राजस्थान में विकास और भ्रष्‍टाचार का सफाया होंगे मुख्‍य मुद्दे

राजस्थान में पिछले विधानसभा चुनाव में डेढ़ प्रतिशत से कम वोट के अंतर से भारतीय जनता पार्टी से सत्ता छीनने वाली कांग्रेस को इस बार अपना सिंहासन बचाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी।

राजस्थान में पिछले विधानसभा चुनाव में डेढ़ प्रतिशत से कम वोट के अंतर से भारतीय जनता पार्टी से सत्ता छीनने वाली कांग्रेस को इस बार अपना सिंहासन बचाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। सूबे में इस बार के चुनाव में विकास और भ्रष्‍टाचार का सफाया ही मुख्‍य मुद्दे होंगे। कांग्रेस को महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर लोगों की नाराजगी के अलावा सत्ता विरोधी रुझान का भी सामना करना पड़ेगा।
इस बार भी मुख्य़ मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही होने की उम्‍मीद है। इसमें भी दो शख्सियतों के बीच टक्कर होगी। कांग्रेस की तरफ से अशोक गहलोत और बीजेपी की तरफ से वसुंधरा राजे सिंधिया। पूर्व के चुनावों में देखा गया है कि पिछले चार बार से यहां हार जीत का अंतर मत प्रतिशत के हिसाब से डेढ़ से ढाई फीसदी के बीच रहता है। यहां हर पांचवे साल सरकार बदलती रही है, ऐसे में इस बार देखना दिलचस्प रहेगा कि चुनावी ऊंट किस करवट बैठता है।
हालांकि, राजस्‍थान में बेरोजगारी, गरीबी और पिछड़ापन किसी से छिपा नहीं है। साथ ही महिला विकास कार्यक्रम और पेयजल की समुचित व्‍यवस्‍था को लेकर राजनीतिक दल अभी तक निशाने पर रहे हैं। मौजूदा कांग्रेस सरकार के शासन में बुनियादी संरचनाओं को सुधारने को लेकर भी कोई ठोस उपाय नहीं किए गए। ऊपर से कई मंत्रियों के खिलाफ चारित्रिक लांछन लगने के बाद कांग्रेस का चेहरा `दागदार` हुआ। कई समस्‍याओं से जूझ सूबे की जनता को अभी तक कोई ठोस उपाय मुहैया नहीं करवाए गए। ऐसे में कांग्रेस के लिए दोबारा सत्‍ता में वापसी का मार्ग कठिन जरूर होगा।

पिछले चुनावों की तरह इस बार भी एक दिसंबर को होने वाले चुनाव में हालांकि (कांग्रेस और बीजेपी) दोनों दलों के बीच सीधी टक्कर होगी तथा एक बार फिर कांग्रेस की ओर से अशोक गहलोत और भाजपा की ओर से वसुंधरा राजे की प्रतिष्ठा दांव पर होगी। देखना यह होगा कि कांग्रेस के मुख्य प्रचारक राहुल गांधी तथा बीजेपी के मुख्‍य प्रचारक नरेंद्र मोदी अपनी पार्टियों की नैया को कितना पार लगा पाते हैं।

वैसे राज्य की जनता पिछले कुछ समय से एक बार कांग्रेस तो अगली बार भाजपा को सत्ता सौंपती आई है। कांग्रेस को महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर लोगों की नाराजगी के अलावा सत्ता विरोधी रुझान से भी जूझना होगा। भाजपा चुनाव की घोषणा होने से पहले से ही केंद्र के साथ राज्य सरकार पर हमलावर हो गई। कई चुनावी रैलियों के दौरान बीजेपी ने सरकार की बखिया उघेरने की कोशिश की। वैसे बीजेपी की पिछली सरकार के दौरान भी कई योजनाओं को लेकर सवाल उठे थे। इसकी आड़ में भ्रष्‍टाचार के कई आरोप लगाए गए थे। हालांकि गुजरात के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद से भाजपा कार्यकर्ताओं में नए जोश का संचार हुआ है, देखना यह होगा कि मतदाता कितना आकर्षित हो पाते हैं। वैसे सत्‍ता विरोधी लहर का फायदा बीजेपी को जरूर होगा।

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर हुई थी और कांग्रेस मात्र 1.32 प्रतिशत अधिक मत हासिल कर सत्ता में काबिज हुई थी। कांग्रेस को कुल 36.92 प्रतिशत मत मिले थे और उसे 96 सीटें हासिल हुयी थीं जो स्पष्ट बहुमत से पांच कम थी। भाजपा को 35.60 प्रतिशत मत तथा 78 सीटें मिली थीं। इन दोनो दलों के बाद माकपा को 9.22 प्रतिशत तथा बहुजन समाज पार्टी को 7.66 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन माकपा को तीन और बसपा को छह सीटें मिली थीं। राज्य में मतदाताओं की संख्या चार करोड़ छह लाख से अधिक है, जिनमें से 33.34 लाख से अधिक नए मतदाता हैं। इन मतदाताओं के लिये राज्य में कुल 45334 मतदान केंद्र बनाए जाएंगे।

वैसे भी चुनाव में धनबल और बाहुबल के इस्तेमाल को रोकने के लिये चुनाव आयोग कड़े कदम उठा रहा है। चुनाव खर्च पर नजर रखने के लिए उसने 56 पर्यवेक्षेकों की नियुक्ति की है। इसके अलावा 14 पुलिस पर्यवेक्षक नियुकत किए गए हैं। चुनाव प्रक्रिया पर नजर रखने के लिये 200 पर्यवेक्षक तैनात किए जा रहे हैं। इसी क्रम में अब उम्मीदवार के चुनाव खर्च की अधिकतम सीमा 16 लाख रुपये है। ऐसे में उम्‍मीदवारों को इस सीमा से तालमेल में निश्चित ही कठिनाई होगी।

पिछले चुनाव में विधानसभा की 200 सीटों के लिये कुल 2194 उम्मीदवार मैदान में उतरे थे, जिनमें से 1731 की जमानत जब्त हो गई थी। राष्ट्रीय दलों के 686 उम्मीदवारों में से 282 अपनी जमानत बचाने में विफल रहे थे।
साथ ही, राजस्थान के गोडवाड क्षेत्र में इस बार भी विधानसभा चुनाव में पार्टी उम्मीदवारों का बागियों से सामना होगा। इस क्षेत्र की 14 विधानसभा सीटों पर राजनीतिक पार्टियों की टिकट की दावेदारी करने वालों को देखते हुए लगता है इन चुनावों में भी बागी प्रत्याशी चुनाव मैदान में आने के बाद समीकरण बिगाड़ सकते हैं। कांग्रेस एवं भारतीय जनता पार्टी दोनों ही राजनीतिक दलों के सामने टिकट बंटवारे में काफी परेशानी आई। ऐसे मे बागी कितना नुकसान पहुंचाते हैं, यह तो समय ही बताएगा।
इन विधानसभा क्षेत्र में कहीं तो वर्तमान विधायकों का विरोध हो रहा है, तो कहीं पर नए चेहरे टिकट की दोवदारी में शामिल रहे। पाली में कांग्रेस से बगावत कर भाटी ने कांग्रेस प्रत्याशी की जमानत तक जब्त करा दी थी। कांग्रेस और बीजेपी के लिए बागियों से निपटना भी खासा मुश्किल भरा होगा।