ऋषि परंपरा के द्योतक डॉ. कलाम

By pranav purushottam | Last Updated: Friday, July 31, 2015 - 13:19
ऋषि परंपरा के द्योतक डॉ. कलाम

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम शरीर से अब हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन जब भी उत्कृष्ट, समृद्ध और युवा सोच की बात आएगी, हमारी अंगुली पकड़ कर राह दिखाने के लिए वे सदैव हमारे आसपास होंगे। वो एक युगदृष्टा थे। ऋषि परंपरा के द्योतक थे।

डॉ. कलाम 'मिसाइल मैन' के रूप में लोगों के बीच लोकप्रिय थे। जब हम उन्हें ऋषि परंपरा के द्योतक कहते हैं, तो ऋषि का तात्पर्य रिसर्च करने वाले अर्थात अपनी साधना और तपस्या से विश्व और समाज के कल्याण हेतु नई-नई तकनीकों और चीजों की खोज करना। हमारे ऋषि-मुनियों का भी यही उद्देश्य रहा है कि तपस्या और साधना से इस वसुधा को सुखी, संपन्न और समृद्ध बनाया जा सके। डॉ. कलाम ने उन्हीं परंपराओं को आगे बढ़ाने का काम किया है।

उन्होंने जहां एक ओर तकनीक के क्षेत्र में देश की सुरक्षा और आन-बान-शान को बनाए रखने के लिए हमें उन्नत किस्म की मिसाइल प्रदान की तो दूसरी ओर अपनी उत्कृष्ट जीवन शैली से हमें एक नई राह दी। जब हम अपने-आप को युवा कहते हैं तो वह मात्र शरीर से युवा होना नहीं होता बल्कि मन और सोच का युवा होना जरूरी है। युवा किसी जाति, धर्म और संप्रदाय में लिपटे नहीं होते है, वे आध्यात्मिक होते हैं न कि धार्मिक। वह समाज और विश्व के लिए काम करते हैं, जीते हैं। उनमें 'वसुधैव कुटुंबकम' की भावना होती है।

वह बच्चों और युवाओं को बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित करते थे। कहते थे सपना वो नहीं जो हम रात में सोते समय देखते हैं बल्कि सपना वो है जो हमें सोने नहीं देता। उन्होंने बहुत सारी किताबें लिखी जिन्हें पढ़कर हम उनके सोच को भलीभांति जान सकते हैं। अग्नि की उड़ान, भारत भाग्य विधाता, छुआ आसमान, महाशक्ति भारत, भारत की आवाज आदि उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें है। 'अग्नि की उड़ान' के माध्यम से जहां उनके जीवन के संघर्षों और व्यक्तित्व को भलीभांति जान सकते हैं। वहीं दूसरी ओर 'भारत भाग्य विधाता' के माध्यम से भ्रष्टाचार, शासन और जवाबदेही के मुद्दों के व्यवहारिक और चरणबद्ध समाधान प्रस्तुत किए हैं।

हम जब भी चाहें उनकी सोच से, उनकी खोज से मार्गदर्शन ले सकते हैं। वो जब आज सशरीर हमारे बीच नहीं रहे तो इस चीज की कमी बेशक खलेगी। हमारी आंखे नम होंगी। लेकिन इस कृतज्ञ राष्ट्र की यादों में डॉ. कलाम सदैव अमर रहेंगे।

हम सभी की ओर से शत्-शत् नमन !

प्रणव पुरुषोत्तम
pranavpurushottam@gmail.com

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