शुभता और शुद्धता का प्रतीक दीपावली

कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला दीपावली पर्व हिन्दू धर्म का सबसे अधिक प्राचीन पर्वों में से एक है|

मनोज जैन
कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला दीपावली पर्व हिन्दू धर्म का सबसे अधिक प्राचीन पर्वों में से एक है| इस पर्व को वर्तमान नजरिये से शुद्धता का भी पर्व कह सकते हैं, क्योंकि इस त्यौहार की तैयारी में घर की साफसफाई कर, कूड़े-कचरे आदि से मुक्त कर दिया जाता है| लेकिन यह शुद्धता सिर्फ घर तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसके सांस्कृतिक,आध्यात्मिक,भौतिक और आर्थिक आयाम भी है।
यह त्यौहार प्रकाश का पर्व है इसके साथ अनेक धार्मिक, पौराणिक और वैज्ञानिक मान्यताएं भी जुडी हैं| वहीं शास्त्रों के अनुसार दीपावली पर लक्ष्मी पूजा के दौरान हमारे घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर शुभ-लाभ और स्वस्तिक का चिन्ह बनाया जाना चाहिए| ऐसे पौराणिक मान्यता है कि ऐसा करने से शुभ पक्ष का आगमन शुरू हो जाता है और हमारे जीवन से जुड़े अशुभ पक्षों का खात्मा शुरू हो जाता है। सिंदूर या कुमकुम से शुभ और लाभ लिखने के पीछे ऐसी मान्यता है कि इससे महालक्ष्मी सहित श्री गणेश भी प्रसन्न होते हैं| यह इकलौता ऐसा पर्व है जिसमें भगवान गणेश और मां लक्ष्मी की एक साथ अराधाना होती है।
शुभ लाभ और स्वस्तिक का महत्व
अक्सर हम देखते हैं घरों के पूजास्थल, दीवारों, बही आदि पर शुभ लाभ और स्वस्तिक के चिन्ह बनाये जाते हैं| लेकिन क्या हम यह जानते हैं कि यह क्यों बनाये जाते हैं और इनका हमारे जीवन में क्या महत्व होता है| स्वस्तिक का हमारी भारतीय संस्कृति में बड़ा महत्व है, दीपावली में विघ्नहर्ता गणेश की उपासना धन, वैभव, और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के पूजन के साथ साथ शुभलाभ और स्वस्तिक के पूजन की परंपरा है|
स्वास्तिक को मंगलभावना एवं सुख सौभाग्य का द्योतक माना जाता है| इसे पौराणिक कथाओं में सूर्य और विष्णु का प्रतीक कहा गया है| वहीं ऋग्वेद में स्वास्तिक के देवता सवृन्त का उलेख मिलता है, इसके अनुसार यह मनोवांछित फलदाता सम्पूर्ण जगत का कल्याण करने वाले और देवताओं को अमरत्व प्रदान करने वाले हैं| स्वास्तिक को मूल ब्रह्मांड का प्रतीक बताया गया है जिसके मध्यभाग को विष्णु की नाभि और चारों रेखाओं को ब्रह्मा जी के चार मुख चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरुपित किया गया है| श्रुति, अनुभूति तथा युक्ति तीनो के मिलान से जीवन में एक अद्भुत संगम से प्राणवायु का प्रवाह बिना अवरुद्ध चलता रहता है|
जबकि वास्तुशास्त्र के अनुसार भवन के मुख्य द्वार पर स्वस्तिक बनाकर शुभ-लाभ लिखने से घर में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती है| शास्त्रों और वास्तु के अनुसार कई शुभ चिन्ह बताए गए हैं जो घर से सभी परेशानियों को दूर रखते हैं| इन्हीं चिन्हों में स्वास्तिक ॐ, ॐ नमः शिवाय, श्री गणेश, श्री गणेशाय नम: आदि शामिल हैं। स्वस्तिक के साथ साथ ही शुभ-लाभ का चिन्ह भी सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है, इसके होने से नकारात्मक उर्जा का शमन होता है|
घर-परिवार में शुभता का आगमन होता है और दुख और कष्ट का खात्मा होता है। वैसे तो इन शुभ प्रतीक के चिन्हों का इस्तेमाल कभी भी किया जा सकता है लेकिन दिवाली के मौके पर इसकी महत्ता बढ़ जाती और इसके फल में कई गुना वृद्धि हो जाती है।
इसलिए स्वस्तिक के चिन्ह के साथ ही दीपावली में घर के मुख्यद्वार पर सिन्दूर, रोली और चूना-हल्दी के मिश्रण से शुभ-लाभ लिखा जाता है| इसी कारण मुख्यद्वार पर स्वस्तिक बनाने व शुभ-लाभ लिखने की परंपरा बनाई गई है।
शास्त्रों के अनुसार श्री गणेश प्रथम पूजनीय हैं और शुभ व लाभ यानी शुभ व क्षेम को उनका पुत्र माना गया है| वहीँ स्वास्तिक श्रीगणेश का ही प्रतीक स्वरूप है| यदि स्वास्तिक चिन्ह को घर के मुख्य द्वार पर बनाया जाता है तो घर को बुरी नजर नहीं लगती है| घर में रुपये-पैसे रखने के स्थान, तिजोरी में भी शुभ लाभ को स्वास्तिक के चिन्ह के साथ लिखा जाना धन धान्य से परिपूर्ण रखता है।
पौराणिक महत्व
लोग अक्सर कहते पाए जाते हैं कि यह कोई पौराणिक त्यौहार नहीं है, इस पर अविश्वास जताते हैं| ऐसे लोग तर्क में कहते हैं कि यह एक मात्र छुट्टी का दिन है, जिस दिन सभी भारतीय खुशी मानते हैं, पटाखे फोड़ते हैं, लोगों से मिलते हैं| इसलिए ऐसे लोगों के अनुसार, इस तरह यह मात्र एक एक खुशी मनाने का विशेष दिन है और कुछ नहीं| लेकिन यह सत्य नहीं है क्योंकि इस दिन असत्य, अहंकार पर विजय प्राप्त कर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम अयोध्या नगरी आये थे और दीप जलाकार और मिठाईयां बांटकर उनका स्वागत किया गया था|
इसलिए इससे यह बात सिद्ध होती है कि यह एक पारंपरिक अनुनयन परंपरा से वर्तमान तक आया है| और इस तरह से पौराणिकता और धार्मिक प्रासंगिकता पर भी प्रश्न चिन्ह नहीं उठाये जा सकते हैं| क्योंकि प्राचीनकाल में चलने वाली गुरु-शिष्य परम्परा के कारण ही आज वेदों को देख पा रहे हैं जिन्हें कालांतर में भोजपत्रों पर अंकित किया गया था| उसी तरह यह त्यौहार भी हम तक एक यात्रा करके ही पहुंचा है|
इसी तरह दीपोत्सव के दिन लक्ष्मी-गणेश पूजन का भी एक इतिहास है जिसका वर्णन हमें प्राचीन धर्म ग्रंथो में मिलता है| पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन दैत्य-दानव के बीच हुए समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी प्रकट हुई थी| पौराणिक धार्मिक ग्रंथों के प्रसंग के मुताबिक दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण ही देवराज इंद्र को लक्ष्मी का विसर्जन समुद्र में करना पड़ा था| इस परिस्थिति से देवता बलहीन हो राक्षसों के प्रकोप को झेलने को विवश हो गए|
फिर देवगणों ने विष्णु से प्रार्थना कर समुद्र मंथन किया और लक्ष्मी जी पुनः प्रकट हुई और इसी दिन को दीपोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा| यह घटना भी वर्तमान की नहीं अपितु शायद हजारों वर्ष पहले हुई थी जो समय परिक्रमा कर ही हम तक पहुंची हैं| वहीं मार्कंडेय पुराण के अनुसार लक्ष्मी का पूजन सर्वप्रथम स्वयं नारायण ने स्वर्ग में किया था इसलिए इन प्रसंगों से भी दीपोत्सव की धार्मिक पौराणिकता और ज्यादा पुष्ट होती है।
इस तरह कई पौराणिक घटनाएं है जिनका इस पर्व से सम्बन्ध जोड़ा जाता है| जैसे कठोपनिषद में यम नचिकेता का एक प्रसंग वर्णित है कि नचिकेता जन्म-मरण के रहस्य से अवगत हो, यमलोक से वापस भूलोक आ रहे थे| इसी खुशी में भूवासियों ने दीप जलाकर नचिकेता का स्वागत किया था| कहा यह भी जाता है कि यही आर्यावर्त की पहली दीपावली थी| इस प्रसंग को अगर हम वर्तमान के परिदृश्य में देखें तो हमें पता चलता है कि जन्म और मृत्यु कुछ नहीं बल्कि दो बिन्दु है जिसमे एक आरम्भ और दूसरा अंत है| जिससे हमारे प्राण वायु नहीं बंधे हुए हैं बल्कि वह इस पथ से मुक्त है|
अतः यह मात्र पौराणिक धार्मिक पर्व न होकर बल्कि ज्ञान के विस्तार का भी पर्व है जिससे हमें पता चलता है कि हम अन्धकार की ओर नहीं अपितु हर क्षण ज्ञान के प्रकाश के ओर ही जा रहे हैं| और साथ ही हमें यह पर्व यह भी बताता है कि सांसारिक सुखों से ऊपर भी एक सुख है, यह सुख है बंधुत्व और समेकता का, जिसकी वर्तमान संसार को बहुत अधिक आवश्यकता है| ‘हर कोना रोशन हो जाये, कुछ ऐसे ज्ञान के दीप जलें’ यही इस पर्व के पौराणिकता का मूल बिंदु है|
सांस्कृतिक महत्व
दीपावली का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है क्योंकि यह धन के पूजन का दिन है| वर्षों से इसी दिन नए बही खातों का पूजन, अपनी चल-अचल सम्पदा पर दीप प्रज्वलित किये जाते रहे हैं| यह पर्व आपके आधिपत्य और ऐश्वर्य का भी प्रतीक है, जिसे इस संसार में मान सम्मान का प्रतीक माना जाता है| इसलिए यह पर्व भूलोकवासियों के लिए सुख समृद्धि के लिए भी मनाया जाता है| इस संसार में सांसारिक सुखों का भोग धन के बिना नहीं प्राप्त किया जा सकता है| अतः धनवान व्यक्ति उसी को कह सकते हैं जिस पर समृद्धि, स्वास्थ्य और ज्ञान के दीप जलें हों| इसीलिए लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती का पूजन किया जाता है इस दिन, लक्ष्मी समृद्धि, गणेश शारीरिक स्वस्थता और सरस्वती ज्ञान प्रदान करती हैं|
इसके अलावा यह पर्व पृथ्वी पर बंधुत्व को भी बढ़ता है क्योंकि इस दिन सभी लोग बैर-भाव भुलाकर एक दुसरे के गले मिलकर मिठाईयां देते हैं| जो संबंधों को प्रगाढ़ बनता है क्योंकि मिष्ठान को शुभता का प्रतीक मन जाता है इसी कारणवश कोई भी शुभ कार्य मिष्ठान के बिना संपन्न होता है| वर्तमान समय के नजरिये से देखें तो पता चलता है कि दीपावली अब मात्र दीपों के प्रज्वलन की संस्कृति नहीं रही है बल्कि एक मिलन समारोह की तरह इसने एक नई संस्कृति को जन्म दे दिया है| क्योंकि वर्तमान समय में लोग अपने घरों से बहुत दूरी पर कार्य करने लगे हैं जिससे उन्हें अपने सभी परिवारजनों से मिलने के लिए दीपावली एक महत्वपूर्ण त्यौहार बन गया है|
इसके साथ ही इसे विजय और शौर्य के पूजन के तौर पर भी देखा जा सकता है, क्योंकि इसी दिन भगवान राम लंकापति रावण पर विजय प्राप्त कर वापस अपने धाम आये थे| इसीलिए पूजन के समय इस दिन सभी लोग राम की ही तरह जीवन के हर क्षेत्र में विजय श्री प्राप्त करने के लिए संकल्प लेते हैं| और अपने शत्रुओं को परास्त करने के लिए इस दिन लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती का पूजन कर अपनी सफलता की कामना करते हैं|
वैज्ञानिक महत्व
दीपावली पर्व को हमारे ऋषि मुनियों ने सिर्फ ऐसे ही मस्ती या बस छुट्टी के लिए नहीं बनाया था| बल्कि इसके पीछे उनकी वैज्ञानिक सोच का रहस्य था| हम जानते ही हैं कि दीपावली त्यौहार बरसात के महीने की समाप्ति और जाड़े की शुरुआत में मनाया जाता है| अधिकतर लोग दीपावली से ही गर्म कपड़ों का इस्तेमाल भी आरम्भ करते हैं| अर्थात यह एक ऋतु के आगमन का समय होता है, और दूसरी ऋतु के जाने का| और अगर हम गौर करें तो पायेंगे कि यह धान की फसल के काटने का भी समय होता है अर्थात हमारा अनाज खेतों से उठकर हमारे घर आ रहा होता है| जिसके लिए हमें साफ-सफाई आदि की आवश्यकता होती है, क्योंकि यह अनाज ही हम पूरे साल उपयोग में लाते हैं|
इसी तरह ठंड से पहले बारिश और गर्मी गुजर चुकी होती हैं जिसमे गर्मी में धूल-हवा आदि के कारण पूरा घर गन्दा हो जाता है और रही सही कमी बारिश पूरी कर देती है जब घरों में सीलन, पानी का जमाव, दीवारों पर से रंग- रोगन उतर जाते हैं जिससे घर और वातावरण श्री विहीन लगने लगता है। वास्तु शास्त्र में कहा गया है कि घर के रंग रोगन के क्षरण से वास्तु दोष लगता है। घर पर जमी हरी घास, काई आदि के कारण घर के सदस्यों का सम्मान घटता है| इसीलिए यह दीपों का त्यौहार दीपावली हमें वास्तु दोषों से भी बचाता है जिससे घर में सुख और समृद्धि आती है|
साथ ही गर्मी के बाद का बरसात के मौसम में ही सबसे अधिक बीमारियां पनपती हैं जिनका सीधा सम्बन्ध हमारे स्वास्थ्य से होता है| क्योंकि इस मौसम में मच्छर, मक्खी भी अन्य मौसम की अपेक्षा अपनी संख्या तेजी से बढ़ाते हैं जो हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करता है| साथ ही इस मौसम में पेट सम्बन्धी रोगों का संक्रमण तेजी से फैलता है जिनका भी विनाश दीपावली में साफ-सफाई के कारण हो जाता है| घर के कूड़े-कचरे में जमे कीटाणु-विषाणु से भी इसी दीपों के पावन पर्व पर निजात मिल जाती है|
इससे इतर हम दीपावली में उन स्थानों पर भी रोशनी से करते हैं जो हिस्से इस दिन के बाद शायद ही रोशनी के दर्शन पाते हों| घरों में बहुत से ऐसे स्थान और कोने होते हैं जहां हम उस दिन साफ-सफाई कर दीपक जलाते हैं जिससे वहां के वातावरण में बदलाव होता है और वहां बैठे तिलचट्टे और ऐसे ही अन्य जीव जंतुओं से छुटकारा मिलता है|
साथ ही हम वर्ष भर प्रयोग में लाये गए किसी भी प्रकार के यंत्रों की मरम्मत भी इसी पर्व से पहले करवाते हैं, क्योंकि यह त्यौहार हमारे रहन सहन के अधिक करीब होता है। इस तरह दीपावली का पर्व हमारे जीवन में जाने अनजाने ही सही लेकिन इतनी अच्छाईयों को लाता है| यही कारण है कि इस पर्व की परंपरा वैदिक काल से लेकर अब तक चली आ रही है क्योंकि यह मात्र एक धार्मिक पर्व न होकर वैज्ञानिक तथ्यों के उजाले में रख कर किया गया प्रयोग है| जिसे हम अपनी धार्मिक भावनाओं और श्रद्धा के साथ, सांस्कृतिक तौर पर जीवन को नये उजालों से आलोकित करते हुए और वैज्ञानिक स्तर पर सभी प्रयोगों को जीवन उपयोगी पाते हुए हम हर साल दीपावली मनाते हैं|
अतः इस प्रकार दीपावली एक सम्पूर्ण पर्व है जो जीवन के सभी क्षेत्रों में लाभ ही देता है, बशर्ते यदि पटाखों से दूर ही रहा जाये तो| क्योंकि यह न सिर्फ शोर करते हैं बल्कि जहरीला धुआं उगल कर हमारे वातावरण को भी दूषित करते हैं|
और अंत में आप सभी को दीपावली की शुभकामनाएं, इस दीपावली आपके जीवन में भी जगमगाता प्रकाश, सुख और समृद्धि बनकर आये|

(लेखक देश के जानेमाने वास्तुविद और औरा रीडर हैं और प्रस्तुत लेख में उनके निजी विचार हैं।)