गांधी जयंती 2019: इस गांव ने सहेज रखी हैं बापू की यादें, आज भी कायम है चरखा चलाने की परंपरा

आजादी के इतने साल बाद भी गांव में यह परम्परा कायम है. जरूरत इन्हें सरकारी मदद की है, जो आज तक नही मिली. दिखावे के लिए सरकार ने एक प्रशिक्षण केंद्र खोला है, जिसमें अब ठेकेदार का सीमेंट की बोरियां रख ताला लगा दिया गया है.

ज़ी न्यूज़ डेस्क | Oct 02, 2019, 09:29 AM IST

सतनाः मध्य प्रदेश के सतना जिला मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर दूरी पर बसा एक गांव आज भी महात्मा गांधी के सिखाए पाठ पर चल रहा है. स्वाभलंबन की प्रथा को बनाए रखने वाले इस गांव के लगभग हर घर में एक चरखा चलता है. जो इनकी जरूरत भी है और परम्परा भी, क्योंकि बुजुर्गों ने महात्मा गांधी से पाठ सीखा और इन्हें विरासत में दे गए. आजादी के इतने साल बाद भी गांव में यह परम्परा कायम है. जरूरत इन्हें सरकारी मदद की है, जो आज तक नही मिली. दिखावे के लिए सरकार ने एक प्रशिक्षण केंद्र खोला है, जिसमें अब ठेकेदार का सीमेंट की बोरियां रख ताला लगा दिया गया है.

 

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हर घर में चलता है चरखा

सतना जिला मुख्यालय से 90 किलोमीटर दूर बसे रामनगर कस्बे का यह गांव है सुलखमा. यहां की आबादी लगभग साढे 3 हजार है. जहां के घरों में चरखे की आवाज आज भी सुनाई देती है. या यूं कहें हर घर में चरखा चलता है. पाल जाति से बाहुल्य इस गांव की यह परम्परा महात्मा गांधी के सिखाए पाठ की वजह से है. 

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महिलाएं तैयार करती हैं सूत

Women make yarn

असल में गांधी जी ने जिस स्वालम्बी भारत का सपना संजोया था उसका पालन आज भी इस गांव में हो रहा है और चरखे से कपड़े और कम्बल बनाकर यहां के लोग बेचते हैं. काम भी बंटा हुआ है. चरखा चलाकर सूत कातने का काम घर की महिलाओं का होता है, जो घर के बाकि काम निपटाकर खाली बचे समय में चरखे से सूत तैयार करती हैं. इसके बाद का काम घर में पुरूषों का होता है, जो इस सूत से कम्बल और बाकि चीजें बुनने का काम करते हैं.

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ग्रामीणों को नहीं मिल रही मजदूरी

Villagers are not getting wages

बजुर्गों की परम्परा पर आधारित ये रोजगार या यूं कहें विरासत अब कमजोर होने लगी है. कारण यह है क्योंकि कई दिनों तक चरखा कातने और बुनने के बाद भी इन लोगों को पूरी मजदूरी तक नहीं मिल पाती है. इनके बच्चे भी देखते हैं तो उनके मन में प्रश्न आता है कि ये जो काम आप लोग करते हैं ये तो महात्मा गांधी भी करते थे.

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ग्रामीणों के पास नहीं है रोजगार

Villagers do not have employment

ग्रामीणों को इन सब के बाद भी आज तक प्रशासनिक मदद नहीं मिल पाई है. लोग आते हैं और देख कर चले जाते हैं. ग्रामीणों के पास कोई रोजगार नहीं है, बस घर परिवार चल रहा है. ग्रामीणों का मानना है कि अगर सरकारी मदद से यही काम मशीनरी से करें तो ना सिर्फ पूरी मजदूरी मिलेगी बल्कि इनकी गरीबी भी दूर होगी. 

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लोगों को कोई प्रशासनिक मदद नहीं मिली है

People have not received any administrative help

इन सब के बीच भले ही जो समस्या हो पर यहा के लोग खुश है और गर्व के साथ इस परम्परा को जीवित किए हुए हैं. इसलिए नहीं कि इनकी जरूरत है, बल्कि इसलिए क्योंकि इनके बुजुर्गों ने जो पाठ महात्मा गांधी से सीखा था उसे पूरा करने का दायित्व इनके कंधे पर है. ये इनके लिए धरोहर है. आज तक हम लोगों को कोई प्रशासनिक मदद नहीं मिली है.