PAK में हुए हर तख्‍तापलट में फौजी हुक्‍मरानों ने 111 बिग्रेड का ही इस्‍तेमाल क्‍यों किया?

पाकिस्तानी सेना की 111 ब्रिगेड रावलपिंडी में तैनात रहती है और ये पाकिस्तानी सेना के हेडक्वार्टर की गैरिसन ब्रिगेड है.

PAK में हुए हर तख्‍तापलट में फौजी हुक्‍मरानों ने 111 बिग्रेड का ही इस्‍तेमाल क्‍यों किया?

नई दिल्‍ली: जम्‍मू-कश्‍मीर से आर्टिकल 370 (Article 370) हटने के बाद कश्‍मीर मुद्दे पर पाकिस्‍तान (Pakistan) की अंतरराष्‍ट्रीय जगत में नाकामी और संयुक्‍त राष्‍ट्र में इमरान खान के कमजोर प्रदर्शन के बाद पाकिस्‍तान पर नजर रखने वाले विश्‍लेषक मान रहे हैं कि वहां की फौज पाकिस्‍तानी प्रधानमंत्री से खुश नहीं है. वैसे भी पाकिस्‍तान में विदेश नीति और खासकर कश्‍मीर मुद्दे पर सेना की भूमिका ही निर्णायक होती है. कश्‍मीर पर इमरान खान सरकार के अंतरराष्‍ट्रीय मोर्चे पर शिकस्‍त खाने और पाकिस्‍तान की बदहाल अर्थव्‍यवस्‍था के कारण माना जा रहा है कि पर्दे के पीछे अदृश्‍य शक्ति के रूप में रहने वाली सेना एक बार फिर सामने दिखने लगी है.

संयुक्‍त राष्‍ट्र से इमरान खान के पाकिस्‍तान लौटने के बाद वहां के दो महत्‍वपूर्ण घटनाक्रमों से इस बात की पुष्टि होती है. पहली- पाकिस्‍तान के आर्मी चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा (Qamar Javed Bajwa) ने फौज की 111 ब्रिगेड की छुट्टियां रद्द कर दी गई है. दूसरी- जनरल बाजवा (Qamar Javed Bajwa) ने पाकिस्तान (Pakistan) के बड़े कारोबारियों के साथ गुप्त बैठक की है. इन दोनों घटनाक्रम को देखते हुए पाकिस्तान (Pakistan) में एक बार फिर तख्तापलट (Coup) की आशंका जताई जा रही है. ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है क्‍योंकि पाकिस्तान (Pakistan) में 111 बिग्रेड का ही इस्तेमाल हमेशा से तख्तापलट (Coup) करने में किया जाता रहा है.

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111 ब्रिगेड (111 Brigade)
पाकिस्तानी सेना की 111 ब्रिगेड रावलपिंडी में तैनात रहती है और ये पाकिस्तानी सेना के हेडक्वार्टर की गैरिसन ब्रिगेड है. इस ब्रिगेड का इस्तेमाल इससे पहले हुई लगभग हर सैन्य तख्तापलट में किया गया है, इसलिए इसे तख्तापलट ब्रिगेड (Coup Brigade) भी कहते हैं. तख्तापलट के लिए इस Brigade का इस्तेमाल पहली बार वर्ष 1958 में हुआ था. जब पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल अयूब ख़ान ने वहां के तत्कालीन राष्ट्रपति इस्कंदर मिर्ज़ा को उनके पद से हटा दिया था और सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया था. इसके अलावा वर्ष 1969, 1977 और 1999 में भी तख्तापलट के लिए पाकिस्तानी सेना ने अपनी इसी Brigade का इस्तेमाल किया था. ये Brigade रावलपिंडी में तैनात रहती है. रावलपिंडी से इस्लामाबाद की दूरी सिर्फ 21 किलोमीटर है. इसलिए, ये बहुत कम समय में इस्लामाबाद पहुंच सकती है और तख्तापलट कर सकती है.

तख्तापलट की आशंका इसलिए भी मज़बूत लग रही है, क्योंकि आजकल पाकिस्तान की आर्थिक नीतियां वहां के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान नहीं, बल्कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा तय कर रहे हैं. जनरल बाजवा ने पाकिस्तान के प्रमुख कारोबारियों से एक गुप्त मुलाकात की है. Reports के मुताबिक, सेना प्रमुख और कारोबारियों के बीच हुई ये तीसरी मीटिंग थी. इस दौरान सुरक्षा और गोपनीयता का खास ख्याल रखा गया. यही कारण है कि मीटिंग में लिए गए फैसलों की पूरी जानकारी नहीं मिल सकी. हालांकि, ऐसी ख़बरें हैं, कि जनरल बाजवा ने पाकिस्तानी कारोबारियों से कहा, कि वो अर्थव्यवस्था सुधारने के उपाय बताएं और ज्यादा निवेश करें. कारोबारियों के सुझावों को तत्काल प्रभाव से संबंधित अधिकारियों और मंत्रालयों तक पहुंचाया गया. सेना द्वारा इन पर अमल के आदेश भी दिए गए.

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सिर्फ 2 फीसद विकास दर
इस वक्त पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है. वर्तमान में पाकिस्तान की विकास दर सिर्फ 2 फीसदी है. बजट घाटा 8 प्रतिशत से ज्यादा हो चुका है. जो 30 साल में सर्वाधिक है. एक अनुमान के मुताबिक अगले 12 महीनों के अंदर पाकिस्तान में महंगाई दर 13 प्रतिशत हो जाएगी. जो 10 वर्षों में सबसे ज़्यादा होगा. बतौर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को अर्थ व्यवस्था और अर्थ तंत्र का अनुभव नहीं है और दूसरी बड़ी बात ये है, कि इमरान ख़ान की Approval Rating में गिरावट आई है. यानी पाकिस्तान में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है, जो उन्हें पसंद नहीं करते. पिछले वर्ष चुनाव के दौरान उन्हें पसंद करने वाले लोगों की संख्या 64 प्रतिशत थी. जो अगस्त 2019 में घटकर 46 फीसदी हो गई है. ये वो तमाम वजहें हैं, जो पाकिस्तान में एक और तख्तापलट की तरफ इशारा कर रही हैं. कारोबारियों के साथ जनरल बाजवा की मुलाकात को आप सीधे-सीधे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में दखल कह सकते हैं. और ये एक प्रकार से तख्तापलट करने का नर्म तरीका भी है. पाकिस्तान पहले भी कई बार सैन्य शासन से गुज़र चुका है. यानी वहां पर तख्ता पलट हो चुका है और इस बार भी आशंका उसी बात की है.

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पाकिस्तान में सेना ही देश चलाती है और देश की बड़ी बड़ी Industries भी सेना द्वारा ही संचालित की जाती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में पाकिस्तान में सेना के पास 1 लाख 42 हज़ार करोड़ रुपये से ज़्यादा का कारोबार था. और तीन साल बाद यानी वर्ष 2019 में पाकिस्तानी सेना का क़ारोबार, 7 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का हो चुका है. पाकिस्तान की सेना, पाकिस्तान में 50 से ज़्यादा Projects खुद चलाती है. पाकिस्तान की सेना ने अलग-अलग Projects चलाने के लिए 5 Foundations बनाएं हैं. जिनके नाम हैं, फौजी फाउंडेशन, शाहीन फाउंडेशन, बहरिया फाउंडेशन, Army Welfare Trust और Defence Housing Authorities. इन सभी संस्थाओं की कमान पाकिस्तान के सैन्य अफसरों के हाथ में होती है. और ये सारे अफसर इन संस्थाओं से खूब पैसा कमाते हैं.

12 प्रतिशत ज़मीन सेना के पास
एक आंकड़े के मुताबिक पाकिस्तान की कुल ज़मीन का 12 प्रतिशत सेना के पास है. पाकिस्तान में सैन्य अफसरों को कौड़ियों के भाव ज़मीनें दे दी जाती हैं. और इन ज़मीनों को वहां के सैन्य अफसर Market Rate पर बेचकर करोड़ों रुपये कमाते हैं. पाकिस्तान में सेना कई कंपनियां चलाती है, जिनके ऊंचे पदों पर पाकिस्तानी सेना के ही Retired Officers काबिज़ हैं. पाकिस्तान की सेना CornFlakes, अनाज, आटा, शहद, चॉकलेट और कस्टर्ड पाउडर तक बनाती है. और आपको ये भी बता दें कि भारत से कश्मीर छीनने का दावा करने वाली पाकिस्तानी सेना Readymade खीर भी बनाती है.

पाकिस्तान की सेना Employment Exchange भी चलाती है और सीमेंट भी बेचती है. पाकिस्तान की कई बड़ी Petroleum कंपनियों की मालिक भी वहां की सेना ही है. इतना ही नहीं पाकिस्तान की सेना Askari Bank के नाम से एक प्राइवेट बैंक भी चलाती है और ये बैंक पाकिस्तान के सबसे बड़े वित्तीय संस्थानों में से एक है. यानी पाकिस्तान में सेना का अपना खुद का एक पूरा सिस्टम है और वहां पर प्रधानमंत्री चाहे कोई भी हो सत्ता की चाबी सेना के पास ही रहती है.