Chanakya Niti: जानें, किन 3 लोगों के साथ रहने पर विद्वान व्यक्ति भी दुखी हो जाते हैं

चाणक्य नीति में लिखे अपने श्लोकों के माध्यम से आचार्य चाणक्य हमें यह बताना चाहते हैं कि जीवन जीने का सही तरीका क्या है और हमें कैसे लोगों से दूर ही रहना चाहिए.

Chanakya Niti: जानें, किन 3 लोगों के साथ रहने पर विद्वान व्यक्ति भी दुखी हो जाते हैं
क्या कहती है आज की चाणक्य नीति?

नई दिल्ली: चाणक्य जिन्हें कौटिल्य और विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है, को भारत के महान अर्थशास्त्री और राजनीतिज्ञ के रूप में जाना जाता है. उन्हें समाज शास्त्र की भी गहरी समझ थी. चाणक्य (Chanakya) ने कई ग्रंथों की रचना की है और उनके विचार और नीतियों की मदद से जीवन की अहम समस्याओं का हल मिलता है. चाणक्य ने अपने जीवन के अनुभवों को श्लोक के माध्यम से चाणक्य नीति (Chanakya Niti) में विस्तार से लिखा है. चाणक्य के विचार भले ही सैकड़ों साल पहले लिखे गए हों लेकिन वह आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं. 

इन 3 का साथ देने पर विद्वान भी दुखी हो जाते हैं

चाणक्य नीति में एक श्लोक है: मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टास्त्रीभरणेन च। दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति॥
अर्थात, मूर्ख शिष्य को पढ़ाने पर, दुष्ट स्त्री के साथ जीवन बिताने पर और दुखी और रोगियों के बीच में रहने पर विद्वान व्यक्ति भी दुखी हो ही जाता है।

अपने इस श्लोक के माध्यम से चाणक्य यह बताना चाहते हैं कि अगर आप चाहते हैं कि आपका जीवन सुखी रहे और आपको बेवजह के दुख और तकलीफ का सामना न करना पड़े तो किसी मूर्ख व्यक्ति को शिक्षा न दें. जो मूर्ख है वह आपके बार-बार समझाने पर भी सही कार्य नहीं करेगा तो आपको दुख होगा और आपकी ऊर्जा भी व्यर्थ जाएगी इसलिए मूर्ख शिष्य को पढ़ाने से व्यक्ति खुद ही दुखी हो जाता है. इसके अलावा अगर आपका जीवनसाथी अच्छे स्वभाव का नहीं है तब भी आपको जीवनभर दुख ही उठाना पड़ेगा और अगर आप ऐसे लोगों के बीच रहते हैं जो हर समय दुखी रहते हैं या बीमार रहते हैं तब भी आपको दुख ही होगा.

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दुष्ट की संगति श्रेष्ठ को भी नष्ट कर देती है

इसके अलावा एक अन्य श्लोक में लिखा है: दुराचारी च दुर्दृष्टिर्दुराऽऽवासी च दुर्जनः। यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्र विनश्यति ॥
अर्थात दुराचारी, दुष्ट स्वभाव वाला, बिना किसी कारण दूसरों को हानि पहुंचाने वाला और दुष्ट व्यक्ति से मित्रता रखने वाला श्रेष्ठ पुरुष भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है क्योंकि संगति का प्रभाव बिना पड़े नहीं रहता है।

इस श्लोक के माध्यम से आचार्य चाणक्य यह बताना चाहते हैं कि संगति का व्यक्ति के जीवन पर कितना गहरा असर पड़ता है. बुरे स्वभाव वाले और दूसरों को हानि पहुंचाने वाले व्यक्ति से मित्रता करने वाला व्यक्ति शुरुआत में भले ही कितना ही अच्छा क्यों न हो, लेकिन दुष्ट व्यक्ति की संगति में रहते-रहते वह भी वैसा ही बन जाता है.

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