हर राजनीतिक पार्टी छोड़ना चाहती है समय पर अपनी छाप, लेकिन क्या सही है ये तरीका

भारत की राजनीति के इतिहास में टाइम कैप्सूल का जिक्र एक रहस्य, एक विवाद और उससे भी अधिक कांग्रेस के शीर्ष पर पहुंचने और अर्श पर आ जाने की कहानी को समेटे हुए है. इंदिरा गांधी ने देश की आजादी की सिल्वर जुबली पर लालकिले में एक टाइम कैप्सूल दबाया था. इसे कालपात्र का नाम दिया गया था. बताया गया था कि इस पात्र में आजादी के बाद के माहौल का ब्योरा देने वाले ऐतिहासिक दस्तावेज हैं. 

हर राजनीतिक पार्टी छोड़ना चाहती है समय पर अपनी छाप, लेकिन क्या सही है ये तरीका

नई दिल्लीः जालंधर के एक निजी विश्वविद्यालय ने इस साल की यानी 5 जनवरी 2019 को जमीन के 10 फीट नीचे टाइम कैप्सूल दबाया गया था. इस मौके पर यहां नोबेल पुरस्कार विजेता अवराम हर्षको, कन हालडेन, थॉमस सुडोफ जैसे वैज्ञानिक भी पहुंचे थे. उन्होने एक कंटेनर में इस सदी के विज्ञान के प्रतीकों के तौर पर स्टॉप वाच, वेइंग मशीन, हेडफोन, हैंडी कैम, पैन ड्राइव, सोलर सेल व मंगलयान, ब्रह्मोस मिसाइल, तेजस फाइटर जेट रखकर 100 साल के लिए दबाया था. हालांकि यह एक शैक्षिक प्रक्रिया थी, लेकिन इसने एक राजनीतिक मामले को याद दिला दिया था.

क्या था वह राजनीतिक मामला
यह राजनीतिक मामला जुड़ा है, कांग्रेस की सरकार से, सीधे तौर पर कहें तो इंदिरा गांधी से. यह दौर दशक 1980 का था और इंदिरा गांधी इस समय अपने चरम पर थीं.  इसी साल स्वतंत्रता दिवस की 25 साल पूरे हो रहे थे और सरकार इस सिल्वर जुबली को यादगार तरीके से मनाना चाहती थी.  तय हुआ कि 15 अगस्त, 1973 को लाल किला परिसर में एक टाइम कैप्सूल जमीन में दबाया जाएगा.

सरकार का कहना था कि इसके भीतर रखे जाने वाले दस्तावेजों में आजादी के शुरुआती 25 सालों की उपलब्धियों का विशेष विवरण होगा, साथ ही देश के प्राचीन इतिहास से लेकर आधुनिक समय तक की उल्लेखनीय घटनाओं का जिक्र भी इसमें शामिल किया जाएगा.

...और नाम मिला कालपात्र
जब  दिन-तारीख और मसौदा सब तैयार हो गया तो बारी आई यह निश्चित करने की इसमें इतिहास का कौन सा दौर रखा जाएगा. इतिहास का कौन सा महत्वपूर्ण हिस्सा शामिल किया जाना चाहिए. यह सवाल आते ही इसका हल तलाशने कांग्रेस को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) नजर आया. मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर एस कृष्णास्वामी इस सामग्री को तैयार कर रहे थे. इस कालपात्र का नाम दिया गया. यानी कि ऐसा पात्र, जिसमें समय का हिस्सा उस दौर की पूरी कहानी समेटे हुए है.

...लेकिन हो गई एक गड़बड़
इसी दौरान एक गड़बड़ी हो गई. दरअसल यह प्रक्रिया जब लोगों के सामने आई तो तुरंत ही राजनीतिक गलियारों में इसने नए विवाद के लिए सुर्रा छोड़ दिया. हालांकि ऐसा होता नहीं, अगर प्रोफेसर एस कृष्णास्वामी एक गलती नहीं करते. यह प्रक्रिया उस समय तक पूरी तरह गोपनीय थी, लेकिन प्रोफेसर कृष्णास्वामी को इतिहास के इस चुनाव पर कोई सही-गलत राय नहीं मिल पा रही थी. ऐसे में उन्होंने प्रसिद्ध इतिहासकार रहे टी बद्री नाथ को दस्तावेजों की कॉपी भेज दी.  मकसद था कि बद्रीनाथ इसे देखकर इस पर अपनी राय जताएंगे. लेकिन यहीं गलती हुई. बद्रीनाथ ने इसी देखा जरूर लेकिन फिर खुलेआम आचोलना कर दी.

क्या कहा था बद्रीनाथ ने
बद्रीनाथ का कहना था कि कालपात्र में रखे जाने वाले दस्तावेज इतिहास का गलत प्रस्तुतिकरण करते हैं. इधर राजनीतिक गलियारों में हलचल थी कि इंदिरा गांधी खुद और अपने परिवार का महिमामंडन करने वाली लिखित सामग्री काल पात्र में रखवा रही हैं. इसमें बस उन्ही के विषय में लिखा है, जो गाधी परिवार की विशेष स्थिति को दर्शाता है.  इसके साथ ही इसमें आजादी के बाद के 25 साल के दौर में हुए कार्यों का श्रेय या तो खुद को, परिवार को या फिर पार्टी को दे रही हैं. तमाम विरोध के बावजूद आजादी की 25वीं वर्षगांठ पर कालपात्र लालकिले में दबा दिया गया.

फिर जनता पार्टी ने इसे निकलवा दिया
समय बहुत तेजी से बदलता है. 1973 में इंदिरा गांधी शीर्ष पर थीं और 1974 आते-आते पार्टी सत्ता से बाहर हो गई. देश में बनी मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की सरकार. जिन्होंने पहले ही कह दिया था कि अगर वह सत्ता में आए तो कालपात्र को निकलवाकर उसका अध्ययन करेंगे कि तत्कालीन पीएम में इसमें क्या दबाया था. 

सरकार बनने के कुछ दिन बाद वादे की तामीली हुई और कालपात्र निकलवा लिया गया. इसके बाद यह टाइम कैप्सूल जितना दबाते समय रहस्य नहीं बना था, उतना निकलने के बाद बन गया.

अध्ययन तो किया, पर बताया नहीं कि इसमें क्या है
कालपात्र की अवधि 1000 साल तय की गई थी, लेकिन महज चार साल तक ही वह धरती के गर्भ में रह  सका.  महज पांच हजार के खर्च से दबा यह कैप्सूल 58 हजार के बड़े खर्च से बाहर आया. लेकिन इसके बारे में अब तक केवल दावे ही किए जा रहे हैं. इसमें क्या था, इसकी ठीक-ठीक जानकारी नहीं है. दावा है कि इसमें वाकई केवल नेहरू परिवार की उपलब्धियां थीं तो कुछ का मानना है कि इतिहास के विवरण है जो विवादास्पद नहीं कहे जा सकते हैं. 2012 में कालपात्र का शोर फिर सुनाई दिया था. जिसमें पीएममो से आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई थी. हालांकि पीएमओ ने साफ किया कि उसके पास इससे जुड़ी कोई सूचना नहीं है.

2009 में भी सुनाई दिया था शोर
टाइम कैप्सूल का शोर मायावती के नाम से भी जुड़ा है. कहा जाता है कि साल 2009 में बसपा सुप्रीमो मायावती  ने भी कहीं टाइम कैप्सूल दबाया था, लेकिन यह सिर्फ शोर बनकर रहा गया.

कई जगह की अटकलों के बाद भी मायावती का टाइम कैप्सूल नहीं मिला. बताया गया कि उन्होंने अपनी पार्टी और खुद की उपलब्धियों से जुड़ी हुई जानकारी के दस्तावेज एक टाइम कैप्सूल में रखवाकर कहीं दफन करवाए हैं. हालांकि इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई.

2010 में भाजपा का आया टाइम
बताया जाता है कि तब नरेंद्र नोदी गुजरात के सीएम थे.  यहां के गांधी नगर में महात्मा गाधी मंदिर बन रहा था. बताया गया कि इसी मंदिर के नीचे सीएम मोदी ने टाइम कैप्सूल दबाया है. तीन फुट लंबे और ढाई फुट चौड़े इस स्टील सिलेंडर में कुछ लिखित सामग्री और डिजिटल कंटेट रखा गया था. सरकार के मुताबिक कैप्सूल में गुजरात के पचास साल का इतिहास संजोया गया था.

कांग्रेस ने उस समय इसका काफी विरोध किया. पार्टी ने आरोप लगाया कि टाइम कैप्सूल के माध्यम से मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी इतिहास में अपना महिमामंडन करना चाहते हैं. कांग्रेस ने धमकी भी दी कि वह सत्ता में आई तो कैप्सूल निकलवा देगी.

हालांकि यह तीनों ही विवरण अब तक कुछ भी साबित नहीं करते हैं. यह भविष्य तक पहुंचेंगे कि नहीं यह भी नहीं पता. हालांकि एक निश्चित समय बाद यह कैप्सूल भले ही भविष्य की पीढ़ी को आज के वर्तमान की सही जानकारी दे पाए या नहीं, लेकिन आज के राजनीतिक खींचतान और उठापठक को जरूर सामने रखेंगें. तब का समाज इसे किस तरह स्वीकारेगा यह तो सिर्फ समय पाएगा.

चुनाव होना लेकिन सरकार न बन पाना, महाराष्ट्र का पुराना रोग है