मोदी जी ! ये पब्लिक है ....

Last Updated: Monday, April 27, 2015 - 17:02
मोदी जी ! ये पब्लिक है ....

वासिंद्र मिश्र
एडिटर, न्यूज़ ऑपरेशंस, ज़ी मीडिया

क्या अमेरिका की तारीफ के बगैर भारत में लोकप्रियता और सुशासन का कोई पैमाना तय नहीं किया जा सकता? क्यों ज़रूरी है अमेरिका की तारीफ? क्या इसके बिना कोई योग्य नहीं माना जा सकता? क्या मजबूरी है कि नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार अमेरिकी प्रशंसा पत्र के ज़रिए अपने राजनैतिक विरोधियों की आवाज़ बंद करना चाहते हैं? वही नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए पूरे एक दशक तक अमेरिकी विरोध का सामना करते रहे और तमाम प्रयासों के बावजूद अमेरिकी वीज़ा हासिल करने में नाकाम रहे। आज वही नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते ही अमेरिकी मेज़बानी और मेहमाननवाज़ी से इतना प्रभावित क्यों हैं। नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी को अमेरिकी प्रशंसा से गद्गद् होने के बजाय उसकी मंशा पर नज़र डालनी चाहिए।

ये वही अमेरिका है जो यूपीए के 10 साल के शासनकाल में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की योग्यता सादगी और नीतियों की खुले दिल से तारीफ करता रहा और तारीफ करके अमेरिकी नीतियों को भारतीय सरज़मीं पर थोपता रहा। साल 2009 में ओबामा ने मनमोहन सिंह को बहुत बुद्धिमान और एक अच्छा इंसान कहकर तारीफ की थी। साल 2010 में G-20 समिट के दौरान ओबामा ने एक बार फिर कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री नमोहन सिंह में आर्थिक मुद्दों की गहरी समझ है इसीलिए भारत विश्व शांति और उत्थान की तरफ बढ़ रहा है।मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी इस अमेरिकी प्रशंसा के आदी हो गए। लिहाजा भारतीय जनमानस की भावनाओं को नहीं समझ पाए और परिणाम 2014 के लोकसभा चुनाव में उनको भुगतना पड़ा।

मौजूदा राष्ट्रपति ओबामा ने सिर्फ भारतीय प्रधानमंत्री की तारीफ नहीं की है बल्कि ओबामा इटली के मातेयो रेंज़ी को Leading Voice of Europe कह चुके हैं। ओबामा इराक के प्रधानमंत्री हैदर अल आब्दी और नाइजीरिया के राष्ट्रपति गुडलक जोनाथन की प्रशंसा भी एक अच्छे नेता के तौर पर की है। अपनी कूटनीतिक चालबाज़ी के चलते अमेरिका हमेशा से दुनिया के विकसित और विकासशील देशों के नेताओं को अपने जाल में फंसाता रहा है। सोवियत रूस का उदाहरण दुनिया के सामने है। सोवियत रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव के जरिए पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त (खुला बाज़ार और पुनर्रचना) लागू करवाकर सोवियत रूस का विघटन तक करा दिया और बदले में गोर्बाचोव को नोबल शांति पुरस्कार से नवाज़ दिया। इराक, अफगानिस्तान, मिडल ईस्ट, पाकिस्तान दुनिया के तमाम विकसित और विकासशील देश ऐसे हैं जिन पर अमेरिका प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से अपनी दादागिरी बनाए हुए है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इतिहास की इस कड़वी सच्चाई से अवश्य सबक लेना चाहिए और 11 महीने में 14 मुल्कों का दौरा करके भारतीय प्रधानमंत्री को सबसे पहले देश की मूलभूत समस्याओं का समाधान खोजने की कोशिश करनी चाहिए।

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 1974 में आई मशहूर फिल्म रोटी के उस सदाबहार गीत 'ये पब्लिक है… ये सब जानती है...' पर ज़रूर गौर फरमाना चाहिए। देश की जनता आंतरिक समस्याओं को लेकर इस कदर बेजार है कि उसको अब सपनों के सौदागरों से कोई लेना-देना नहीं है। उसको अपनी मूलभूत समस्याओं का समाधान चाहिए। अच्छे दिन की उम्मीद में बैठी जनता के सब्र का बांध टूटता जा रहा है।

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