घाटी में एएफएसपीए का पेंच

जम्‍मू-कश्‍मीर में सशस्‍त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) को लेकर केंद्र और राज्‍य सरकार की तरफ से बीते दिनों अपने-अपने पक्ष को लेकर सख्‍त ऐतराज जताया गया और इस पर सियासी गतिविधियां भी काफी तेज हुईं।

बिमल कुमार 

 

जम्‍मू-कश्‍मीर में सशस्‍त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (एएफएसपीए) को लेकर केंद्र और राज्‍य सरकार की तरफ से बीते दिनों अपने-अपने पक्ष को लेकर सख्‍त ऐतराज जताया गया और इस पर सियासी गतिविधियां भी काफी तेज हुईं। कश्‍मीर में कुछ चुनिंदा जिलों से एएफएसपीए को हटाए जाने को लेकर न तो केंद्र सरकार और न ही भारतीय सेना किसी भी सूरत में तैयार दिख रही। वहीं, मुख्‍यमंत्री उमर अब्‍दुल्‍ला इस मसले पर निरंतर अपने तर्क गढ़ते हुए एएफएसपीए को राज्‍य से हटाने पर अडिग हैं। ऐसे में इस संवेदनशील मसले पर टकराव आखिरकार क्‍या रुख अख्तियार करेगी यह अभी तो स्‍पष्‍ट नहीं है, लेकिन इसका जो भी परिणाम होगा, उसका खामियाजा अंतत: राज्‍य की जनता को ही भुगतना पड़ेगा। गौर हो कि एएफएसपीए कश्मीर घाटी में साल 1990 से जबकि जम्मू क्षेत्र में साल 2001 से लागू है। विदित है कि यह कानून सशस्त्र बलों को व्यापक अधिकार प्रदान करता है।

 

अब बड़ा सवाल यह उठता है कि क्‍या इस कानून को वापस लेने से घाटी में सक्रिय अलगाववादी और आतंकी संगठनों की अपनी गतिविधियां तेज करने का मौका मिलेगा। यदि हां, तो इसका मतलब घाटी के लोगों को पुलिस और स्‍थानीय प्रशासन के हाथों असुरक्षित छोड़ने जैसा होगा। तो फिर उस लिहाज से घाटी में इसे जारी रखने की प्रासंगिकता आज भी है।

 

दूसरा पहलू यह भी है कि घाटी में बीते सालों में पर्यटकों की आवाजाही में बढ़ोतरी हुई है और छिटपुट वारदातों को छोड़कर कोई बड़ी आतंकी घटना नहीं हुई है। जो यह संकेत करता है कि वहां स्थितियों में धीरे-धीरे सुधार आने लगा है और जिंदगी अमन की पटरी पर धीरे-धीरे लौटने लगी है। इसमें सेना, सुरक्षा बलों तथा स्‍थानीय प्रशासन व पुलिस के बीच बने तालमेल का योगदान भी कम नहीं है। शायद उसी का नतीजा है कि अब वहां हिंसा में कमी आई है। ऐसे में एएफएसपीए को बनाए रखने की समय सीमा सूबे के हालात पर भी निर्भर करेगी।

 

एएफएसपीए हटाने को लेकर कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के बीच स्थिति काफी विकट भी हुई और यह कैबिनेट में भी पहुंचा। जिस पर कांग्रेस सदस्‍यों ने आपत्ति जताई कि कैबिनेट में मामले पर विचार किए गए बगैर किसी भी मुद्दे को सार्वजनिक करना उचित नहीं है। उसके बाद उमर यह कहने को मजबूर हुए कि सभी मामलों पर कैबिनेट में मशविरा करने के बाद ही उन्‍हें सार्वजनिक किया जाएगा। हालांकि, इस कानून के विरोध का कोई औचित्‍य नहीं दिख्‍ता, क्‍योंकि इसके दायरे में सेना ही नहीं बल्कि सुरक्षा बल भी आते हैं। और सबसे महत्‍वपूर्ण यह है कि हमें पड़ोसी देश के हालात को भी ध्‍यान में रखना चाहिए।

 

कश्‍मीर में सेना एएफएसपीए हटाने का विरोध कर रही है। संभवत: सैन्‍य इतिहास में यह पहला मौका है, जब सेना ने किसी संवेदनशील मसले पर इस तरह से अपनी राय का सार्वजनिक प्रदर्शन किया है। यह भी दीगर है कि घाटी की भौगोलिक स्थिति थोड़ी भिन्‍न है और इसकी अधिकांश सीमाएं आतंकियों को पनाह देने वाले पड़ोसी देश की सीमा के साथ लगती है। ऐसे में सेना को अपनी मौजूदगी बनाए रखने के लिए आधार को और मजबूत करना होगा। सेना यदि इस बात पर अडिग है तो यह सवाल उसके लिए उसके लिए भी महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि सेना के इस रुख से अलगाववादियों की इस बात को भी बल मिलेगा कि राज्‍य सरकार शक्तिहीन है और राज्‍य की असली डोर केंद्र सरकार के पास ही है। कश्‍मीर की जनता भी भलीभांति जानती है कि यदि राज्‍य में हिंसा को बढ़ावा मिला तो खामियाजा आखिर में उसे ही भुगतना पड़ेगा।

 

सेना को विरोध का अधिकार यूनीफाइड कमांड से मिला है। इस कमांड में सेना एक महत्‍वपूर्ण भागीदार है, उसके अलावा इसमें राज्‍य पुलिस और अर्धसैनिक बल भी हैं। सेना को छोड़ दोनों ही राज्‍य से एएफएसपीए हटाने के पक्ष में हैं। चूंकि एएफएसपीए मामला बेहद संवेदनशील है और इसकी समय सीमा को लेकर कोई भी निर्णय सोच समझकर लिया जाना चाहिए।

 

केंद्र सरकार ने एक तरह से उमर अब्दुल्ला को बता दिया कि राज्य में कहीं से भी एएफएसपीए हटाने के प्रस्ताव पर फिलहाल साल भर तक कोई विचार नहीं किया जाएगा। रक्षा मंत्री एके एंटनी ने भी साफ किया कि इतने बड़े फैसले के लिए कोई समय सीमा निर्धारित कर पाना संभव नहीं है। एएफएसपीए एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। यह बात तब उठी जब उमर अब्दुल्ला एएफएसपीए हटाने की मांग पर चर्चा के लिए नई दिल्ली आकर रक्षा मंत्री एके एंटनी से भी मिले। उमर ने यह तर्क भी दिया कि अलगाववादी यह नहीं चाहते हैं कि राज्‍य से यह कानून हटे।

 

वहीं, सेना ने राज्य से एएफएसपीए को आंशिक तौर पर भी हटाने का विरोध किया है। सेना का तर्क यह है कि इससे राज्य में आतंकियों और उनके नेटवर्क के खिलाफ सेना का अभियान प्रभावित होगा। राज्य के जिन चार जिलों से एएफएसपीए को हटाने की बात हो रही है, वह हैं- श्रीनगर, बड़गाम, जम्मू एवं सांबा। राज्‍य सरकार यह तर्क दे रही है कि इन इलाकों में लंबे समय से सेना की कोई सक्रियता नहीं रही, ऐसे में वहां एएफएसपीए को बनाए रखने की कोई आवश्यकता नहीं है। इस मुद्दे पर बहस ने तब जोड़ पकड़ी, जब उमर ने श्रीनगर में घोषणा की थी कि कुछ ही दिनों के भीतर राज्य के कुछ इलाकों से एएफएसपीए हटा लिया जाएगा।

अपने दिल्‍ली दौर में उमर अब्दुल्ला ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, गृहमंत्री और पी. चिदंबरम से भी मुलाकात की। उमर यही कहते रहे कि उनकी यात्रा का मकसद एक कारगर समाधान ढूंढना है। इसके बाद उमर ने थलसेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह से मिलकर सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून और सुरक्षा से संबंधित अन्य मुद्दों पर चर्चा की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। एएफएसपीए पर भाजपा का भी यही कहना रहा कि पाकिस्‍तान के आंतरिक हालात को देखते हुए इस कानून को किसी भी सूरत में वापस नहीं लिया जाना चाहिए। कश्‍मीर में इस कानून के वापस लेते ही आतंकी यहां पनाह लेने लगेंगे।

 

दिल्‍ली से लौटने के बाद उमर ने जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोहरा से भी इस मसले पर चर्चा की। अब देखना यह होगा कि उमर अब्‍दुल्‍ला आगे भी अपनी बात पर अडिग रहते हैं और केंद्र पर दबाव डालकर एएफएसपीए को हटाने के अपना प्रयास जारी रखेंगे। और उनकी यह मुहिम क्‍या वाकई राज्‍य के हित में होगी।

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