आजादी के 7 दशक बाद भी अंधेरे में डूबे हैं रतलाम के ये गांव, दिए और चांद के उजाले से चलता है काम

आज के इस युग मे भी मध्यप्रदेश के गांव सिर्फ चांद की रोशनी में जगमगा रहे हैं. आज भी मध्यप्रदेश के गांव अंधेरे में हैं. जहां बिजली के खम्बे, तार, मीटर तो पहुंच गए, लेकिन बिजली अभी भी नहीं पहुंची है.

चंद्रशेखर सोलंकी | Aug 03, 2019, 08:27 AM IST

नई दिल्लीः देश आज विश्व के सामने सीना तान के खड़ा है. देश चंद्रयान 2 से चांद पर पहुंच गया है, लेकिन आज के इस युग मे भी मध्यप्रदेश के गांव सिर्फ चांद की रोशनी में जगमगा रहे हैं. आज भी मध्यप्रदेश के गांव अंधेरे में हैं. जहां बिजली के खम्बे, तार, मीटर तो पहुंच गए, लेकिन बिजली अभी भी नहीं पहुंची है. ऐसा ही कुछ हाल है रतलाम जिले के रावटी तहसील के राजपुरा पंचायत का, जहां के कुछ गांव आज भी लोग बिजली के लिए मोहताज हैं और लगातार प्रशासन से गुहार भी लगा रहे हैं.

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घरों में मीटर भी लगे हैं

 There are also meters in the houses

राजपुरा पंचायत के ढोलावाड़, भुवनपाड़ा, चिल्लर, सागड़ामाल, भोजपुरा व अन्य गांवो में आज भी ग्रामीण बिजली के इंतजार में है. इन गांव में बिजली के खम्बे, बिजली के तार, यहां तक कि घरों में मीटर भी लगे हैं, लेकिन बावजूद इसके बिजली अब तक इन गांव वालों को नहीं मिली है.

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गांव से अंधेरा मिट जाएगा

Darkness will disappear from the village

बीते विधानसभा चुनाव के पहले इन गांव में लोगों को उममीद जगी थी कि अब गांव से अंधेरा मिट जाएगा, क्योंकि अब गांव में बिजली के खम्बे मीटर और तार लग लग गए हैं. ग्रामीणों ने इस उम्मीद में अपने कच्चे मकानों में टीवी और अन्य बिजली उपकरण भी खरीद कर लगवा लिए, लेकिन बिजली की आस में ये उपकरण भी घर मे शो पीस बनकर रह गए.

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बच्चे भी दिए की रौशनी में पढ़ाई करते हैं

Children also study in the light given

बचपन से यहां के लोगों को बिजली नहीं मिली थी. अंधेरे में अपना बचपन गुजार चुके ग्रामीणों को उम्मीद थी अब उनकी आने वाली पीढ़ी को रोशनी मिलेगी और वे इस रौशनी में पढ़ाई कर अपने जीवन को रोशन करेंगे, लेकिन यहां बच्चे आज भी दिए कि रौशनी में पड़ते हैं.

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आज भी ये गांव चिमनी की रौशनी के मोहताज है

 Even today, this village is enchanted by the light of the chimney

स्कूल गांव से दूर हैं. घर आते-आते शाम हो जाती है और फिर सूरज ढलने से पहले ग्रामीण खाना बनाकर खा लेते हैं. फिर यह सिर्फ लालटेन और चिमनी की रोशनी ही सुबह तक इनका साथ देती है. सीएफएल और एलईडी की रोशनी के युग मे आज भी यह गांव चिमनी की रौशनी के मोहताज है, रात में घरो के बाहर सांप और अन्य जंगली जानवर का खतरा अंधेरे के कारण बढ़ जाता है. 

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हर चुनाव में यहां भी लोकतंत्र के पर्व की दुहाई दी जाती है

 Here in every election the festivities of democracy are also given here

ऐसा नहीं की ये लोग मतदान नहीं करते, बल्कि हर चुनाव में यहां भी लोकतंत्र के पर्व की दुहाई दी जाती है. नेता वोट मांगते हैं और अपनी जिंदगी में रौशनी की आस में लगातार सालों से ये ग्रामीण मतदान भी करते हैं.

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सौभाग्य योजना अंतर्गत बिजली का कार्य शुरू हुआ था

Work of electricity started under Saubhagya Scheme

इस दौरान कई सरकारें बदल गईं, लेकिन इनकी किस्मत से अंधेरा नहीं हटा. इन गांव की पंचायत के सरपंच का कहना है कि बड़ी मुश्किल से यहां सौभाग्य योजना अंतर्गत बिजली का कार्य शुरू हुआ था और बिजली के खम्बे भी लगे. घरों के बाहर बिजली के मीटर भी लगे, लेकिन बिजली इन गांवों को नहीं मिली.

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आजादी के 73 साल बाद गांवों में अंधेरा नही मिटा हैं

 After 73 years of independence, darkness has not disappeared in the villages

ऐसा नहीं है कि ग्रामीणों ने इसकी शिकायत अधिकारियों से नहीं की. लगातार शिकायत के बाद भी कोई सुनवाई नही हो रही. अधिकारी सिर्फ जांच का आश्वासन दे रहे हैं, लेकिन इन ग्रामीणों के अंधेरे को दूर करने के लिये कोई कार्रवाई नहीं हो रही है. कुछ दिनों बाद ही हम देश की आजादी का 73वां स्वतंत्रता दिवस मनाएंगे, लेकिन आजादी के इतने सालों बाद भी आज गांवों में अंधेरा नही मिटा हैं.