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महाबलीपुरम: नरेंद्र मोदी-शी जिनपिंग के स्वागत के लिए 18 तरह की सब्जियों और फलों से सजाया गया गेट

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग दोपहर 2.10 पर चेन्नई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पहुंचेंगे. यहां उनके स्वागत के लिए केरल के प्रसिद्ध पारंपरिक नृत्य चेंदा मेलम को पेश किया जाएगा.

महाबलीपुरम: नरेंद्र मोदी-शी जिनपिंग के स्वागत के लिए 18 तरह की सब्जियों और फलों से सजाया गया गेट
(फोटो साभार - ANI)

चेन्नई: महाबलीपुरम (Mahabalipuram) में आज शाम 5 बजे पीएम नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनिपिंग (Xi Jinping) की मुलाकात होने वाली है. महाबलीपुरम में इन दोनों नेताओं के स्वागत के लिए जोरदार तैयारियां की जा रही हैं. 

महाबलीपुरम में पंच रथ के पास मोदी-जिनपिंग के स्वागत के लिए बागवानी विभाग ने एक विशाल गेट को सजाया है. इसकी सजावट में 18 प्रकार की सब्जियां और फलों का प्रयोग किया गया है. इन फलों और सब्जियों को तमिलनाडु के विभिन्न इलाकों से मंगाया गया है. 

विभाग के 200 स्टाफ मेंबर्स और ट्रेनी ने मिलकर 10 घंटे से ज्यादा समय तक इस गेट को सजाने में मेहनत की है. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग दोपहर 2.10 पर चेन्नई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पहुंचेंगे. यहां उनके स्वागत के लिए केरल के प्रसिद्ध पारंपरिक नृत्य चेंदा मेलम को पेश किया जाएगा. इसके लिए चेंदा मेलम नृत्य कलाकार एयरपोर्ट पहुंच चुके हैं.  बता दें पीएम मोदी 11.15 बजे चेन्नई पहुंच जाएंगे. 

इस मायने में अहम रहा महाबलीपुरम...
महाबलीपुरम या मामल्‍लपुरम (Mamallapuram) प्रसिद्ध पल्‍लव राजवंश की नगरी थी. इसके चीन के साथ व्‍यापारिक के साथ ही रक्षा संबंध भी. इतिहासकार मानते हैं कि पल्‍लव शासकों ने चेन्‍नई से 50 किमी दूर स्थित मामल्‍लपुरम के द्वार चीन समेत दक्षिण पूर्वी एशियाओं मुल्‍कों के लिए खोल दिए थे, ताकि उनका सामान आयात किया जा सके.

चीन के मशहूर दार्शनिक ह्वेन त्सांग भी 7वीं सदी में यहां आए थे. वह एक चीनी यात्री थे, जोकि एक दार्शनिक, घूमंतु और बेहतरीन अनुवादक भी था. ह्वेन त्सांग को 'प्रिंस ऑफ ट्रैवलर्स' कहा जाता है. बताया जाता है कि ह्वेन त्सांग को सपने में भारत आने की प्रेरणा मिली, जिसके बाद वह भारत आए और भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े सभी पवित्र स्थलों का दौरा भी किया. इसके बाद उन्‍होंने उपमहाद्वीप के पूर्व एवं पश्चिम से लगे इलाकों की यात्रा भी की. उन्‍होंने बौद्ध धर्मग्रंथों का संस्कृत से चीनी अनुवाद भी किया. माना जाता है कि ह्वेन त्सांग भारत से 657 पुस्तकों की पांडुलिपियां अपने साथ ले गया था. चीन वापस जाने के बाद उसने अपना बाकी जीवन इन ग्रंथों का अनुवाद करने में बिता दिया.

इनमें पहला 'द शोर टेम्पल' है. समुद्र तट पर बना यह द्रविड़ स्थापत्य की बेजोड़ मिसाल है. पल्लव शासकों ने ग्रेनाइट के पत्थरों से तराशे गए इस मंदिर का निर्माण करवाया था. दरअसल यह भगवान विष्णु का मंदिर है.

दूसरी जगह है 'पंच-रथ'... मान्‍यता है कि पंच रथ का ताल्लुक महाभारत काल की कथा से ताल्‍लुक है. इन रथों को पल्लव शासकों ने बनाया था और इसे पांच पांडवों और उनकी पत्नी द्रौपदी का नाम दिया. पौराणिक मान्‍यता के अनुसार, पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान द्रोपदी के साथ महाबलीपुरम में काफी वक्त बिताया था.

तीसरी जगह है 'अर्जुन्स पेनेन्स'... यह एक शिला पर हस्तशिल्प कला का पूरी दुनिया में इकलौता मॉडल है. इसे पहाड़ी को काटकर गुफानुमा मंदिर बनाया गया. कहते हैं कि अर्जुन ने महाभारत की लड़ाई जीतने के लिए अस्त्र शस्त्रों की प्राप्ति के लिए यहीं भगवान शिव की उपासना की थी.