प्‍यार और गर्माहट को दर्शाती है फिल्‍म 'बर्फी'

फिल्म ‘बर्फी’ में अभिनेता रणबीर कपूर गूंगे- बहरे बने हैं तो अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा खुद में खोई रहने वाली लड़की के रोल में है।

ज़ी न्‍यूज ब्‍यूरो
फिल्म ‘बर्फी’ में अभिनेता रणबीर कपूर गूंगे- बहरे बने हैं तो अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा खुद में खोई रहने वाली लड़की के रोल में है। कुल मिलाकर कहा जाए तो यह फिल्‍म प्‍यार के साथ-साथ गर्माहट का भी एहसास करवाती है। यह फिल्म विकलांगता के बारे में नहीं है।
अनुराग बसु की ओर से निर्देशत यह रोमांटिक कॉमेडी मर्फी (रणबीर कपूर) नाम के एक लड़के पर केंद्रित है, जिसे सभी लोग बर्फी कहकर बुलाते हैं। मर्फी की आदत हमेशा लोगों के साथ हंसी मजाक और शरारतें करने की रही है। कुछ बोलने और सुन सकने में असक्षम मर्फी फिर भी लोगों को पसंद है। वहीं, प्रियंका चोपड़ा (झिलमिल) खुद में केंद्रित रहने वाली एक लड़की है। इस फिल्म में तमिल अभिनेत्री इलेना डिक्रूज ने भी बेहतर प्रदर्शन किया है।
करीब छह दशक पहले इस फिल्‍म के नायक का जन्‍म होता है, तब उसके घर पर मर्फी बज रहा होता है। मर्फी ट्रांजिस्‍टर रेडियो के नाम पर नायक का नामकरण होता है। मर्फी जब भी बोलने की कोशिश करता है तो वह बर्फी की तरह सुनाई देता है। सभी उसे बर्फी कहने लगते हैं। अधिकांश गूंगे-बहरे लोग भले ही बोल न पाते हों, लेकिन वे अपनी इशारों की भाषा में बात करने के लिए आवाज निकालकर कुछ बताने की कोशिश जरूर करते हैं। बर्फी मूलत: खानाबदोश किस्‍म का शख्‍स है। वह लिख-पढ़ सकता है और खासा स्‍मार्ट भी है। वह शरारती है। उसके शहर के इंस्‍पेक्‍टर का पूरा कैरियर उसका पीछा करने में ही बीत जाता है। बर्फी के हावभाव कुछ कुछ चार्ली चैप्लिन से प्रेरित हैं। वास्‍तव में यह फिल्‍म बहुत हद तक एक साइलेंट फिल्‍म है, इसमें दुनिया को एक गूंगे-बहरे नायक के नजरिये से देखने की कोशिश की गई है।
इस फिल्‍म में ऐसा चित्रण किया गया है, जो दिलों को छूते हुए एक ऐसी तस्‍वीर पेश करती है, जहां प्‍यार और मासूमियत अभी जिंदा है। बर्फी को एक प्‍यारी-सी लड़की (इलिएना डीक्रुज) से प्‍यार हो जाता है, जिसकी पहले ही सगाई हो चुकी है। बर्फी को इसके बाद एक बार फिर प्‍यार होता है। इस बार लड़की मानसिक रूप से विकलांग है, जिसकी मां शराबी और पिता जुआरी हैं। यह भूमिका प्रियंका चोपड़ा ने निभाई है।
रणबीर और प्रियंका ने अपनी ओर से सर्वश्रेष्‍ठ प्रदर्शन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हालांकि बर्फी में कुशल संपादन का अभाव दिखा है। फिल्‍म में मेहनत तो सभी कलाकारों ने काफी की है, लेकिन उस लिहाज से एक भाव नहीं उभरता है।