84 कोसी परिक्रमा बना सियासत का कुरुक्षेत्र

मर्यादा पुरुषोत्‍तम राम की नगरी अयोध्या एक बार फिर से सियासत का कुरुक्षेत्र बनने की ओर अग्रसर है। सियासी गर्मी का जिक्र यहां सवालों से ही शुरू करते हैं। क्‍या अयोध्‍या की 84 कोस की परिक्रमा से ही आगामी आम चुनाव यानी लोकसभा चुनाव 2014 को नापने की तैयारी की जा रही है।

बिमल कुमार

मर्यादा पुरुषोत्‍तम राम की नगरी अयोध्या एक बार फिर से सियासत का कुरुक्षेत्र बनने की ओर अग्रसर है। सियासी गर्मी का जिक्र यहां सवालों से ही शुरू करते हैं। क्‍या अयोध्‍या की 84 कोस की परिक्रमा से ही आगामी आम चुनाव यानी लोकसभा चुनाव 2014 को नापने की तैयारी की जा रही है। हालांकि यह मुद्दा तो पुराना है, मगर अब इसे दूसरे सिरे से फिर सुलगाने की कोशिशें की जा रही है। हो सकता है कि इसके पीछे सियासत का राजनीतिक ध्रुवीकरण करने का मकसद छिपा हो, मगर मसला खासा विवाद का रूप ले चुका है। चूंकि जिस राज्‍य की सीमा में इस यात्रा को अंजाम दिया जाना है, वहां की सरकार इसके खिलाफ है। दो दशक पहले का सियासी बवंडर फिर से कहीं उठ खड़ा न हो, इसलिए उत्‍तर प्रदेश सरकार ने विश्‍व हिंदू परिषद की इस यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया है। वहीं, विहिप इस यात्रा को निकालने को लेकर पूरी तरह कमर कस चुकी है। संतों और धर्माचार्यों के सहयोग से यात्रा को परवान चढ़ाने के लिए तारीख की भी घोषणा की जा चुकी है।
देखने वाली बात यह होगी कि इस यात्रा से भारतीय जनता पार्टी को कितना लाभ पहुंचेगा। विहिप और राज्य सरकार के टकराव के बीच अब इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भी कूद पड़ा है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं।
अयोध्या से विहिप की प्रस्तावित यात्रा पर उत्तर प्रदेश सरकार के प्रतिबंध के चलते पैदा हुए विवादों के बीच समाजवादी पार्टी और भाजपा पर मैच फिक्सिंग के आरोप भी लगने लगे हैं। वहीं, भाजपा कह रही है कि वह यात्रा पर प्रतिबंध के पक्ष में नहीं है। विहिप और आरएसएस की चाहत यह है कि अखिलेश यादव सरकार यात्रा पर प्रतिबंध के अपने फैसले पर फिर से विचार करे। वहीं, प्रतिबंध के आदेश को धता बताते हुए यात्रा पर आगे बढ़ने के लिए संघ परिवार इकाई की धमकी के मद्देनजर कांग्रेस ने भाजपा पर चुनावी बढ़त के लिए ‘सांप्रदायिकरण और धुव्रीकरण’ की नीति अपनाने का आरोप भी जड़ा।
बहरहाल, विश्व हिंदू परिषद के अयोध्या में चौरासी कोसी यात्रा के एलान से सियासी तपिश का असर हिंदूवादी संगठनों पर भी दिखने लगा है। अखिल भारत हिंदू महासभा ने यात्रा को धार्मिक नहीं सियासी करार देते हुए सपा-भाजपा की मिलीभगत का सुनियोजित कार्यक्रम बताते हुए विरोध का फैसला लिया वहीं शिवसेना कंधे से कंधा मिलाकर साथ देने को आतुर नजर आ रही है।
इसमें कोई संशय नहीं है कि चौरासी कोसी यात्रा निकालकर राजनीतिक लाभ लेने का तानाबाना बुना गया है। चूंकि इस यात्रा के निकालने के समय को लेकर विवाद उत्‍पन्‍न हो रहा है। सभी के दिमाग में एक ही बात गूंज रही है, वह है आम चुनाव।
हालांकि, इस समय चौरासी कोसी यात्रा को हिंदू समाज की जागृति करार दिया जा रहा है, जिसे संतों को पूरा समर्थन प्राप्‍त है।
सियासत की इस अयोध्या रूपी बिसात पर विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) जहां अपनी 84 कोसी परिक्रमा को लेकर अडिग है वहीं राज्य सरकार ने भी इस परिक्रमा को रोकने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। आरएसएस की ओर से खुलेआम यह घोषणा कर दी गई है कि संतों का पूरा सहयोग किया जाएगा। 84 कोसी परिक्रमा जिन छह जिलों से गुजरनी है वहां संघ ने अपनी पूरी ताकत लगा दी है।
विहिप के साथ ही संघ भी 84 कोसी परिक्रमा के बहाने अपनी खोई हुई जमीन हासिल करना चाहता है। यदि यह यात्रा सफल रहती है तो जनाधार के तौर पर भाजपा को लाभ अवश्‍य मिलेगा। यात्रा के बाद सियासी ध्रुवीकरण की संभावना काफी प्रबल हो जाएगी। परिक्रमा पर प्रतिबंध लगने के बावजूद विहिप ने संतों की भीड़ जुटाने के लिए खासा जोर लगाया है। इस समय अयोध्या में लगने वाले सावन मेले में करीब पांच हजार से अधिक संत अन्य राज्यों से यहां आए हुए हैं। जिनके यात्रा में शामिल होने की उम्‍मीद है। विहिप की रणनीति का अंदाजा लगाते हुए प्रशासन भी अयोध्या में बाहर से आए साधु संतों को वापस भेजने की रणनीति बना रहा है। संभवत: प्रशासन को भी इस बात का अंदाजा है कि बाहर से आए हजारों संत विहिप की ताकत बन सकते हैं। सरकार पर कुतर्कों के सहारे संतों की यात्रा पर रोक लगाने का आरोप लगाया जा रहा है।ऐसे में क्‍या सरकार को संतों को परिक्रमा करने की इजाजत देनी चाहिए।
राम मंदिर आंदोलन के नाम पर देश में किस तरह सियासी सरगर्मी बढ़ी थी, ये सबको पता है। जिसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा बाद में सत्‍ता की सीढि़यों पर चढ़ी। अब 84 कोसी परिक्रमा को लेकर एक नया सियासी तानाबाना बुना जा रहा है। हालांकि भाजपा ने पूरी तरह अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। भाजपा की तरफ से अभी सिर्फ इतना ही कहा जा रहा है कि परिक्रमा पर सरकार रोक नहीं नहीं सकती। मगर यह साफ है कि भाजपा इस मसले पर ज्‍यादा मुखर न होते हुए भी बहुत कुछ साधने की फिराक में है। यह तो अब समय ही बताएगा कि देश की सियासत में इस यात्रा का असर क्‍या होता है और कितना `फर्क` पड़ता है।

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