छठ महापर्व का तीसरा दिन आज, जानें क्यों दिया जाता है डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य

छठ पर्व के हर दिन का खास महत्‍व है. छठ के तीरसे दिन शाम को ढलते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. 

छठ महापर्व का तीसरा दिन आज, जानें क्यों दिया जाता है डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य
फाइल फोटो

नई दिल्ली: छठ की महाछठा दिखने लगी है. देश में छठ बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा है. पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत, बिहार और झारखंड के हिस्सों में मनाए जाने वाले छठ पर्व की शुरुआत 11 नवंबर से हो गई है. छठ में भगवान सूर्य की उपासना की जाती है. इस व्रत को करने के नियम बेहद कठिन होते हैं. इसमें स्त्रियां 36 घंटे तक निर्जला ब्रत रखती हैं और अपनी संतान व पति की लंबी आयु के साथ घर की सुख शांति के लिए प्रार्थना करती हैं. इस व्रत को महिलाएं ही नहीं पुरूष भी करते हैं. छठ व्रत का त्‍योहार चार दिनों का होता है. छठ पर्व के हर दिन का खास महत्‍व है. छठ के तीरसे दिन शाम को ढलते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. 

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तीसरे दिन ऐसे होती है पूजा
तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल पष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है. इस दिन प्रसाद को रुप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं. इसके अलावा चावल के लड्डू बनाए जाते है जिसे लडुआ भी कहा जाता है. इसके अलावा चढ़ावे के रूप में लाया गया सांचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है.

शाम को पूरी तैयारी के साथ बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार और पड़ोसी अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट पर जाते है. सभी छठव्रती एक साथ तलाब या नदी के किनारे इकट्ठे होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं. सूर्य को दूध और अर्घ्य का जल दिया जाता है. इसके बाद छठ मैया की भरे सूप से पूजा की जाती है. रात में छठी माता के गीत गाए जाते हैं. 

क्या है महत्व
भारत में सूर्य को भगवान मानकर उनकी उपासना करने की परंपरा ऋग्वैदिक काल से चली आ रही है. सूर्य और उनकी उपासना की चर्चा विष्णु पुराण, भागवत पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण में विस्तार से की गई है. रामायण में माता सीता के जरिए छठ पूजा किए जाने का वर्णन है. वहीं महाभारत में भी इससे जुड़े कई तथ्य हैं. मध्यकाल तक छठ व्यवस्थित तौर पर पर्व के रूप में प्रतिष्ठा पा चुका था, जो आज तक चला आ रहा है.

पौराणिक कथाएं
छठ पर्व को लेकर बहुत सी कथाएं प्रचलित हैं लेकिन एक कथा जो पुराणों में है उसके अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी. इसके प्रभाव से उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति तो हुई परन्तु वह मृत पैदा हुआ. इससे दुखी होकर प्रियवद पुत्र को लेकर शमशान गए और वहां पर पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे तब वहां पर ब्रह्माजी की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और राजा से कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं. हे! राजन् आप मेरी पूजा करें तथा लोगों को भी पूजा के प्रति प्रेरित करें. राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी.