Raksha Bandhan से जुड़ी हैं कई रोचक कहानियां, पौराणिक कथाओं में ये है महत्व

सावन की पूर्णिमा पर कृषि प्रधान देश भारत के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्‍न तरीकों से त्योहार मनाने की परंपरा सालों से चली आ रही है. वहीं इसी तिथि पर पूरे देश में रक्षाबंधन का त्योहार (Raksha Bandhan Festival) मनाया जाता है. 

Raksha Bandhan से जुड़ी हैं कई रोचक कहानियां, पौराणिक कथाओं में ये है महत्व

नई दिल्ली: सावन की पूर्णिमा पर कृषि प्रधान देश भारत के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्‍न तरीकों से त्योहार मनाने की परंपरा सालों से चली आ रही है. वहीं इसी तिथि पर पूरे देश में रक्षाबंधन का त्योहार (Raksha Bandhan Festival) मनाया जाता है. रक्षाबंधन के संबंध में कई रोचक कहानियां (Raksha Bandhan's Interesting stories) हैं.  वैसे तो यह पर्व भाई-बहन के रिश्‍ते का प्रतीक है लेकिन पौराणिक कथा के अनुसार, देवासुर संग्राम में जाते समय इंद्र को उनकी पत्‍नी शची ने रक्षासूत्र बांधा था. 

एक कहानी मुगलों की भी 
रक्षाबंधन को लेकर मध्यकालीन इतिहास से जुड़ी एक कहानी है कि मेवाड़ की महारानी कर्णावती के राज्य पर जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने हमला किया था तो महारानी ने मुगल बादशाह हुमायूं को भाई मानते हुए उनको राखी भेजकर उनसे मदद मांगी थी. रानी कर्णावती ने हालांकि जौहर कर लिया था लेकिन हुमायूं ने उनके राज्य की रक्षा कर उसे उनके बेटे को सौंप दिया था. इसी कहानी के परिप्रेक्ष्य में भाई-बहन के रिश्तों के पर्व के तौर पर रक्षाबंधन मनाया जाता है.

ये भी पढ़ें: कोरोना से जंग जीतने के बाद Amitabh Bachchan ने किया ये पहला ट्वीट

पत्‍नी ने पति को बांधा था रक्षा सूत्र
पूर्व नौकरशाह और गणित व ज्योतिष विद्या के जानकार अनिल जैन कहते हैं कि रक्षा-सूत्र बांधने की कथा पुराणों में अलग तरीके से वर्णित है. लेकिन भारतीय सिनेमा ने इसे भाई-बहन के रिश्तों के पर्व के तौर पर ज्यादा प्रचारित किया, जिसके कारण रक्षाबंधन आज भाई-बहन के पर्व के रूप में प्रचलित है.

जबकि एक पौराणिक कथा के अनुसार, देवराज इंद्र को उनकी पत्‍नी शची ने देवासुर संग्राम में जाते समय उनकी कलाई पर रक्षासूत्र बांधा था, जिससे उस संग्राम में उनकी रक्षा हुई और वह विजय प्राप्त कर लौटे थे. इस प्रकार, पत्‍नी इस अवसर पर अपने पति को राखी यानी रक्षासूत्र बांधती है.

भाई-बहन के संबंध में भी एक पौराणिक कथा है कि एक बार बलि के आग्रह पर भगवान विष्णु ने उनके साथ रहना स्वीकार कर लिया. इसके बाद लक्ष्मी वेश बदलकर बलि के पास गईं और उनकी कलाई पर राखी बांधी जिसके बदले में बलि ने उनसे मनचाहा उपहार मांगने को कहा. लक्ष्मी ने उपहार के रूप में भगवान विष्णु को मांग लिया. 

एक पौराणिक कथा भगवान कृष्ण और द्रोपदी से भी जुड़ी है. एक बार भगवान कृष्ण की अंगुली कट गई थी जिसे देख द्रौपदी ने बिना देर किए अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर भगवान की अंगुली को बांध दिया. भगवान कृष्‍ण द्रौपदी के इस कार्य से काफी द्रवित हुए. कहा जाता है कि भगवान ने इसके बदले में द्रौपदी की रक्षा तब की थी जब उसका चीरहरण हो रहा था.

श्रावणी पूर्णिमा पर कहीं-कहीं पुरोहित ब्राह्मण व गुरु भी रक्षा-सूत्र बांधते हैं. रक्षासूत्र बांधते हुए वे रक्षासूत्र का मंत्र पढ़ते हैं. ये मंत्र है- 'येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल, तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल.'  अर्थात दानवों के महाबलशाली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूं. हे रक्षे! (रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो. इस प्रकार, पुरोहित अपने यजमान को रक्षासूत्र बांधकर उनको धर्म के पथपर प्रेरित करने की कामना करते हैं.

ये भी देखें-