें..रखना चाहिए हिंदुत्व समाज में किसी प्रकार के बिखराव को उत्पन्न करने के लिये कभी इस्तेमाल नहीं होना चाहिये.