‘हिंदी को सरकारी फाइलों से बाहर निकालें’

हिंदी के उत्थान के लिए उसे जनसाधारण की भाषा बनाने और सरकारी फाइलों से बाहर निकालने की मांग करते हुए यहां विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी विद्वानों ने पुरजोर तरीके से इस बात को रेखांकित किया कि केवल हिंदी के जरिए ही देश में लोकतंत्र को मजबूती प्रदान की जा सकती है।

जोहानिसबर्ग : हिंदी के उत्थान के लिए उसे जनसाधारण की भाषा बनाने और सरकारी फाइलों से बाहर निकालने की मांग करते हुए यहां विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी विद्वानों ने पुरजोर तरीके से इस बात को रेखांकित किया कि केवल हिंदी के जरिए ही देश में लोकतंत्र को मजबूती प्रदान की जा सकती है।
इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए हिंदी भाषा के तकनीकी और शैक्षणिक विशेषज्ञों ने इस क्षेत्र में नए अनुसंधान को बढ़ावा देने और नवीन तकनीक तक जन साधारण की पहुंच सुनिश्चित किए जाने पर बल दिया।
जनसाधारण और हिंदी भाषा के बीच की बढ़ती दूरी के लिए ‘‘हिंदी के सरकारीकरण’’ को जिम्मेदार ठहराते हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में विद्वानों ने रविवार को कहा कि सरकार की फाइलों पर चलने वाली भाषा कभी जनसाधारण की भाषा नहीं बन पाती है।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति और प्रख्यात कथाकार विभूति नारायण ने सम्मेलन में ‘महात्मा गांधी की भाषा दृष्टि और वर्तमान का संदर्भ’ विषय पर आयोजित सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा, सरकार की फाइलों पर चलने वाली भाषा कभी जन साधारण की भाषा नहीं बन पाती है।
उन्होंने कहा कि जब हम गांधी जी की भाषा दृष्टि पर सोचते हैं तो हमें सबसे पहले दूसरी भाषाएं सीखने के प्रति उदार होना होगा। हिंदी सम्मेलन में कल हिंदी के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय और बालकवि बैरागी समेत कुल 18 भारतीय और 30 विदेशी हिंदी विद्वानों को भी सम्मानित किया जाएगा।
महात्मा गांधी द्वारा गुजरात के भरूच में हिंदी भाषा को लेकर उठाए गए पांच सवालों का जिक्र करते हुए वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय ने हिंदी समाज की खामियों पर कहा कि हमने अपनी बोलियों और उर्दू से एक तरह से कन्नी काट ली है।
प्रख्यात आलोचक विजय बहादुर सिंह ने कहा कि गांधी जी आज की पीढ़ी के लिए बीते दिनों के हो गए हैं जबकि सचाई यह है कि आज भी हम विचार के लिए गांधी जी के पास ही जाते हैं क्योंकि गांधी की चेतना की डोर समाज से जुड़ी हुई थी।
जाने माने चिंतक नंदकिशोर आचार्य ने कहा कि अंग्रेजी आज हमारे देश में एक तरह की हिंसा का प्रसार कर रही है। वह हमारे मूल्यों को भी तेजी से नष्ट कर रही है। नेल्सन मंडेला सभागार के नीति कक्ष में आयोजित तकनीकी सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि हिंदी भाषा में एकरूपता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदी भाषा के प्रसार के लिए आम आदमी को ध्यान में रखकर सहज तकनीकी उपकरण विकसित किए जाने की जरूरत है ।
इस अवसर पर भाषाविद परमानंद पांचाल ने कहा कि हिंदी के सामने संकट यह है कि लोगों में लेखन की प्रवृति कम हो रही है। उन्होंने कहा कि औद्योगिक क्रांति के बाद सूचना का्रांति ही दुनिया की सबसे बड़ी क्रांति है और हिंदी को सूचना प्रौद्योगिकी के जरिए मजबूत करने की जरूरत है।
प्रख्यात विद्वान और दक्षिण अफ्रीका में हिंदी की अलख जगाने वाले हिंदी के कीर्ति स्तंभ पंडित नरदेव नरोत्तम वेदालंकार की प्रतिमा का भी आज यहां ‘गांधीग्राम’ के नेल्सन मंडेला सभागार में अनावरण किया गया। हिंदी भाषा की सूचना प्रौद्योगिकी और तकनीकी विकास से जुड़े भारत के शीर्ष तकनीकी विशेषज्ञों ने इस मौके पर इस बात से सहमति जतायी कि हिंदी में शिक्षण और प्रशिक्षण की नवीन विधियां विकसित करने की आज महत्ती जरूरत है।
सम्मेलन में ‘लोकतंत्र और मीडिया की भाषा के रूप में हिंदी’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में दिल्ली विश्वविद्यालय के वेदप्रकाश मिश्र ने कहा कि मीडिया का भाषा के साथ आत्मीय संबन्ध होता है। इस लिहाज से हिंदी में ही वह पूरी क्षमता है जिससे एक मजबूत लोकतंत्र की स्थापना हो सके।
कोलकाता विश्वविद्यालय के राम अहलाद चौधरी का कहना था कि लोकतंत्र को मजबूत करने और मीडिया का प्रभाव बढ़ाने में हिंदी की सार्थक भूमिका है।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के शोधकर्ता बच्चा बाबू ने कहा कि आज का विमर्श हिंदी की लोकतांत्रिक स्थिति की बजाय हिंदी के लोकतंत्र पर ज्यादा केंद्रित होता जा रहा है जबकि जरूरत इस बात की है कि हिंदी को कैसे लोक विमर्श की भाषा के रूप में स्थापित किया जाए।
वरिष्ठ कथाकार हिमांशु जोशी ने अपनी अध्यक्षीय टिप्पणी में कहा कि हिंदी आज विडम्बनाओं की भाषा बनकर रह गई है। भाषा कोई ज्ञान दान नहीं है। इसका संबंध अभिव्यक्ति से है। उन्होंने कहा कि हिंदी के साथ लिपि का द्वंद्व भी काफी गंभीर है।
इस सत्र में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि भोपाल के कुलपति प्रोफेसर वीके कुठियाला, गोवा विवि के डीन डॉ. रविन्द्र मिश्र, दिल्ली विवि के डॉ. कमल कुमार, जामिया मिलिया विवि के प्रोफेसर अब्दुल बिस्मिल्लाह और डॉ. राजनारायण शुक्ल ने भी अपने विचार व्यक्त किए। (एजेंसी)