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'चन्द्रशेखर आजाद' : जिन्होंने कहा था किसी अंग्रेज की गोली में वो दम नहीं जो मुझे छू सके

क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अप्रतिम व ऐतिहासिक योद्धा थे. उनका जन्म 23 जुलाई, 1906 को भाबरा गांव में हुआ था. उनके पूर्वज उन्नाव जिले के वासी थे. आजाद के पिता का नाम सीताराम तिवारी तथा माता का नाम जगरानी देवी था. चंद्रशेखर आजाद का सिर्फ जीवन ही नहीं बल्कि उनकी मौत भी युवाओं को प्रेरित करने वाली है. 

आशु दास | Feb 27, 2019, 09:43 AM IST

आज ही यानि 27 फरवरी, 1931 को चंद्रशेखर आजाद ने ब्रिटिश शासकों के साथ एक मुठभेड़ में कभी अंग्रेजी पकड़ में न आने की शपथ के चलते खुद को गोली मार ली थी. उनका प्रारंभिक जीवन मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र स्थित भाबरा गांव में बीता था. अत: उन्होंने भील बालकों के साथ खूब धनुष बाण चलाए. उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीख ली थी. बालक चंद्रशेखर आजाद का मन अब देश को आजाद कराने के अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रांति की ओर मुड़ गया था. इसके लिए वह तत्कालीन बनारस आ गए और उस समय बनारस क्रांतिकारियों का गढ़ था. मन्मथ नाथ गुप्ता व प्रणवेश चटर्जी के साथ संपर्क में आने के बाद हिंदुस्तान प्रजातंत्र दल के सदस्य बन गए. आजाद प्रखर देशभक्त थे. काकोरी कांड में फरार होने के बाद से ही उन्होंने छिपने के लिए साधु का वेश बनाकर उसका उपयोग करना चालू कर दिया था.

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आंदोलन में भाग लेने के चलते सुनाई गई सजा

1919 में अमृतसर के जालियावाला बाग नरसंहार ने युवाओं को आक्रोशित कर दिया. जब गांधी जी ने 1921 में असहयोग आंदोलन का फैसला किया तो वह ज्वालामुखी की तरह पूरे देश में फैल गया. देशभर के छात्रों की तरह आजाद भी इस आंदोलन में शामिल हुए. अपने विद्यालय के छात्रों के जत्थे के साथ आंदोलन में भाग लेने पर पहली बार गिरफ्तार हुए असहयोग आंदोलन में भाग लेने के चलते उन्हें 15 बेंत की सजा सुनाई गई. हर बेंत के साथ आजाद के मुंह से 'भारत माता की जय' ही निकलता था.

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द रिवोल्यूशनरी

एक जनवरी, 1925 को दल ने संपूर्ण देश में अपना बहुचर्चित पर्चा 'द रिवोल्यूशनरी' बांटा, जिसमें दल की नीतियों का खुलासा किया गया था. इसमें सशस्त्र क्रांति की चर्चा की गई थी. जब शचींद्र नाथ सान्याल बंगाल में इस पर्चे को बांट रहे थे, तभी बंगाल पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और जेल भेज दिया. संघ की नीतियों के अनुसार, नौ अगस्त, 1925 को काकोरी कांड को अंजाम दिया गया, जिसमें शामिल अधिकांश लोग पकड़ लिए गए, लेकिन आजाद को उनके जीते जी पुलिस नहीं पकड़ सकी. काकोरी कांड में चार क्रांतिकारियों को फांसी और 16 को कड़ी कैद की सजा के बाद आजाद ने उत्तर भारत के सभी क्रांतिकारियों को एकत्र करके आठ सितंबर, 1928 को दिल्ली में एक गुप्त सभा का आयोजन किया, इसी सभा में भगत सिंह को प्रचार प्रमुख बनाया गया. इस सभा में पुराने दल का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन रखा गया.

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सेना प्रमुख का पद संभाला

चंद्रशेखर आजाद ने सेना प्रमुख का पद संभाला. जवाहर लाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में इसे फासीवादी प्रवृत्ति का नाम दिया, जिसकी आलोचना मन्मथ नाथ गुप्ता ने अपने लेखन में की है. दल के एक सदस्य भगत सिंह बहुत आक्रामक हो गए थे तथा एसेंबली में बम फेंकने से लेकर वायसराय की गाड़ी पर फेंकने के कारण आजाद भगत सिंह से नाराज तो हो गए थे, लेकिन आजाद ने कभी उन्हें अकेला नहीं छोड़ा. 

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गांधी-नेहरु ने नहीं मानी आजाद की बात

आजाद ने उनकी फांसी रुकवाने के लिए पूरी एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था. आजाद ने दुर्गा भाभी को गांधी जी के पास भेजा, लेकिन गांधी जी ने साफ मना कर दिया. आजाद ने अपने बलबूते झांसी और कानपुर में अड्डे बना लिए थे. सैंर्ड्स को मारने के लिए सजा पाए भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी रुकवाने के लिए नेहरू से उनके निवास पर भेंट की, लेकिन नेहरू जी ने आजाद की कोई बात नहीं मानी और उनके साथ जोरदार बहस भी हुई.

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लिखी वीरता की नई परिभाषा

बहस के बाद आजाद नाराज होकर अपनी साइकिल पर बैठकर अल्फ्रेड पार्क में अपने साथी सुखदेव राज के साथ मंत्रणा कर रहे थे कि एसएसपी नाट बाबर जीप से वहां आ पहुंचा. पीछे से भारी संख्या में पुलिस बल भी आ गया. दोनों ओर से भयंकर गोलीबारी हुई और आजाद को वीरगति प्राप्त हुई. उनके बलिदान की खबर जंगल में आग की तरह फैल गई और भारी संख्या में भीड़ इकट्ठा हो गई. नेहरू जी की पत्नी कमला नेहरू ने उनके बलिदान की जानकारी अन्य कांग्रेसी नेताओं को दी थी. आजाद की अस्थियां चुनकर एक जुलूस निकाला गया. इलाहाबाद में उनके अंतिम जूलूस में भारी भीड़ एकत्र हुई थी. बलिदान के बाद चन्द्रशेखर आजाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी. उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्‍वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े. आजाद की शहादत के करीब सोलह साल बाद भारत की संपूर्ण आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ लेकिन वे उसे जीते जी देख न सकें. सभी उन्हें पण्डितजी ही कहकर सम्बोधित किया करते थे. (फोटो साभार : @RaviBatra1234)