कांग्रेस नेता अश्विनी कुमार ने माना, भारतीयों का राजनेताओं के प्रति बढ़ा है अविश्वास

कांग्रेस नेता अश्विनी कुमार ने समाचार एजेंसी भाषा से 5 सवाल के जवाब में भारतीय लोकतंत्र, देश की राजनीति, चुनाव जैसे कई मुद्दों पर आधारित प्रश्नों का बेबाकी से जवाब दिया.

कांग्रेस नेता अश्विनी कुमार ने माना, भारतीयों का राजनेताओं के प्रति बढ़ा है अविश्वास
उन्होंने कहा, ''राजनेता सत्ता के प्रति समर्पित हैं'' (फाइल फोटो)

नई दिल्ली: भारतीयों में लोकतंत्र के प्रति संतुष्टि का स्तर तमाम विकसित देशों से ज्यादा है मगर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से गठित सरकार चलाने वाले राजनेताओं के प्रति घटते विश्वास के मामले में भारत, रवांडा से भी पीछे हो गया है. चुनाव महज सत्ता में पहुंचने की तिकड़म बन जाने के मद्देनजर चुनाव प्रक्रिया में माकूल बदलाव के बारे में चल रही बहस पर पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार से भाषा के पांच सवाल : 

प्रश्न: एक अध्ययन के मुताबिक लोकतांत्रिक व्यवस्था से 79 फीसदी भारतीय संतुष्ट हैं. ब्रिटेन में यह 52 प्रतिशत, अमेरिका में 46 प्रतिशत और स्पेन में 25 प्रतिशत है. वहीं, लोकतांत्रिक पद्धति से निर्वाचित सरकारें चलाने वाले राजनेताओं के प्रति विश्वास के मामले में भारत, रवांडा से नीचे 33वें पायदान पर पहुंच गया है. आप इसे व्यवस्था की खामी मानते हैं या नेताओं का दोष? 

उत्तर: एक बात साफ है कि आजादी के बाद लोकतंत्र में जिस तरह से राजनेताओं की गरिमा बननी चाहिये थी वह नहीं बन सकी. इसके तमाम कारण हो सकते हैं लेकिन मुख्य वजह राजनेताओं का आम जन के प्रति समर्पित होने के बजाय सत्ता के प्रति समर्पित होना है. व्यवस्था के संचालन की मौलिक जिम्मेदारी राजनेताओं की ही है इसलिये इसमें खामियों के लिये प्रथम दृष्टया राजनेता ही दोषी हैं. व्यवस्था की खामी तब मानी जाती जबकि राजनेताओं के समर्पित होने के बाद भी बेहतर परिणाम नहीं मिलते. 

प्रश्न : लोगों में लोकतंत्र के प्रति बढ़ता विश्वास और नेताओं के प्रति अविश्चास की बढ़ती खाई की क्या वजह है? 
उत्तर: बेशक, लोकतंत्र भारतीय जीवन पद्धति का मूल तत्व है. अगर व्यवस्था चलाने वाले नेताओं की बात करें तो पिछले कुछ दशकों में नेताओं की विश्वसनीयता तेजी से गिरी है. इसकी वजह, नेताओं द्वारा जिस गति से चुनाव प्रक्रिया को दूषित किया गया, उस गति से चुनाव प्रक्रिया में सुधार नहीं हो पाना है. चुनाव में धनबल और बाहुबल से हुयी शुरुआत अब धर्म जाति के प्रपंच से आगे जाकर तकनीक (सोशल मीडिया आदि माध्यमों) का दुरुपयोग कर मतदाताओं को भ्रमित करने तक जा पहुंची है. इन बुराइयों को रोकने के लिये किये गये उपाय नाकाफी साबित होने के कारण विधायिका में अवांछित सदस्यों की संख्या बढ़ी है. नतीजतन, विधायिका से चुनाव सुधार के उपयुक्त कानून बनाने की उम्मीद भी धूमिल हो रही है. 

प्रश्न: जनता और राजनेताओं के पांच साल में एक बार चुनाव के दौरान ही आमने सामने आने से जवाबदेही का विकल्प बेहद सीमित हो जाता है. क्या यह चुनाव प्रक्रिया की बड़ी खामी नहीं है? 
उत्तर : निर्वाचन प्रणाली में धनबल और बाहुबल जनता की अपेक्षाओं के प्रतिनिधित्व को प्रभावित करता है. इसका तात्कालिक प्रभाव जवाबदेही में कमी के रूप में दिखता है. परिणामस्वरूप विधायिका में लोगों के प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता जिस तरह से निखर कर आना चाहिये, वह नहीं आ पाती है. 

प्रश्न: आजादी के 70 साल बाद भी चुनाव प्रक्रिया की खामियों पर चर्चा हो रही है. क्या यह माना जाये कि देश को एक आदर्श और निर्विवाद चुनाव प्रक्रिया की जरूरत है? 
उत्तर: यह विडंबना ही है कि भारत के साथ आजाद हुये देश कहां से कहां पहुंच गये और हम 70 साल बाद भी अपनी सरकारों के निर्वाचन की उपयुक्त व्यवस्था को तलाश रहे हैं. चुनाव प्रक्रिया में आयी खामियों के मद्देनजर विशेषज्ञों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुदृढ़ करने के लिये गहन मंथन कर समय समय पर महत्वपूर्ण सुझाव दिये हैं. लेकिन आम राय कायम नहीं हो पाने के कारण इन्हें अमल में नहीं लाया जा सका है. इस नाकामी के लिये विधायिका के सदस्यों में गुणवत्ता की कमी ही जिम्मेदार है. इस कमी को दूर करना अब नितांत जरूरी है क्योंकि अगर लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठ गया तो फिर कुछ नहीं बचेगा.

प्रश्न: भारत के लिये प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली के बजाय आस्ट्रेलिया, अमेरिका और कनाडा की तर्ज पर वरीयता मत प्रणाली (रेंकिंग वोटिंग सिस्टम) को आप कितना उपयुक्त मानते हैं? 
उत्तर : निर्वाचन पद्धति में सुधार और बदलाव को लेकर कई विचार चर्चा के दौर में हैं. लेकिन मौजूदा प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली की जगह रैंकिंग सिस्टम जैसी बिल्कुल नयी प्रणाली लागू करने का विचार आधिकारिक तौर पर सामने नहीं आया है. यह विचारकों के बीच चर्चा का विषय जरूर हो सकता है लेकिन यह लागू करने के लिये विचार के स्तर पर नहीं है. बतौर पूर्व कानून मंत्री, मेरा मानना है कि देश के समाजिक आर्थिक तानेबाने को देखते हुये मौजूदा व्यवस्था में कारगर सुधारों को ईमानदारी से लागू करना ही व्यवहारिक होगा. 

प्रश्न : चुनाव सुधार सिर्फ बहस के स्तर पर हैं. इनका लागू होना दूर की कौड़ी लगता है. ऐसे में वैकल्पिक व्यवस्था की बात क्यों नहीं की जानी चाहिये? 
उत्तर: वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में अभी मैने चिंतन नहीं किया है. यह सही है कि चुनाव की मौजूदा व्यवस्था की व्याख्या और इसके परिणाम पर विचार करना जरूरी है. क्योंकि वर्तमान तरीके से हम अपने लोकतंत्र को सशक्त नहीं कर पाये हैं. नये विकल्प की बात ढांचागत बुनियादी बदलाव से जुड़ी है और इसके प्रति मुझे स्वयं को अभी आश्वस्त करना है कि क्या सर्वश्रेष्ठ विकल्प हो सकता है. इस सबके बीच अच्छी बात यह है कि देश में चुनाव सुधार पर गंभीर चर्चा शुरु हो गयी है. मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं इसीलिये हम सुधार की ओर बढ़ रहे हैं. यह रचनात्मक कदम है.