`साहेब, बीबी, गैंगस्टर रिटर्न` रचनात्मक भूख को मिटाने के लिए बनाई: तिग्मांशु

फिल्म निर्देशक तिग्मांशु धूलिया का कहना है कि उनके निर्देशन में पहले बनी फिल्म ‘साहेब, बीबी और गैंगस्टर’ से वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे और इसी रचनात्मक भूख को मिटाने के लिए उन्होंने इस फिल्म का सिक्वल ‘साहेब, बीबी और गैंगस्टर रिटर्न’ बनाया जो पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा भव्य और गुत्थियों से भरा है।

नई दिल्ली : फिल्म निर्देशक तिग्मांशु धूलिया का कहना है कि उनके निर्देशन में पहले बनी फिल्म ‘साहेब, बीबी और गैंगस्टर’ से वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे और इसी रचनात्मक भूख को मिटाने के लिए उन्होंने इस फिल्म का सिक्वल ‘साहेब, बीबी और गैंगस्टर रिटर्न’ बनाया जो पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा भव्य और गुत्थियों से भरा है।
तिग्मांशु की आठ मार्च को रिलीज होने जा रही फिल्म ‘साहेब, बीबी और गैंगस्टर रिटर्न’, रोमांटिक थ्रिलर है जो वर्ष 2011 में बनी ‘साहेब, बीबी और गैंगस्टर’ का सिक्वल है। इस फिल्म में इरफान खान, सोहा अली और राज बब्बर जैसे नये कलाकारों को शामिल किया गया है जबकि मुख्य अभिनेता के बतौर जिमी शेरगिल और अभिनेत्री के बतौर माही गिल को दोहराया गया है।
तिग्मांशु ने बताया, ‘‘साहेब, बीबी और गैंगस्टर की सफलता ने मुझे इसकी अगली कड़ी बनाने के लिए प्रेरित किया क्योंकि पहले बनी इस फिल्म से मैं एक लेखक निर्देशक के बतौर संतुष्ट नहीं था। ‘साहेब, बीबी और गैंगस्टर’ मैंने काफी कम बजट में बनाई थी और इस कारण से मैं राजशाही को भव्य तरीके से नहीं दर्शा पाया था और पहली फिल्म में काफी मसाला बच गया था जिसे आगे उभारने की प्रेरणा ने मुझे इसकी कड़ी बनाने को प्रेरित किया।’’ इस 45 वर्षीय निर्देशक ने वर्ष 2002 में छात्र राजनीति को पृष्ठभूमि बनाकर बनाई गई फिल्म ‘हासिल’ से अपनी निर्देशकीय पारी की शुरुआत की थी और फिल्म उद्योग में अपना सिक्का जमा लिया था। यह वह दौर था जब हिन्दी सिनेमा फार्मूला फिल्मों से ‘यथार्थपरक’ सिनेमा की ओर संक्रमण करने के काल में था। हासिल के बाद ‘साहेब, बीबी और गैंगस्टर’ तथा ‘पान सिंह तोमर’ जैसे कम बजट की भव्य फिल्म बनाकर उन्होंने हिन्दी सिनेमा के मुहावरों में बदलाव ला दिया।
तिग्मांशु कहते हैं कि उनके कैरियर की शुरुआत ऐसे समय में हुई जब हिन्दी सिनेमा एक रूपांतरण के दौर से गुजर रहा था। इस समय ‘कहो ना प्यार है’ फिल्म जबर्दस्त हिट हुई थी और रीतिक रोशन एक नये सुपर स्टार होने की ओर बढ़ रहे थे। लेकिन यही वह दौर भी था जब फार्मूला फिल्में अपने विध्वंस के कगार की ओर अग्रसर थीं क्योंकि समाज बदल रहा था। मैंने फिल्म ‘हासिल’ बनाई और उसकी सफलता और लोगों की प्रतिक्रिया ने मुझे दर्शकों के मनोविज्ञान को समझने का मौका दिया और उसके बाद मैंने उसी मूड को भांपते हुए फिल्में बनायीं। आम तौर पर तिग्मांशु की फिल्मों का नायक कोई बागी होता है जो सामाजिक परिस्थितियों का शिकार होता है और जो अपने संघर्ष के जरिये समाज की विसंगतियों पर सवाल उठाता है।
फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ के लेखक और सहायक निर्देशक रहे तिग्मांशु ने कहा, ‘‘मैं इस तरह की फिल्म इसलिए बनाता हूं क्योंकि मुझे इस तरह के विषय से एक खास लगाव है। मेरी ऐसी फिल्मों के किरदार अपने बगावत के पीछे के मंतव्य को यह कहते हुए सही साबित करने का प्रयास कर रहे होते हैं कि उनका उद्देश्य गलत नहीं था। उसकी किसी खास हरकत के पीछे एक मजबूत तर्क होता है। लेकिन मुझे इस बात का अफसोस है कि समाज में अब ऐसे नायक नहीं रह गये हैं। युवा लोगों में वो जोश खरोश और सामूहिक चेतना से लैस जूझारुपन नहीं दिखता जो एक किसी देश के लिए अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता।’’ फिलहाल तिग्मांशु फिल्म ‘बुलेट राजा’ की शूटिंग में व्यस्त हैं जो हिन्दी क्षेत्र के शहरी गैंगस्टरों पर आधारित ‘थ्रिलर’ फिल्म है।
इलाहाबाद में पले बढ़े तिग्मांशु ने कहा कि उनकी फिल्मों की सफलता का मूल मंत्र वास्तविक जीवन के चित्र उकेरना है। उन्होंने कहा कि वह अपनी फिल्मों में उन बातों को तवज्जो देते हैं जिससे आम इंसान अपने रोज बरोज के जीवन में जूझता है। उन्होंने कहा कि उनकी फिल्में दर्शकों की संवेदना से इसलिए जुड़ती हैं क्योंकि उस फिल्म की बुनियाद जीवन के खरे खोटे और बेबाक अनुभवों पर रखी होती है। (एजेंसी)