400 साल पहले 'लगान' के बदले काटी थी गर्दन, जिसकी कीमत आज भी चुका रहा यह गांव

675 साल पहले इस गांव को पुलाराम सारण नाम के व्यक्ति ने बसाया था. यह गांव काफी विशाल है और यहां ज्यादातर परिवार व्यापार करते हैं

400 साल पहले 'लगान' के बदले काटी थी गर्दन, जिसकी कीमत आज भी चुका रहा यह गांव
यह परंपरा गांव में बने लोक देवता दादा जी महाराज से जुड़ी हुई है.

सरदारशहर/ मनोज प्रजापत: राजस्थान के सरदारशहर में एक गांव ऐसा भी है जहां शादी तो होती है लेकिन दूल्हा कभी घोड़ी नहीं चढ़ता. अगर आप सोच रहे हैं कि ऐसा कैसे तो हो सकता है तो आपको बता दें कि ये एक दम सच है और यहां के इस गांव में पिछले 400 साल से कोई भी दुल्हा घोड़ी नहीं चढ़ा है. पुलाराम सारण गांव की यह परंपरा कई सालों से चली आ रही है कई पीढ़ियां बीत चुकी है लेकिन फिर भी इस गांव में बच्चे से लेकर बुजुर्ग ने आज तक किसी भी दूल्हे को घोड़ी पर बैठे हुए नहीं देखा है. गांव वालों का मानना है कि यह परंपरा हमारे गांव में सालों से चली आ रही है जिसे हम निभा रहे हैं. हमारे दादा, परदादा भी कभी भी घोड़ी पर नहीं बैठे थे और हम भी घोड़ी पर नहीं बैठे.

दरअसल यह परंपरा गांव में बने लोक देवता दादा जी महाराज से जुड़ी हुई है. इसी के चलते इस गांव में शादी में दूल्हा घोड़ी पर नहीं बैठता है और यह परंपरा आसपास के क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी रहती है. 

675 साल पहले इस गांव को पुलाराम सारण नाम के व्यक्ति ने बसाया था. यह गांव काफी विशाल है और यहां ज्यादातर परिवार व्यापार करते हैं. गांव में आधी से ज्यादा आबादी ब्राह्मण जाति की है. गांव में अनेकों देवी देवताओं के मंदिर हैं जो इस गांव की शोभा बढ़ाते हैं. जल्द शादी के बंधन में बंधने वाली गांव की एक युवति ने बताया कि शादी में घोड़ी पर नहीं बैठने की परंपरा हमारे गांव में दशकों से चली आ रही है. शादी में घोड़ी पर बैठने का सभी का अरमान होता है लेकिन गांव की परंपरा के चलते हम घोड़ी पर नहीं बैठ पाते हैं. अफसोस तो होता है इस चीज का लेकिन खुशी भी है कि हम गांव की परंपरा को आज भी निभा रहे हैं.

गांव में घोड़ी पर नहीं बैठने के पीछे का क्या है राज 
400 साल पहले उगाराम नाम का एक व्यक्ति था और उससे ही यह परंपरा जुड़ी हुई है. गांव के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि पूलासर गांव पहले स्वतंत्र गांव था लेकिन बीकानेर के तत्कालीन राजा ने पूलासर गांव से कर मांगा. इस पर ग्रामीणों ने यह कह कर "कर" देने से मना कर दिया कि यह पूरा गांव ब्राह्मणों का है और ब्राह्मण पूजा पाठ करके अपना जीवन यापन करते हैं लेकिन राजा नहीं माना और बीकानेर से अपनी सेना लेकर गांव पर चढ़ाई कर दी. इस पर उगाराम घोड़ी पर बैठकर राजा के सामने ही चला गया. सवाई छोटी गांव में राजा का उगाराम का आमना सामना हो गया राजा से उगाराम ने निवेदन किया कि वह कर न ले लेकिन राजा नहीं माना और अंत में उगाराम ने अपना शीश काटकर थाली में राजा को कर के रूप में दे दिया. तभी से ग्रामीणों की उगाराम में आस्था बन गई.

दादोजी महाराज का आज भी गांव में है मंदिर
उगाराम को गांव के लोग आज दादोजी महाराज के नाम से जानते है और श्रद्धा से दादोजी महाराज की पूजा करते हैं. दादोजी महाराज का गांव के बीचो-बीच मन्दिर है, जो गांव वालो के लिए आस्था का केंद्र है. गांव के लोगों की इस मंदिर के प्रति गहरी श्रद्धा है और गांववालों का मानना है कि दादोजी महाराज हमें हर विपदा से बचाते हैं. इस मन्दिर की भी एक खास बात ये है इस मन्दिर में कोई मूर्ति या फोटो नही है, यहां के लोग दादोजी महाराज की चरण पादुकाओं को पूजते है, जो इस मन्दिर में स्थित है.