14 भाई-बहनों में सबसे छोटे थे भीमराव, ऐसे मिला था उपनाम 'आंबेडकर'

भारतीय संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर का महापरिनिर्वाण दिवस 6 दिसंबर यानि की आज मनाया जा रहा है.

ज़ी न्यूज़ डेस्क | Dec 06, 2018, 12:10 PM IST

आंबेडकर बेशक से आज इस दुनिया में न हों, लेकिन उनके विचार और कथन हमेशा ही युवाओं को प्रेरित करते रहेंगे. 

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सत्ता-विपक्ष दोनों आना चाहते थे करीब

अपने विचारों से आंबेडकर आज भी जीवंत हैं. देश के प्रधानमंत्री हों या फिर विपक्ष के नेता आंबेडकर के विचारों से प्रभावित होने के लिए अक्सर नेता उनसे मिला करते थे. हालांकि वह खुद भी एक राजनेता थे, लेकिन राजनीति से ज्यादा वह आंदोलन में सक्रिय रहते थे. 

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आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर गहरी पैठ

आंबेडकर के विचार महान होने का एक कारण यह भी था कि वो सिर्फ अर्थ नीतियों पर विचार नहीं करते थे, बल्कि सामाजिक मुद्दों पर भी गहरी पैठ रखते थे. वेलफेयर स्टेट, दलित, किसान, मजदूर और महिला अधिकार जैसे मुद्दों पर आंबेडकर ने गहन विचार दिए और समाज के हर तबके को प्रेरित किया. आजादी के 70 साल बाद भी आंबेडकर के विचार समाज के हर तबके को प्रेरित कर रहे हैं.

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उपनाम के पीछे है दिलचस्प कहानी

डॉ. भीमराव का जन्म 4 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू में एक महार परिवार में हुआ था. मूल रूप से आंबेडकर महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के निवासी थे. 14 भाई बहनों में सबसे छोटे होने के कारण भीमराव को बचपन से ही ज्यादा प्यार मिला. शुरुआती दिनों में ही आंबेडकर के पिता रामजी ने उनकी पढ़ाई पर ध्यान दिया. बेसिक शिक्षा पूरी होने के बाद आंबडेकर 1907 में बम्बई के गर्वमेंट हाई स्कूल से मैट्रिक परीक्षा पास की. 

 

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गुरु ने दिया उपनाम

भीमराव की काबिलियत को देखने के बाद उनके गुरु बालक सकपाल काफी अचंभित थे. परीक्षा के बाद उन्होंने भीमराव को पास बुलाकर कहा कि आज तुमने पूरे अंबावाड़े गांव का पूरा नाम रोशन किया है, तो तुम आज से अंबेवाड़ीकर कहलाओगे.' वक्त के साथ अंबेवाड़ीकर ही आंबेडकर हो गया. मैट्रिक की पढ़ाई पूरी होने के बाद भीमराव ने कहा ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कीं.

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दलितों के मसीहा

बहुमुखी प्रतिभा और ज्ञान के धनी आंबेडकर को हम सामान्य रूप से ‘दलितों के मसीहा’ या ‘सामाजिक न्याय के पुरोधा’ के रूप में ही संबोधित करते हैं. यह उनके साथ आज तक हुई सबसे बड़ी नाइंसाफी है, जिसकी ज़िम्मेदार मूल रूप से हमारी शिक्षा-व्यवस्था और स्वतंत्रता के बाद की सरकारें एवं इतिहासकार हैं जिन्होंने कई दशकों तक आंबेडकर को महज़ इन्हीं दोनों सांचों में डाल कर उनको पूरे देश के समक्ष प्रस्तुत किया.