साइलेंट इंडिया, वायलेंट पाकिस्तान

By Pritesh Gupta | Last Updated: Thursday, July 9, 2015 - 00:21
साइलेंट इंडिया, वायलेंट पाकिस्तान

प्रीतेश गुप्ता
भारत-पाकिस्तान बॉर्डर पर सीज़फायर उल्लंघन का मुद्दा हमेशा सुर्खियों में रहा है। भारत की करीब चौथाई विदेश नीति तो इसी के इर्द-गिर्द घूमती है। भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि चीन और पाकिस्तान से सीमा संबंधी मसलों पर राजनेता ऐसे पेश आते हैं जैसे ये सब पहली या आखिरी बार हो रहा हो। सीमा पर जब-जब सीज़फायर उल्लंघन में सैनिकों को जान गंवानी पड़ी, तब-तब देश में कड़े शब्दों में निंदा हुई है...सिर्फ निंदा! इसके आगे कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। 'यह कायराना हरकत है, इसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता', 'हम इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं, इसका करारा जवाब दिया जाएगा'... इस तरह के जुमले अब जले पर नमक छिड़कने की तरह लगते हैं। 

बेशक, हाल ही में 'ऑपरेशन म्यांमार' के रूप में मोदी सरकार ने एक साहसिक कदम उठाया है, लेकिन अभी भी पाकिस्तान को मुकम्मल जवाब देना बाकी है। ये अलग बात है कि 'बात करने से ही बात बनती है', लेकिन पाकिस्तान के मामले में ऐसे सारे जुमले बेमानी ही लगते हैं। छह दशकों से उलझा हुआ कश्मीर मुद्दा अब विश्व के सर्वाधिक पुराने फसादों की फेहरिस्त में शुमार हो चुका है, जिस पर शायद हमेशा बात ही होती रहेगी। ऐसे तमाम उदाहरण हमारे सामने हैं जब पाकिस्तान ने फ्लैग मीटिंग और राजकीय वार्ताओं के तुरंत बाद अपना असली रंग दिखाते हुए हमले किए हैं। दो बड़ी वैश्विक ताकतों में शुमार चीन और अमेरिका से पाकिस्तान की नज़दीकियां किसी से छुपी नहीं है। मदद के बहाने पैसा किस काम के लिए दिया जाता है और वह किस काम में उपयोग किया जाता है, ये सब अच्छी तरह जानते हैं। विवादित सीमाक्षेत्र में चीन का गैरवाज़िब दखल और हथियारों की सप्लाई भी बड़े खतरे के संकेत हैं।

बचपन के अनुभवों से मुझे एक बात याद आ रही है। जब कोई बच्चा गलती करता है, तो उसकी मां कहती है कि बेटा ऐसा नहीं करते, ये गंदी बात है। वही गलती जब बच्चा दूसरी बार करता है तो मां प्यार और नसीहत भरा एक तमाचा लगाती है, ताकि बच्चा सुधर जाए। सुधार के लिए लाड़-प्यार के साथ थोड़ी पिटाई भी जरूरी होती है। क्या हमारे सरकारी नुमाइंदो और रणनीतिकारों को बचपन में ऐसा प्यारा अवसर नहीं मिला? उन्हें भी उनकी मां ने इस तरह की सीख जरूर दी होगी ना कि रिश्ते बिगड़ने के डर से उनकी हर गलती को नजरअंदाज कर दिया होगा। चुप रहकर सहनशीलता की हदें पार करने से रिश्ते सुधरने वाले नहीं है। रिश्ते सुधारने के लिए ताली दोनों हाथों से बजेगी। हिंदुस्तान को अपने तथाकथित छोटे भाई पाकिस्तान के साथ भी यही करना चाहिए। मेरा मानना है भाई-भाई के इस रिश्ते में प्यार बना रहे इसके लिए समय-समय पर आवश्यक उचित कार्रवाई भी जरूरी है, भले ही इसके लिए हमें आदर्शों को ताक पर रखना पड़े। कभी-कभी आदर्शों की अपेक्षा यथार्थ को मद्देनजर रखकर निर्णय ले लेना चाहिए। एक कहावत है “लातों के भूत बातों से नहीं मानते।” सिर्फ बापू के अहिंसा धर्म का पालन करने से देश को महफ़ूज़ रख पाना कतई संभव नहीं है। इसके लिए कभी-कभी भगतसिंह, चंद्रशेखर, नेताजी सुभाष जैसे शहीदों का आक्रामक चोला भी धारण करना जरूरी है। जैसा आप गाओगे वैसा हम बजाएंगे की तर्ज पर व्यवहार करके ही हम ना'पाक' मंसूबों पर पानी फेर सकते हैं। अन्यथा अफसोस, निंदा, चेतावनी ये सब बेमतलब की बातें हैं। 

इतिहास की तह में न जाकर सिर्फ बीते कुछ सालों पर नजर दौड़ाएं तो हमें देखेंगे कि सीज़फायर उल्लंघन की घटनाओं में साल दर साल बढ़ोतरी ही हुई है। 2006 से 2013 तक करीब 461 बार सरहद पर हद पार की गई है। इस दौरान देश में यूपीए की सरकार थी। लेकिन ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार के आते ही सीमा पर शांति स्थापित हो गई हो। इसके बाद 2014 में ऐसे करीब 562 मामले सामने आए हैं, जो पिछले 11 सालों में सबसे बड़ा आंकड़ा था। वहीं 2015 की बात करें तो साल की शुरुआत ही सीज़फायर से हुई थी और अब तक सैकड़ों बार युद्ध विराम शर्तों का उल्लंघन हो चुका है। कभी जवानों के सिर काटे गए, कभी आंखें निकाल ली गईं... हर बार बर्बरता की हदें पार हुई। 

सत्ता, सिंहासन सब बदल गए, यदि कुछ नहीं बदला तो वो हमारे हुक्मरानों के बयान हैं। हर बार उनके श्रीमुख से सिर्फ इतना ही कहते पाए गए कि 'ऐसे हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे, हम उचित जवाब देंगे।' तिस पर उन्हीं की थाली के दो-चार चट्टे-बट्टे यह उगलते देर नहीं करते कि 'इन घटनाओं से हमारी शांति वार्ता पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।’ जैसे इनकी वार्ता से देश को बहुत कुछ हासिल हो जाने वाला है । 1956 में कश्मीर को भारत में शामिल किए जाने के बाद से अब तक करीब छह दशक बीत चुके हैं, लेकिन अब तक कश्मीर समस्या का हल नहीं हो पाया। प्यार की भाषा पाकिस्तान को समझ में नहीं आती और ये वो सच है जो हिंदुस्तान के नुमाइंदों के समझ में नहीं आता। ऐसे में मुझे आजादी के ठीक बाद कही गई विद्रोही जी की दो पंक्तियां याद आती हैः

"ओ जाने वाले राही तू कहना अपनी सरकार से,
चरखा चलता हाथों से शासन चलता तलवार से।"

इतनी बार पाकिस्तान ने एक ही गलती का दोहराव किया और हम हर बार यही कह कर चुप रह जाते हैं कि इस तरह के हमले बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे और कड़े शब्दों में उसकी निंदा कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। पाकिस्तान को ठोस जवाब दिया जाना चाहिए। अन्यथा इस गलती की कीमत 80 के दशक में आई फिल्म निकाह में हसन कमल द्वारा लिखे गए उस गीत की तर्ज पर गुनगुनाकर ना चुकाना पड़े “शायद उनका आखिरी हो ये सितम, हर सितम ये सोचकर हम सह गए।” ऐसा ही चलता रहा तो हिंदुस्तान के दिल में अमन के जो अरमान छुपे हैं वे किसी दिन सिंधु नदी में बहकर अरब सागर में विलीन हो जाएंगे। बेशक, विदेश नीति से जुड़े मुद्दे रातों रात नहीं सुलझाए जा सकते, लेकिन ऐसी कोई मजबूरी नहीं है कि भारत को पाकिस्तान की गलत हरकतों को सहन करना पड़े।

पढ़ें, अन्य ब्लॉग... गड्ढे में गिरता 'देश का भविष्य', हम हैं कि सुधरने का नाम नहीं ले रहे!

एक्सक्लूसिव

114076112497191514508


comments powered by Disqus

© 1998-2015 Zee Media Corporation Ltd (An Essel Group Company), All rights reserved.