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राजस्थान: सैकड़ों साल पुराने मंदिर में पानी से जलाई जाती है 'अखंड ज्योति', देखें VIDEO

मंदिर में वर्षों से आधे तेल और आधे पानी को मिलाकर अखंड दीपक की ज्योत जलाई जाती है, जो निरंतर प्रज्वलित होती रहती है. 

 राजस्थान: सैकड़ों साल पुराने मंदिर में पानी से जलाई जाती है 'अखंड ज्योति', देखें VIDEO
आधे तेल और आधे पानी को मिलाकर अखंड दीपक की ज्योत जलाई जाती है.

दीपक व्यास/चित्तौड़गढ़: जिला मुख्यालय से करीब 28 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ग्राम पांचली है. यहां मगरी पर श्री नाकोड़ा भैरव और देवनारायण जी का देवस्थान श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है. इस मंदिर में वर्षों से आधे तेल और आधे पानी को मिलाकर अखंड दीपक की ज्योत जलाई जाती है, जो निरंतर प्रज्वलित होती रहती है. बड़ी संख्या में आस पास ही नहीं दूरदराज एवं समीपवर्ती मध्य प्रदेश अन्य राज्यों से भी हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन करने और अपनी मनोकामनाओं को लेकर आते हैं.

महाराज की नेतावल के समीप एक टेकरी पर ग्राम पाचली में स्थित है श्री नाकोड़ा देवनारायण मंदिर है. बताया जाता है की सैकड़ों वर्ष पूर्व नाकोड़ा भैरव यहां भ्रमण पर आए थे और इसी स्थान पर नाकोड़ा भैरव एवं देवनारायण जी का मंदिर स्थापित किया गया.

शुरुआत में यहां श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ति के लिए देवी शक्ति के बताए अनुसार पानी की ज्योत प्रज्वलित की गई. तत्पश्चात यहां निरंतर आधे तेल और आधे पानी को मिलाकर अखंड दीपक की जोत लगाई जाती आ रही है.
मंदिर में प्रति रविवार को सुबह से शाम तक बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है, इसके अलावा प्रतिदिन भी यहां दर्शनार्थियों का आगमन होता रहता है.

मंदिर में ही श्री नाकोड़ा देवनारायण जी की चौकी लगती है और मनोकामना लेकर आने वालों की फरियाद सुनकर उनकी कामना पूर्ति का आशीर्वाद दिया जाता है. इस स्थान पर दैहिक, देविक और भौतिक कष्टों का निवारण हो रहा है, मौके पर उपस्थित विभिन्न स्थानों से आए श्रद्धालु अपने-अपने अनुभव बताते हुए कहा कि वह यहां आकर खुद को धन्य मानते हैं.

मंदिर पर गांव के ही भोपाजी हेमराज गुर्जर पूजा अर्चना करते हैं तथा यहां चौकी पर आगंतुकों की जिज्ञासाओं और समस्याओं के समाधान किए जाते हैं. प्रति वर्ष की अश्विन और चेत्र नवरात्रि में 9 दिन तक नवरात्रि अनुष्ठान भी यहां होते हैं. मंदिर पर विभिन्न असाध्य रोगों से पीड़ित और विभिन्न सांसारिक बाधाओं से परेशान दर्दी यहां आकर अपने कष्टों से मिली मुक्ति के किस्से बताते हुए स्थान की महिमा करके स्वयं को धन्य महसूस करते हैं.