ज़ी हेल्पलाइन की बदौलत पेंशन हुई चालू

सांगली की ऊषा शिरगुप्पे (70), सांगली बैंक लिमिटेड में कैशियर क्लर्क 32 साल की नौकरी कर 2002 में रिटायर हो गयीं। सांगली बैंक इंडियन नेशनल बैंक एसोसिएशन का सदस्य था, जहां 1995 में कर्मचारी पेंशन योजना लागू हुई थी। रिटायरमेंट के बाद ऊषा को सभी बक़ाया मिल गया।

ज़ी मीडिया/हेल्‍पलाइन डेस्‍क
सांगली : सांगली की ऊषा शिरगुप्पे (70), सांगली बैंक लिमिटेड में कैशियर क्लर्क 32 साल की नौकरी कर 2002 में रिटायर हो गयीं। सांगली बैंक इंडियन नेशनल बैंक एसोसिएशन का सदस्य था, जहां 1995 में कर्मचारी पेंशन योजना लागू हुई थी। रिटायरमेंट के बाद ऊषा को सभी बक़ाया मिल गया। लेकिन पेंशन नदारद ही रही। दरअसल, सांगली बैंक ने कर्मचारियों के लिए पेंशन योजना को लागू नहीं किया। काफ़ी लिखा-पढ़ी और भाग-दौड़ के बाद 2005 में सांगली बैंक ने बगैर हिसाब लगाये 15 सौ रुपये की अन्तरिम पेंशन चालू कर दी। 2007 में सांगली बैंक का ICICI बैंक में विलय हो गया और तभी ICICI बैंक ने पेंशन योजना को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। हालांकि, विलय की शर्तों के मुताबिक, ऐसा नहीं किया जा सकता था। फिर 2008 में ऊषा ने ICICI बैंक, सांगली को चिट्ठी लिखकर पेंशन बहाल करने की गुहार लगायी। कई महीनों के इंतज़ार और दौड़-भाग के बाद ICICI बैंक ने जवाब दिया कि पेंशन को लेकर ICICI बैंक का प्रबन्धन ही फ़ैसला लेगा। लेकिन चार साल तक कुछ नहीं हुआ। इस दौरान ऊषा ने ICICI बैंक के डिप्टी जनरल मैनेजर और चेयरमैन, चन्दा कोचर से भी गुहार लगायी। लेकिन कोई हरक़त नहीं हुई।
ऊषा के पति जयसिंह पारीख ज्वैलर हैं। इकलौता बेटा सचिन भी अपने रोज़गार में लगा है। पेंशन नहीं मिलने से ऊषा को आर्थिक तंगी तो नहीं झेलनी पड़ी। लेकिन अपने हक़ के मारे जाने की टीस उऩ्हें हर वक़्त सताती रही। इसीलिए 11 साल से जारी भारी मायूसी के बीच ऊषा शिरगुप्पे ने जुलाई में ज़ी हेल्पलाइन से मदद मांगी। ऊषा शिरगुप्पे की तकलीफ़ को खंगालने पर हमने पाया कि ICICI बैंक के प्रबन्धन ने उनके हक़ को लेकर शर्मनाक रवैया अपनाया है। बैंक के आला अफ़सर जानबूझकर ऊषा के हक़ की गुहारें दरकिनार करते रहे हैं। इसीलिए अगले छह महीने तक हक़ की मुहिम ने ICICI बैंक के हर उस अफ़सर के पास दस्तक दी जिनका उनकी फ़रियाद से ताल्लुक था। ऊषा शिरगुप्पे की पेंशन और क़रीब दस लाख रुपये के बकाया को लेकर हमने सबसे पहले ICICI बैंक के एजीएम, रॉयचौधरी को घेरा। खासी टालमटोल के बाद रायचौधरी ने ऊषा को नयी सिरे से अर्ज़ी देने को कहा। क़ाग़जी खानापूर्ति के ऐसे पैंतरेबाज़ी को देखने के बाद अक्टूबर में हमने ICICI बैंक की चेयरपर्सन चन्दा कोचर समेत कई आला अफ़सरों को चिटठी भेजी और छह साल से पेडिंग ऊषा शिरगुप्पे की फ़ाइल को लेकर सफ़ाई मांगी। चिट्ठियों के मिलते ही ICICI बैंक के कॉरपोरेट कम्युनिकेशन के प्रमुख अभिजीत ने ज़ी न्यूज़ से सम्पर्क किया। फ़ोन पर सूचना देने के साथ ही दो हफ़्ते बाद ICICI बैंक ने ज़ी हेल्पलाइन को एक लिखित जवाब भेजा जिसमें लिखा था कि “ऊषा शिरगुप्पे जुलाई 2002 में सांगली बैंक से रिटायर हुईं। उन्हें कर्मचारी पेंशन अधिनियम 1995 के मुताबिक, पीएफ का भुगतान हो चुका है। बाक़ी पेंशन योजना के फ़ायदे के लिए ये जरूरी है कि रिटायर्ड कर्मचारी बैंक को 6 फ़ीसदी ब्याज़ समेत उसका हिस्सा वापस लौटाये। ऊषा शिरगुप्पे को बैंक ये सलाह 2002 और 2008 में दे चुका है। लेकिन अभी तक ऊषा शिरगुप्पे ने ये रकम जमा नहीं की है, लिहाज़ा ICICI बैंक उनकी पेंशन जारी करने में सक्षम नहीं है।
इस चिट्ठी के पाते ही अक्टूबर में ऊषा ने ICICI बैंक को 4 लाख 47 हज़ार 478 रुपये का डिमांड ड्राफ्ट दे दिया और अगले महीने से ही उन्हें 16 हज़ार 200 रुपये की पेंशन मिलने लगी। लेकिन 2008 से लेकर 2013 के बीच की पेंशन के क़रीब दस लाख रुपये के बक़ाया को लेकर ICICI बैंक ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है। लेकिन हमने भी ठान रखा है जब तक उषा शिरगुप्पे के मामले में दूध का दूध और पानी का पानी नहीं हो जाता हम भी चैन से नहीं बैठेंगे।

ज़ी हेल्पलाइन की बदौलत मिला सालों से अटका पीएफ का पैसा
दिल्‍ली : दिल्ली के सोहन पाल, रंजीत कुमार शाह, रामू राम और रोहित ने दस से लेकर 18 साल तक नोएडा में मारुति की एजेंसी जानकी दास मोटर्स में काम किया। जून में जानकी दास मोटर्स के बन्द होने के वक़्त इनसे भी इस्तीफ़ा ले लिया गया। फिर इन्होंने अपने पीएफ की रकम पाने की कोशिश की तो जानकी दास मोटर्स ने उन्हें नोएडा के सिंह एसोसिएट्स के हवाले कर दिया, जो उनके पीएफ का कामकाज़ देखता था। लेकिन पीएफ की रकम दिलवाने के नाम पर सिंह एसोसिएट्स इन सभी से मोटी रकम ऐंठना चाहता था। चारों ने नोएडा के पीएफ दफ़्तर में भी खूब दौड़-धूप की, लेकिन वहां बैठे भ्रष्ट बाबुओं ने भी उन्हें चकरधिन्नी ही बनाया। हारकर दिसम्बर में इन लोगों ने ज़ी हेल्पलाइन से मदद मांगी। फिर हमने चारों के हक़ को लेकर नोएडा के पीएफ कमिश्नर शशांक दिनकर को झकझोरा तो हफ़्ते भर में ही सोहन पाल को 32,547, रंजीत को 65486, रामू राम को 37,800 और रोहित को उनके 31 हज़ार रुपये मिल गये।

चालू हुई बुजुर्ग महिला की पेंशन, एक लाख का एरियर भी मिला
जलगांव : जलगांव की सुमनबाई मधुकर जाधव के पति मधुकर बालाजी जाधव पौने दो साल पहले सेंट्रल रेलवे से रिटायर हुए। रिटायर होते ही वो कैंसर की चपेट में आ गये और साल भर में ही चल बसे। तभी से फैमिली पेंशन बन्द हो गयी। इसे बहाल करवाने के लिए बुज़ुर्ग सुमनबाई दस महीने से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के अफ़सरों के पास गुहार लगाती दौड़ रही थीं। इससे तंग आकर उनके बेटे दीपक जाधव ने सितम्बर में ज़ी हेल्पलाइन से मदद मांगी। तब हमने बैंक के अफ़सरों को झकझोरा तो महीने भर में ही सुमनबाई की दस हज़ार रुपये की पेंशन चालू हो गयी और उन्हें एक लाख रुपये का बकाया भी मिला।
 
 
‘हक़’ की बदौलत छात्र को मिली मार्कशीट
औरंगाबाद : औरंगाबाद के विनोद शेषराव बोर्डे ने मई 2012 में नासिक की यशवन्तराव चौहान ओपन यूनिवर्सिटी में बी.कॉम अन्तिम वर्ष की परीक्षा दी। मुक्तानन्द कॉलेज, औरंगाबाद में हुई इस परीक्षा के सभी छात्रों का रिज़ल्ट तीन महीने बाद आ गया। लेकिन विनोद को परीक्षा में ग़ैरहाज़िर दिखाया गया। इसके ख़िलाफ़ विनोद ने कॉलेज प्रबन्धन और यूनिवर्सिटी से खूब गुहार लगायी। लेकिन पौने दो साल तक भी जब ग़लती दुरुस्त नहीं हुई तो सितम्बर में विनोद ज़ी हेल्पलाइन से मदद मांगी। उनके हक़ को लेकर हमें पांच महीने तक यूनिवर्सिटी के लापरवाह प्रशासन को झकझोरना पड़ा, तब जनवरी में विनोद को सही मार्कशीट मिल सकी।
 
पीएफ के 45 हज़ार रुपये मिले, 5 सालों से पेडिंग थी फ़ाइल
दिल्ली : दिल्ली के प्रीतिश कार्तिक नायर ने गुड़गांव के नेगारो सॉफ्टवेयर कम्पनी में पाँच साल काम करके 2009 में नौकरी छोड़ दी और पीएफ निकालने की अर्ज़ी दी। साल भर तक गुड़गांव के पीएफ दफ़्तर ने कुछ नहीं किया तो प्रीतिश ने ख़ोज ख़बर ली। पता चला कि फॉर्म में नाम की कोई ग़लती है। इसे दुरुस्त करवाने के ढाई साल बाद प्रीतिश के एसएमएस आया कि पीएफ को उनके बैंक ख़ाते में भेजा जा रहा है। लेकिन जब तीन महीने तक रकम नदारद रही तो दिसम्बर में प्रीतिश ने ज़ी हेल्पलाइन से मदद मांगी। हमने उनके हक़ को पीएफ अफ़सरों को झकझोरा तो दस दिन में ही क़रीब 45 हज़ार रुपये मिल गये।
 
बुज़ुर्ग महिला को ग्रेच्यूटी-पीएफ के 2 लाख 10 हज़ार मिले
अमरावती : अमरावती के माधुरी मधुकरराव खुले के पति मधुकरराव, दिसम्बर 2008 में म्यूनिसिपल हाई स्कूल में क्लर्क के पद से रिटायर हुए। तीन साल बाद उनका निधन भी हो गया, लेकिन घूसखोर सिस्टम ने पेंशन चालू नहीं होने दी। पति के निधन के बाद दो साल तक माधुरी भी पेंशन के लिए दौड़ती ही रहीं। फिर हारकर सितम्बर में उन्होंने ज़ी हेल्पलाइन से मदद मांगी। माधुरी के हक़ को लेकर हमने अमरावती और नागपुर के पेंशन ऑफ़िस के अफ़सरों को आड़े हाथों लिया। तब छह साल से अटकी फ़ाइल आगे बढ़ी और जनवरी में माधुरी को ग्रेच्यूटी और प्रोविज़िनल पेंशन का दो लाख दस हज़ार रुपये मिल पाया।
अस्पताल ने मरीज को सौंपे टेस्ट रिपोर्ट
ग़ाज़ियाबाद : ग़ाज़ियाबाद के अमित छाबड़ा ने दिसम्बर में अपने बेटे रेहान को शान्ति गोपाल अस्पताल में भर्ती कराया। तीन दिन बाद भी जब सेहत नहीं सुधरी तो अमित ने रेहान को दूसरे अस्पताल में ले जाना चाहा तो अस्पताल ने डिस्टार्ज करने में खूब हील-हुज्ज़त की। कैशलेस सुविधा भी नहीं मिली। जैसे-तैसे बिल चुकाकर अमित, बेटे को दूसरे अस्पताल ले गये। इसके बाद शान्ति गोपाल अस्पताल उन्हें टेस्ट रिपोर्ट देने के नाम पर दौड़ाने लगा तो अमित ने ज़ी हेल्पलाइन से मदद मांगी। हमने शान्ति गोपाल अस्पताल के सुप्रिन्टेंडेंट डॉ आर के छाबरा को झकझोरा तो दो हफ़्ते में उन्हें सारे टेस्ट रिपोर्ट मिल गये।

ज़ी हेल्पलाइन की बदौलत पूर्व कर्मचारी को मिला चेक
जालन्धर : जालन्धर के दीप विकास शर्मा ने जिन्दल ड्रग्स लिमिटेड की जम्मू वाली फर्म जिन्दल कोकोआ में साढ़े चार साल तक काम किया। अक्टूबर 2011 में दीप ने इस्तीफ़ा दे दिया तो फाइनल हिसाब के लिए ढ़ाई साल तक कम्पनी दीप विकास को दौड़ाती ही रही। दीप ने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री ग्रिवांस सेल से भी गुहार लगायी। लेकिन कुछ नहीं हुआ तो दिसम्बर में ज़ी हेल्पालइन से मदद मांगी। हमने दीप के हक़ को लेकर जिन्दल ड्रग्स की एचआर मैनेज़र नीलम रैना समेत कई अफ़सरों को घेरा तो महीने भर में ही दीप विकास को बक़ाया 62 हज़ार 9 सौ रुपये का चेक मिल गया।
पूर्व कर्मचारी को मिला बकाया वेतन

दिल्ली : दिल्ली के निखिल अरोड़ा ने फ़रीदाबाद की लाइफ स्टाइल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड में नौ महीने तक सीनियर एक्यूक्यूटिव के पद पर काम करके सितम्बर 2011 में नौकरी छोड़ दी। उसे रिलीविंग लेटर और फुल एंड फ़ाइनल पेमेंट के लिए महीने भर बाद सम्पर्क करने को कहा गया। महीने भर बाद जब निखिल बक़ाया वेतन लेने लाइफ स्टाइल इंडिया पहुंचा तो एचआर मैनेजर राजेश गुप्ता और सीएफओ रोहित सेठ उसे दौड़ाने लगे। हारकर दिसम्बर में निखिल ने ज़ी हेल्पलाइन से मदद मांगी। निखिल के हक़ की ख़ातिर हमने लाइफ स्टाइल इंडिया को घेरा तो जनवरी में उसे 20 हज़ार रुपये का बक़ाया मिल गया।