लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं ? पढ़िए अटल बिहारी वाजपेयी की 10 कविताएं

अटल बिहारी वाजयेपी को जितना प्रखर नेता कहा जाता हैं, उतने ही वह प्रखर वक्ता माने जाते हैं. कथनी पर मजबूत पकड़ रखने वाले वाजयेपी की लेखनी को उनके धुर विरोधी भी मानते आए हैं.

आशु दास | Aug 16, 2018, 13:34 PM IST

अटल बिहारी वाजयेपी को जितना प्रखर नेता कहा जाता हैं, उतने ही वह प्रखर वक्ता माने जाते हैं. कथनी हो या फिर लेखनी अटल बिहारी वाजपेयी के धुक विरोधी नेता भी उनकी तारीफ किए बिना नहीं रह पाते है. उन्होंने कई कविताएं लिखीं और वक्त आने पर संसद और कई मंचों पर उनको पढ़ा. आइए नजर डालते हैं उनकी कुछ कविताओं पर...

 

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24 घंटे में नहीं सुधरे हालात

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दिल्ली के एम्स में भर्ती पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की हालात फिलहाल नाजुक बनी हुई है. एम्स की ओर से जारी किए गए ताजा बुलेटिन में कहा गया है कि पिछले 24 घंटे में उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ है. गुरुवार सुबह उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू, सुषमा स्वराज, अमित शाह, दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल उनके स्वास्थ्य का हाल जानने के लिए पहुंचे. इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के अलावा कई केंद्रीय मंत्री और राजनेताओं ने एम्स जाकर उनका हाल पूछा.

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'अटल' कविताओं के राजा वाजपेयी

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अटल बिहारी वाजयेपी को जितना प्रखर नेता कहा जाता है, उतने ही वह प्रखर वक्ता माने जाते हैं. कथनी हो या फिर लेखनी अटल बिहारी वाजपेयी के धुक विरोधी नेता भी उनकी तारीफ किए बिना नहीं रह पाते है. उन्होंने कई कविताएं लिखीं और वक्त आने पर संसद और कई मंचों पर उनको पढ़ा. आइए नजर डालते हैं उनकी कुछ कविताओं पर...

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1. गीत नया गाता हूं...

atal bihari vajpayee poems-10

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर , पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर, झरे सब पीले पात, कोयल की कूक रात, प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूं. गीत नया गाता हूँ. टूटे हुए सपनों की सुने कौन सिसकी? अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी. हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा, काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ. गीत नया गाता हूँ.  

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2. कर्तव्य के पुनीत पथ को

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हमने स्वेद से सींचा है, कभी-कभी अपने अश्रु और— प्राणों का अर्घ्य भी दिया है.   किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में— हम कभी रुके नहीं हैं. किसी चुनौती के सम्मुख कभी झुके नहीं हैं.   आज, जब कि राष्ट्र-जीवन की समस्त निधियाँ, दाँव पर लगी हैं, और, एक घनीभूत अंधेरा— हमारे जीवन के सारे आलोक को निगल लेना चाहता है;   हमें ध्येय के लिए जीने, जूझने और आवश्यकता पड़ने पर— मरने के संकल्प को दोहराना है.   आग्नेय परीक्षा की इस घड़ी में— आइए, अर्जुन की तरह उद्घोष करें : ‘‘न दैन्यं न पलायनम्.’’  

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3. टेढ़ा सवाल है...

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कौरव कौन, कौन पांडव, टेढ़ा सवाल है. दोनों ओर शकुनि का फैला कूटजाल है. धर्मराज ने छोड़ी नहीं जुए की लत है. हर पंचायत में पांचाली अपमानित है. बिना कृष्ण के आज महाभारत होना है, कोई राजा बने, रंक को तो रोना है.

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4. खून क्यों सफेद हो गया?

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खून क्यों सफेद हो गया? भेद में अभेद खो गया. बंट गए शहीद, गीत कट गए, कलेजे में कटार गड़ गई. दूध में दरार पड़ गई. खेतों में बारूदी गंध, टूट गए नानक के छंद सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है. वसंत से बहार झड़ गई दूध में दरार पड़ गई. अपनी ही छाया से बैर, गले लगने लगे हैं गैर, खुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता. बात बनाए, बिगड़ गई. दूध में दरार पड़ गई.  

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5. जीवन की ढलने लगी सांझ

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जीवन की ढलने लगी सांझ उमर घट गई, डगर कट गई जीवन की ढलने लगी सांझ. बदले हैं अर्थ, शब्द हुए व्यर्थ शांति बिना खुशियां हैं बांझ. सपनों में मीत, बिखरा संगीत ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ. जीवन की ढलने लगी सांझ.    

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6. क्षमा करो बापू!

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क्षमा करो बापू! तुम हमको, बचन भंग के हम अपराधी, राजघाट को किया अपावन, मंजिल भूले, यात्रा आधी. जयप्रकाश जी! रखो भरोसा, टूटे सपनों को जोड़ेंगे. चिताभस्म की चिंगारी से, अंधकार के गढ़ तोड़ेंगे.

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7. सवेरा है मगर पूरब दिशा में...

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न मैं चुप हूं, न गाता हूं सवेरा है मगर पूरब दिशा में घिर रहे बादल, रूई से धुंधलके में मील के पत्थर पड़े घायल ठिठके पांव, ओझल गांव जड़ता है न गतिमयता स्वयं को दूसरों की दृष्टि से मैं देख पाता हूं न मैं चुप हूँ न गाता हूं. समय की सर्द सांसों ने चिनारों को झुलसा डाला, मगर हिमपात को देती चुनौती एक दुर्ममाला, बिखरे नीड़, विहंसे चीड़, आंसू हैं न मुस्कानें, हिमानी झील के तट पर अकेला गुनगुनाता हूं, न मैं चुप हूं न गाता हूं.    

 

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8. भरी दोपहरी में अंधियारा...

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आओ फिर से दिया जलाएं भरी दुपहरी में अंधियारा सूरज परछाई से हारा अंतरतम का नेह निचोड़ें बुझी हुई बाती सुलगाएं आओ फिर से दिया जलाएं. हम पड़ाव को समझे मंजिल लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल वतर्मान के मोहजाल में आने वाला कल न भुलाएं. आओ फिर से दिया जलाएं. आहुति बाकी यज्ञ अधूरा अपनों के विघ्नों ने घेरा अंतिम जय का वज्र बनाने नव दधीचि हड्डियां गलाएं. आओ फिर से दिया जलाएं.

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9. झुलासाता जेठ मास

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एक बरस बीत गया झुलासाता जेठ मास शरद चांदनी उदास सिसकी भरते सावन का अंतर्घट रीत गया एक बरस बीत गया सीकचों में सिमटा जग किंतु विकल प्राण विहग धरती से अंबर तक गूंज मुक्ति गीत गया एक बरस बीत गया  पथ निहारते नयन गिनते दिन पल छिन लौट कभी आएगा मन का जो मीत गया एक बरस बीत गया

 

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10. भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,

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भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष है. हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है, पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं. पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं. कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है. यह चंदन की भूमि है, अभिनंदन की भूमि है, यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है. इसका कंकर-कंकर शंकर है, इसका बिंदु-बिंदु गंगाजल है. हम जिएंगे तो इसके लिए मरेंगे तो इसके लिए.