टाइटन पर दिखा रहस्यमयी जादुई द्वीप

खगोलविदों ने शनि के उपग्रह टाइटन पर दूसरे सबसे बड़े समुद्र लीगिया मेयर में एक चमकदार, भूगर्भिक वस्तु की खोज की है, जो दिखाई देने के बाद गायब हो गई। टाइटन से लटकी दिखने वाली इस वस्तु की तस्वीर नासा के कैसिनी मिशन रडार द्वारा उतारी गई थी। इसी जगह की हालांकि जब कुछ दिनों बाद तस्वीर उतारी गई, तो उसमें कुछ नहीं दिखा। वैज्ञानिक इसे 'अस्थायी आकृति' बता रहे हैं, वहीं खगोलविदों ने मजाक में इसे 'जादुई द्वीप' कहा है।टाइटन के उत्तरी गोलार्ध में गतिशील और भूगर्भिय प्रक्रियाओं का यह पहला अवलोकन हो सकता है।

टाइटन पर दिखा रहस्यमयी जादुई द्वीप

न्यूयॉर्क: खगोलविदों ने शनि के उपग्रह टाइटन पर दूसरे सबसे बड़े समुद्र लीगिया मेयर में एक चमकदार, भूगर्भिक वस्तु की खोज की है, जो दिखाई देने के बाद गायब हो गई। टाइटन से लटकी दिखने वाली इस वस्तु की तस्वीर नासा के कैसिनी मिशन रडार द्वारा उतारी गई थी। इसी जगह की हालांकि जब कुछ दिनों बाद तस्वीर उतारी गई, तो उसमें कुछ नहीं दिखा। वैज्ञानिक इसे 'अस्थायी आकृति' बता रहे हैं, वहीं खगोलविदों ने मजाक में इसे 'जादुई द्वीप' कहा है।टाइटन के उत्तरी गोलार्ध में गतिशील और भूगर्भिय प्रक्रियाओं का यह पहला अवलोकन हो सकता है।

अमेरिका के कॉर्नेल विश्वविद्यालय के जैसन हॉफगार्टनर ने कहा कि यह खोज बताता है कि टाइटन के उत्तरी गोलार्ध के द्रव्य स्थिर और अपरिवर्तनीय नहीं हैं, बल्कि इनमें परिवर्तन होता रहता है। हॉफगार्टनर कहते हैं कि जादुई द्वीप के कारणों के बारे में हमें ठीक-ठीक नहीं पता, लेकिन हम इसके बारे में आगे अध्ययन करना चाहेंगे।

शनि के ज्ञात 62 उपग्रहों में टाइटन सबसे बड़ा है, जिसमें ढेर सारे झील और समुद्र हैं। इस भूगर्भिक आकृति की खोज के लिए खगोलविद फ्लिपिंग (तस्वीरों में अंतर पता करने की विधि) की पुरानी तकनीक को अपनाते हैं।कैसिनी अंतरिक्षयान ने अमेरिका के कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी को 10 जुलाई 2013 को छाया प्रसंस्करण के लिए सामग्री भेजी थी।कुछ दिनों बाद हॉफगार्टनर और उनके सहयोगी परिवर्तन देखने के लिए पुरानी और प्रसंस्कृत नई तस्वीरों के बीच अंतर पता करते हैं। क्षुद्रग्रह, धूमकेतु और तीसरी दुनिया की खोज के लिए यह विधि लंबे समय से प्रचलन में है। हॉफगार्टनर कहते हैं कि फ्लिपिंग से परिवर्तन का पता आसानी से चल जाता है। जुलाई 2013 के अवलोकन के पहले लीगिया मेयर के इस क्षेत्र में कोई आकृति नहीं थी। यह निष्कर्ष पत्रिका 'नेचर जियोसाइंस' में प्रकाशित हुआ है।