विकास, सद्भाव बनाए रखने को सीमा पर शांति जरूरी: प्रणब

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि सीमा पर यदि शांति न हो तो किसी भी देश में विकास और सद्भाव कायम नहीं हो सकता।

इस्तांबुल : राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि सीमा पर यदि शांति न हो तो किसी भी देश में विकास और सद्भाव कायम नहीं हो सकता। राष्ट्रपति ने इस बयान से कुछ दिन पहले पाकिस्तान के इस तर्क को खारिज कर दिया था कि भारत में आतंकवादी हमलों में राष्ट्र से इतर तत्वों का हाथ है।
राष्ट्रपति ने बेल्जियम से पहुंचने के तत्काल बाद कल प्रतिष्ठित इस्तांबुल यूनीवर्सिटी में मानद डिग्री प्राप्त करते हुए कहा, हमने एक मुश्किल सबक सीखा है कि जब तक सीमा पर शांति न हो विकास और सद्भाव कायम नहीं हो सकता। विश्वविद्यालय ने मुखर्जी को राजनीतिक जीवन में उनकी उपलब्धियों और भारत में शासन और लोकतंत्र में उनके योगदान के लिए राजनीतिशास्त्र में डाक्टरेट की मानद् उपाधि प्रदान की ।
मुखर्जी ने कहा, भारत और तुर्की की भौगोलिक स्थिति अत्यंत मुश्किल है और हम दोनों अपनी सुरक्षा के लिये उत्पन्न गंभीर चुनौतियों से अवगत हैं। यद्यपि मुझे इस बात का पक्का यकीन है कि आप भी इससे सहमत होंगे शांति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता अडिग है। हम अपने समाज में संयम, बहुलवाद और सहिष्णुता बरकरार रखे हुए हैं।
मुखर्जी ने भारत और तुर्की के राजनीतिक ढांचे में समानता की बात करते हुए कहा, हमारे (भारत और तुर्की) लोकतांत्रिक संस्थानों की सफलता हमारे समय की चुनौतियों तथा लोगों की आशा और आकांक्षाओं के प्रति उत्तरदायी होने में निहित हैं। उन्हें परिवर्तन की शुरूआत करनी होगी और उस प्रगति को हासिल करना होगा जो हम दोनों देशों में चाहते हैं। मुखर्जी ने दो देशों की यात्रा पर रवाना होने से पहले पाकिस्तान के इस तर्क को खारिज कर दिया था कि भारत में आतंकवादी हमलों के पीछे राष्ट्र से इतर तत्वों का हाथ है। उन्होंने कहा था कि ये तत्व आसमान से नहीं बल्कि उसके नियंत्रण वाले क्षेत्र से आ रहे हैं।
उन्होंने यूरोन्यूज से कहा था, वे सरकार इतर तत्व शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं, इस पर मैं यह जवाब देना चाहूंगा कि सरकार इतर तत्व आसमान से नहीं आ रहे हैं। सरकार इतर तत्व आपके (पाकिस्तान) नियंत्रण वाले क्षेत्र से आ रहे हैं। मुखर्जी तुर्की की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं। उन्होंने अच्छे शासन की कमी पर भी जोर दिया क्योंकि समाज में कई गंभीर कमियों के लिए यही मुख्य कारण है। उन्होंने कहा, उसकी (अच्छे शासन की कमी) नागरिकों से उसकी सुरक्षा, उनके सामाजिक और आर्थिक अधिकारों से वंचित कर देती है, दुर्भाग्य से जिसकी स्थापना उनके कल्याण और सामूहिक भलाई के लिए होता है। अच्छा शासन कुछ मूलभूत पूर्वापेक्षाओं पर निर्भर होता है। (एजेंसी)