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अटल को `भारत रत्‍न` क्‍यों?

मॉडर्न इंडिया में पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी को छोड़ दें तो अटल बिहारी वाजपेयी ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनकी स्वीकार्यता पार्टी लाइन, धर्म, जाति से हटकर हर दल हर वर्ग, हर उम्र के लोगों में है। अटल जी की शख्सियत में ये महत्वपूर्ण नहीं है कि वो प्रधानमंत्री रहे थे या इतने बड़े पद पर रहते हुए उन्होंने अपनी पार्टी के किसी नेता या फिर किसी भी विरोधी नेता के लिए कभी भी अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल नहीं किया।

वासिंद्र मिश्र
संपादक, ज़ी रीजनल चैनल्स

‘रार नहीं ठानूंगा, हार नहीं मानूंगा
काल के कपाल पर, लिखता चला जाऊंगा‘...
मॉडर्न इंडिया में पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी को छोड़ दें तो अटल बिहारी वाजपेयी ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनकी स्वीकार्यता पार्टी लाइन, धर्म, जाति से हटकर हर दल हर वर्ग, हर उम्र के लोगों में है। अटल जी की शख्सियत में ये महत्वपूर्ण नहीं है कि वो प्रधानमंत्री रहे थे या इतने बड़े पद पर रहते हुए उन्होंने अपनी पार्टी के किसी नेता या फिर किसी भी विरोधी नेता के लिए कभी भी अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल नहीं किया। काफी लंबे समय तक विपक्ष में रहते हुए भी अटल बिहारी वाजपेयी में कभी भी अपने राजनैतिक विरोधियों के लिए भेदभाव या वैमनस्यता नहीं रही।
विपक्ष के नेता के रूप में जब और जहां सत्तारूढ़ दल और उसके मुखिया की तारीफ करने की आवश्यकता महसूस हुई पंडित अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्मुक्त कंठ से तारीफ की, चाहे वो भारत पाक युद्ध का वक्त हो या और तमाम राष्ट्रीय आपदा की घटनाएं, अटल बिहारी वाजपेयी ने हमेशा स्टेट्समैनशिप की बेमिसाल मिसाल पेश की। भारत-पाक युद्ध के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को दुर्गा कहा था।
देश के प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी की कार्यशैली उन्हें अपनी पीढ़ी के नेताओं से अलग पहचान देती है। गुजरात में हुए नरसंहार के बाद प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी का गुजरात दौरा और अपनी ही सरकार के मुख्यमंत्री को राजधर्म का पालन करने की नसीहत देना उन्हें महापुरुषों की श्रेणी में ले जाकर खड़ा करता है। ठीक उसी तरह जैसे पंडित जवाहर लाल नेहरू ने प्रधानमंत्री के रूप में केरल की अपनी सरकार को संवैधानिक दायित्वों का पालन करने में विफल होने के आरोप में बर्खास्त कर दिया था। अटल और सोनिया जी के बीच में पॉलिटिकल केमिस्ट्री और वर्किंग अंडरस्टैंडिंग का आलम ये था कि केंद्र सरकार के तमाम फैसले सोनिया जी की लिखी चिट्ठी के आधार पर संशोधित किए जाते रहे और बदले जाते रहे।
कहा तो ये भी जाता है कि प्रधानमंत्री के रूप में पंडित अटल बिहारी वाजपेयी ने सोनिया गांधी को एक सफल नेता प्रतिपक्ष के रूप में स्थापित होने में भरपूर मदद की। अटल जी की पार्टी के ही कुछ लोग उनकी इस कार्यशैली को लेकर कई बार अपना असंतोष भी जताते रहे हैं। कुछ लोग तो ये भी कहते थे कि वाजपेयी जी ने सोनिया गांधी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में प्रमोट करके पंडित नेहरू की ओर से पूर्व में उनके लिए किए गए राजनैतिक मदद की भरपाई की थी। वाजपेयी जी जब पहली बार चुनकर लोकसभा पहुंचे थे तो पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें विदेश नीति पर बोलने का मौका दिया था, अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण से पंडित नेहरू इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा था कि वाजपेयी जी के अंदर देश का नेतृत्व करने के सारे गुण मौजूद हैं।
पंडित अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व के अलग-अलग आयाम रहे हैं, आरएसएस के स्वयंसेवक के रूप में अटल, जनसंघ के राजनैतिक कार्यकर्ता के रूप में, आरएसएस के मुखपत्र राष्ट्रधर्म के संपादक के रूप में अटल, देश के सर्वोत्तम विशिष्ट पार्लियामेंटेरियन के रूप में अटल, नेता प्रतिपक्ष के रूप में अटल, विदेश मंत्री के रूप में अटल और प्रधानमंत्री के रूप में अटल।
भारतीय विदेश नीति के जानकार भली भांति जानते होंगे कि भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन के बाद उपजी कड़वाहट में सबसे ज्यादा कमी अटल बिहारी वाजपेयी के विदेश मंत्री रहते हुए आई, अटल जी ने अपने कार्यकाल में भारत की पाकिस्तान के लिए वीजा नीति को शिथिल किया था। वो अटल बिहारी वाजपेयी जो आरएसएस के स्वंयसेवक थे, पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीन दयाल उपाध्याय की फिलॉसॉफी को मानते थे, बावजूद इसके उन्होंने पड़ोसी मुल्क के साथ आपसी मेल-जोल बढ़ाने की भरपूर कोशिश की।

प्रधानमंत्री के रूप में भी अटल बिहारी वाजपेय़ी ने दोनों मुल्कों के बीच समझौता एक्सप्रेस और लाहौर बस सेवा की शुरुआत की, और ऐसा कर उन्होंने खुद के पंथनिरपेक्ष होने और इंसानी सोच का परिचय दिया। ये अलग बात है कि पाक की तत्कालीन हुकूमत ने अटल जी के साथ विश्वासघात किया और जवाब में करगिल जंग थोप दिया। हालांकि अटल जी का व्यक्तित्व ऐसा है कि उनकी विश्वसनीयता और सम्मान पूरे इंडियन सब कॉन्टिनेंट में है, पाकिस्तान में भी अटल बिहारी वाजपेयी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने भारत में है।
अटल जी के व्यक्तित्व और कार्यशैली में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद (integral humanism), पंडित जवाहर लाल नेहरू की स्टेट्समैनशिप और श्रीमती इंदिरा गांधी की दृढ़ता दिखाई देती है। इंदिरा जी के बाद जिस साहस और बहादुरी से अमेरिका के खुले विरोध के बावजूद पंडित अटल बिहारी वाजपेयी ने न्यूक्लियर बम का सफल परीक्षण (पोखरण) किया वो उनकी दृढ़ता और साहस का परिचायक थी। इंदिरा गांधी भी बतौर प्रधानमंत्री कभी भी दुनिया के शक्तिशाली देशों के सामने कमजोर नहीं पड़ीं, चाहे वो परमाणु बम का परीक्षण हो या फिर बांग्लादेश के निर्माण के दौरान हुआ भारत-पाक युद्ध। भारत-पाक युद्ध के दौरान अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इंदिरा गांधी पर युद्ध खत्म करने का दवाब बनाया था लेकिन इंदिरा ने बिना झुके बांग्लादेश के निर्माण तक युद्ध जारी रखा और रिचर्ड निक्सन को आधे रास्ते से अपना सातवां बेड़ा वापस बुलाना पड़ा। इंदिरा जी के बाद इतनी दृढ़ता अटल बिहारी वाजपेयी में ही नजर आई।
ऐसे में अटल बिहारी वाजपेयी जी के व्यक्तित्व के मद्देनज़र ये कहा जा सकता है कि वो किसी सम्‍मान के मोहताज नहीं है, अगर उन्‍हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया जाता है तो ये अटल जी का सम्‍मान नहीं होगा बल्कि इससे उस सम्मान और सरकार का ही गौरव बढ़ेगा।

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