'नियमों' के शिकार किसान

Last Updated: Wednesday, April 15, 2015 - 20:12
'नियमों' के शिकार किसान

वासिंद्र मिश्र
-एडिटर, न्यूज़ ऑपरेशंस, ज़ी मीडिया

फैज़ाबाद में किसानों को हजारों के नुकसान के ऐवज में 75 रुपए से लेकर 100 रुपयों तक का मुआवजा ही क्यों मिला? ये सवाल इतना स्वाभाविक है कि किसी को भी जवाब तलाशने पर मजबूर कर दे। मसलन क्या मुआवजे के नाम पर मज़ाक होता है? क्या राहत के नाम पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार की तरफ से जारी की गई करोड़ों की राशि सिर्फ दिखावा है? किस आधार पर मुआवजा बांटा जाता है?

इस साल बेमौसम हुई बारिश ने कई किसानों की जिंदगीभर की कमाई पर पानी फेर दिया है। उनके पास मदद की आस के अलावा अब कुछ नहीं बचा। लेकिन मदद के नाम पर सरकार की तरफ से 75 रुपए से लेकर 750 रुपए तक के चेक बांटे जा रहे हैं। जाहिर है कि जिस किसान ने एक बीघा में 20 से 25 हजार रुपए खर्च किए होंगे उसके लिए 750 रुपए का चेक उनके नुकसान का मज़ाक उड़ाने जैसा ही है। ये हाल तब है जब प्रदेश की सरकार किसानों के नुकसान की भरपाई के लिए लगभग 500 करोड़ रुपए जारी कर चुकी है और लगातार किसानों को हुए नुकसान का आंकलन कराया जा रहा है, लेकिन नुकसान के आंकलन और मुआवजे के लिए जो नियम हैं, वही किसानों के लिए असल मुसीबतें पैदा करते हैं।

दरअसल, नुकसान का सर्वे युनाइटेड प्रोविंस के रेवेन्यू मैनुअल 1940 के अध्याय 26 के नियमों के आधार पर होता है, जिसमें क्षेत्रफल का सर्वे करने का प्रावधान है। वैसे ये कानून किसानों को मुआवजा देने के लिए नहीं बल्कि लगान और राजस्व माफ करने के लिए बनाया गया था। लेकिन मुआवजे के लिए नुकसान का आंकलन भी इसी के आधार पर किया जाता है। इसकी जिम्मेदारी हलके के लेखपाल की होती है। नियम के मुताबिक सर्वे का आधार खेत नहीं बल्कि क्षेत्रफल होता है। इसका नुकसान कई किसानों को उठाना पड़ता है। उन्हें सही मुआवजा नहीं मिल पाता। हर खेत का नुकसान अलग होता है लेकिन जब मुआवजे की रकम बांटी जाती है तो खेतों की गिनती के आधार पर बांट दी जाती है।

एक गांव में अगर तीन किसान हों और 100 फीसदी नुकसान हुआ हो तो मुआवजा 33-33 फीसदी बांटा जाता है चाहे किसी एक किसान की पूरी फसल तबाह हो गई हो और दूसरे की 20 फीसदी फसल ही क्यों ना बर्बाद हुई हो। इतना ही नहीं जैसे ही ये दायरा गांव से निकलकर ब्लॉक, तहसील और जिले तक पहुंचता है तो इसी फॉर्मूले के तहत नुकसान का आंकड़ा घटता चला जाता है।
 
सीधे शब्दों में समझें तो नुकसान के लिए फंड की मांग करते वक्त आधार उत्पादन लागत नहीं बल्कि क्षेत्रफल के आधार पर किया गया सर्वे होता है और इस सर्वे की प्रक्रिया भी खासी लम्बी होती है। सर्वे लेखपाल करता है और रिपोर्ट तहसीलदार तक जाती है, तहसीलदार इसे एडीएम वित्त को देता है।

एडीएम इसे राहत आयुक्त के पास भेजता है, जहां से रिपोर्ट मुख्य सचिव को भेजी जाती है, फिर मुख्य सचिव इसे भारत सरकार के पास भेजते हैं, कृषि मंत्रालय मुआवजे का प्रस्ताव वित्त मंत्रालय को भेजता है। वित्त मंत्रालय इसे स्वीकृत कर गृह मंत्रालय को भेजता है, गृह मंत्रालय धनराशि को राहत आयुक्त को भेजता है। राहत आयुक्त ये पैसा जिलों में भेजता है। ये प्रक्रिया इतनी लंबी है कि आज के नुकसान की भरपाई होने में महीनों निकल जाते हैं और कई बार सालों भी लग जाते हैं। दूसरा, इस प्रक्रिया से होकर किसानों तक मुआवजे की जो राशि पहुंचती है वो इतनी कम होती है कि उसका कोई सीधा फायदा नहीं मिल पाता।
 
मुआवजे से अलग किसानों को फसल के नुकसान के उबारने के लिए बीमा योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। देश में इस वक्त तीन तरह की बीमा योजनाएं चल रही है। राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना, उच्चीकृत राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना और मौसम आधारित फसल बीमा योजना आदि सारी योजनाएं मिलकर भी किसी भी राज्य के सभी किसानों को अब तक अपने दायरे में नहीं ला पाई हैं। देश के 50 जिलों में लागू उच्चीकृत राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना में फसल नुकसान का आंकलन बीमा कंपनी सैटेलाइट इमेज के इस्तेमाल से कर सकती है। इसमें बीमा क्लेम तीन स्थितियों में होता है, अगर बरसात ना होने पर फसल ना बोई जा सके तो राज्य सरकार बीमा कंपनी को फसल को होने वाले अनुमानित नुकसान का ब्यौरा भेजेगी इसके बाद बीमा कंपनी किसान को तुरंत बीमा क्लेम का 25 फीसदी रकम देगी।

दूसरी स्थिति में खड़ी फसल पर अगर कोई प्राकृतिक आपदा आए और 50 फीसदी से ज्यादा फसल नष्ट होने का आंकलन राज्य सरकार पेश करे तो बीमा कंपनी 25 फीसदी तक क्लेम की रकम देगी। तीसरी स्थिति यह है कि अगर फसल कटने के बाद नष्ट होती है तो किसान को 48 घंटे के भीतर संबंधित बीमा कंपनी या बैंक को फसल के नुकसान की जानकारी देनी है। इसके बाद बीमा कंपनी क्लेम का भुगतान करेगी। इसमें भी तमाम नियम और शर्तें हैं। जैसे अगर कोई किसान बैंक का डिफॉल्टर है तो उसे बीमा क्लेम नहीं मिलेगा। दुर्भाग्य ये है कि ज्यादातर किसान डिफॉल्टर ही होते हैं और कई किसानों को तो बीमा योजना के बारे में पता ही नहीं होता।
 
देश को औपनिवेशिक साम्राज्य (Colonial rule) से आज़ादी जरूर मिल गई। लेकिन आज भी ऐसे कई कानून या नियम ऐसे हैं जो बदले नहीं गए हैं। इसी में से एक नियम ये रेवेन्यू मैनुअल भी है जिसके आधार पर ये तय होता है कि आग, बाढ़ पानी या बेमौसम बरसात से कितना नुकसान हुआ और उसकी भरपाई कितनी होगी। साल दर साल इसे बदले जाने की जरूरत महसूस हुई है। बौद्धिक बहस भी की गई है लेकिन ये बहस बुद्धिजीवियों तक ही सिमट कर रह जाती है। भारत के ज्यादातर गरीब किसानों को ना तो इस रेवेन्यू मैनुअल से कोई लेना- देना होता है ना ही मुआवजे को लेकर हो रही सियासत से। सालों पुरानी व्यवस्था को बदलने की ज़िम्मेदारी रखने वाले तंत्र की उदासीनता ही वो वजह है जिसकी वजह से आज तक इन नियमों को नहीं बदला जा सका है जो अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में अपने फायदों को देखते हुए बनाए थे, जिन्हें भारत के नागरिकों से कोई मतलब नहीं था, जिनकी कोशिश सरकारी खजाने को भरने की थी। लेकिन ये कहां से जायज़ है कि देश में लोकतंत्र की स्थापना के छह दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद भी ऐसे नियमों को बनाए रखा गया है।

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