51 शक्तिपीठों में से एक है कोलकाता का कालीघाट मंदिर, इस वजह से है सबसे खास

पश्चिम बंगाल के कोलकाता में कालीघाट एक शक्तिपीठ है. मान्यता के अनुसार मां सती के दाएं पैर की कुछ अंगुलियां इसी जगह गिरी थीं. 

51 शक्तिपीठों में से एक है कोलकाता का कालीघाट मंदिर, इस वजह से है सबसे खास

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल के कोलकाता में कालीघाट एक शक्तिपीठ है. मान्यता के अनुसार मां सती के दाएं पैर की कुछ अंगुलियां इसी जगह गिरी थीं. आज यह जगह काली भक्तों के लिए सबसे बड़ा मंदिर है. बंगाल ही नहीं, देश-दुनिया से लोग यहां माता के दर्शन के लिए आते हैं. वहीं कोरोना संकट के बीच खास तैयारियों के साथ लोगों को मां के दर्शन कराए जा रहे हैं.

हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित मां काली के सबसे प्रसिद्ध मंदिर कालीघाट की. कोलकाता में देवी शक्ति के अनेक प्रसिद्ध स्थल हैं.  लेकिन कालीघाट में स्थित इस काली मंदिर की महिमा बहुत बड़ी है.

51 शक्तिपीठों का वर्णन
कालीघाट काली मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है. हिंदू धर्म के पुराणों के अनुसार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आए. ये बेहद पावन तीर्थस्थान कहलाए. ये तीर्थ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर फैले हुए हैं. देवीपुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है.

काली घाट का ये काली मंदिर भी एक शक्तिपीठ माना जाता है, जहां सती के दाएं पांव की 4 अंगुलियों (अंगूठा छोड़कर) का पतन हुआ था. यहां की शक्ति 'कालिका' व भैरव 'नकुलेश' हैं. इस पीठ में काली की भव्य प्रतिमा मौजूद है, जिनकी लंबी लाल जिह्वा मुख से बाहर निकली है. मंदिर में त्रिनयना माता रक्तांबरा, मुण्डमालिनी, मुक्तकेशी भी विराजमान हैं. पास ही में नकुलेश का भी मंदिर है.

कालीघाट मंदिर में देवी की प्रतिमा में मां काली का मस्तक और चार हाथ नजर आते हैं. यह प्रतिमा एक चौकोर काले पत्थर को तरास कर तैयार की गई है. यहां मां काली की जीभ काफी लंबी है जो सोने की बनी हुई है और बाहर निकली हुई है. दांत सोने के हैं. आंखें तथा सिर गेरूआ सिंदूर के रंग से बना है और माथे पर तिलक भी गेरूआ सिंदूर का है. प्रतिमा के हाथ स्वर्ण आभूषणों और गला लाल पुष्प की माला से सुसज्जित है.

अष्टमी को विशेष पूजा
इसके अलावा मंदिर में “कुंडूपुकर” नामक एक पवित्र तालाब है जो मंदिर परिसर के दक्षिण पूर्व कोने में स्थित है. इस तालाब के पानी को गंगा के समान पवित्र माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि पानी में स्नान मात्र से हर मन्नत पूरा करने की शक्ति होती है. मां कालिका के अलावा शीतला, षष्ठी और मंगलाचंडी के भी स्थान है.

मंगलवार और शानिवार के साथ अष्टमी को विशेष पूजा की जाती है और भक्तों की भीड़ भी बहुत ज्यादा होती है.

यह मंदिर सुबह 5 बजे से रात्रि 10:30 तक खुला रहता है. बीच में दोपहर में यह मंदिर 2 से 5 बजे तक बंद कर दिया जाता है. इस अवधि में भोग लगाया जाता है. सुबह 4 बजे मंगला आरती होती है पर भक्तों के लिए मंदिर सुबह 5 बजे ही खोला जाता है.

नित्य पूजा : सुबह 5:30 बजे से 7:00 बजे
भोग राग : दोपहर 2:30 बजे से 3:30 बजे
संध्या आरती : शाम 6:30 बजे से 7:00 बजे 

कोरोना संकट के बीच भी आस्था में कोई कमी नहीं
एक प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार एक बार एक भक्त ने भागीरथ नदी से प्रकाश की उज्जवल किरण देखी. उसने प्रकाश स्थित किया और एक मानव पैर की उंगली के रूप में पत्थर के टुकड़े की खोज की. इसके आसपास के क्षेत्र में उन्होंने नकुलेश्वर भैरव का एक स्वयंभू लिंगम पाया. इन छवियों को उसने छोटे से मंदिर में रखा और जंगल में इनकी पूजा करने लगा. मंदिर की लोकप्रियता समय के साथ बढ़ती गई और इस तरह कालीघाट मंदिर को मान्यता मिली.

लोगों का मानना है कि सच्चे मन से यहां आकर जो मुराद मांगे पूरी हो जाती है. यही वजह है कि कोरोना संकट के बीच लोगों की आस्था में कोई कमी नहीं है. लोग मां काली के दर्शन को आ रहे हैं.

51 शक्तिपीठों में से प्रमुख कालीघाट के बारे में मान्यता है कि यहां मां काली जाग्रत अवस्था में हैं, जहां पूरे बंगाल में काली पूजा के दिन देवी काली की आराधना होती है.