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मंगला आरती के साथ विंध्याचल में शुरू हुआ नौ दिन का त्योहार, माता के जयकारों से गूंजा विंध्य क्षेत्र

आदिशक्ति जगदंबा का परम धाम विंध्याचल (Vindhyachal) केवल एक तीर्थ नहीं बल्कि प्रमुख शक्तिपीठ (Shaktipeeth) है. शारदीय नवरात्र (Navratra) में लगने वाले विशाल मेले में दूर-दूर से भक्त मां के दर्शन के लिए आते हैं. 

मंगला आरती के साथ विंध्याचल में शुरू हुआ नौ दिन का त्योहार, माता के जयकारों से गूंजा विंध्य क्षेत्र
(फाइल फोटो)

राजेश मिश्र, मिर्जापुर: रविवार 29 सितंबर को सुबह मंगला आरती (Mangla Aarti) के साथ नौ दिन का नवरात्र (Navratra) आरंभ हो गया. शारदीय नवरात्र (Navratra) में नौ दिनों तक नवदुर्गा के विभिन्न रूपों की पूजा होगी. मां दुर्गा (Maa Durga) अभीष्ट सिद्धि और अभीष्ट योग में भक्तों की हर कामना पूरा करेगी. आदिशक्ति जगदंबा का परम धाम विंध्याचल (Vindhyachal) केवल एक तीर्थ नहीं बल्कि प्रमुख शक्तिपीठ (Shaktipeeth) है. शारदीय नवरात्र (Navratra) में लगने वाले विशाल मेले में दूर-दूर से भक्त मां के दर्शन के लिए आते हैं. नवरात्र (Navratra) में आदिशक्ति के नौ रूपों की आराधना की जाती है.

पहले दिन हिमालय (Himalaya) की पुत्री पार्वती (Parvati) अर्थात शैलपुत्री के रूप में आदिशक्ति का सविधि पूजन अर्चन करने का विधान है. प्रत्येक प्राणी को सद्मार्ग पर प्रेरित करने वाली मां का यह स्वरूप सभी के लिए वंदनीय है. विंध्य पर्वत (Vindhya parvat) और पापनाशिनी मां गंगा (Ganga) के संगम तट पर विराजमान मां विंध्यवासिनी शैलपुत्री (Shailputri) के रूप में दर्शन देकर अपने सभी भक्तों का कष्ट दूर करती हैं. नवरात्र (Navratra) के पहले दिन श्रद्धालुओं ने पूरी श्रद्धा के साथ आदिशक्ति मां विंध्यवासिनी का दर्शन पूजन किया. घंटी घड़ियालों से पूरा विंध्य क्षेत्र गुंजायमान हो गया.

अनादिकाल से भक्तों के आस्था का केंद्र बने विंध्य पर्वत व मां भागीरथी के संगम तट पर श्रीयंत्र पर विराजमान मां विंध्यवासिनी का प्रथम दिन शैलपुत्री के रूप में पूजन व अर्चन किया जाता है. शैल का अर्थ पहाड़ होता है. कथाओं के अनुसार पार्वती पहाड़ों के राजा हिमालय की पुत्री थीं. पर्वत राज हिमालय की पुत्री को शैलपुत्री भी कहा जाता है. उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल का फूल है. भारत के मानक समय के लिए बिन्दु के रूप में स्थापित विंध्यक्षेत्र में मां को बिन्दुवासिनी अर्थात विंध्यवासिनी के नाम से भक्तों के कष्ट को दूर करने वाला माना जाता है. प्रत्येक प्राणी को सद्मार्ग पर प्रेरित करने वाली मां शैलपुत्री सभी के लिए आराध्य हैं. कलश स्थापना कर पूजन करने से नौ दिन में मां दुर्गा मन, वचन, कर्म सहित इस शरीर के नौ द्वार से मां सभी भक्तों की मनोकामना को पूरा करती हैं. भक्त को जिस-जिस वस्तुओं की जरूरत होती है वह सभी माता रानी प्रदान करती हैं. आज के दिन साधक के मूलचक्र का जागरण होता है.

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सिद्धपीठ में देश के कोने-कोने से ही नहीं विदेश से आने वाले भक्त मां का दर्शन पाकर निहाल हो उठते हैं. दर्शन करने के लिए लंबी-लंबी कतारों में लगे भक्त मां का जयकारा लगाते रहते हैं. भक्तों की आस्था से प्रसन्न होकर मां उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी कर देती हैं. जो भी भक्त की अभिलाषा होती है मां उसे पूरी करती हैं. मां के धाम में पहुंचकर भक्त परम शांति की अनुभूति करते हैं. उन्हें विश्वास है कि मां सब दुःख दूर कर देंगी. 

नवरात्र (Navratra) में मां के अलग-अलग रूपों की पूजा कर भक्त सभी कष्टों से छुटकारा पाते हैं. माता के किसी भी रूप में दर्शन करने मात्र से प्राणी के शरीर में नयी उर्जा, नया उत्साह व सदविचार का संचार होता है और मां अपने भक्तों के सारे कष्टों का हरण कर लेती है. नवरात्र (Navratra) के नौ दिन विंध्य क्षेत्र में लाखों भक्त मां का दर्शन पाने के लिए आते हैं.