जामा मस्जिद की इमामत पर फिर बुखारी का वर्चस्व, पढ़िए, क्यों बुखारी के दर सर झुकाते हैं बड़े-बड़े नेता?

Last Updated: Wednesday, November 19, 2014 - 16:46
जामा मस्जिद की इमामत पर फिर बुखारी का वर्चस्व, पढ़िए, क्यों बुखारी के दर सर झुकाते हैं बड़े-बड़े नेता?

नई दिल्ली: जामा मस्जिद भारत की सबसे बड़ी मस्जिद है। इस मस्जिद में 22 नवंबर को शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी अपने बेटे शाबान बुखारी को नायाब इमाम बनाएंगे। शाबान की दस्तारबंदी की रस्म पूरी होगी।
इस मस्जिद पर बुखारी परिवार का वर्चस्व रहा है। बुखारी परिवार की राजनीति में हस्तक्षेप करने की परंपरा सबसे पहले अहमद बुखारी के पिता अब्दुल्ला बुखारी के कार्यकाल में हुई। इसके बाद धर्म और राजनीति का गठजोड़ ऐसा बना कि बाद के दशकों में हर नेता राजनीतिक लाभ के लिए शाही इमाम के सामने नतमस्तक होने लगे।
अब यह परिवार 22 नवंबर को 14वें इमाम के तौर पर शाबान की दस्तारबंदी को लेकर सुर्खियों में है।
मस्जिद का इतिहास
मुगल सल्तनत की गवाह जामा मस्जिद का निर्माण बादशाह शाहजहां ने करवाया। मस्जिद का निर्माण कार्य 6 अक्टूबर 1650 को शुरू हुआ और 1956 में जब मस्जिद बनकर तैयार हो गई।
इस मस्जिद का नाम रखा गया 'मस्जिद ए जहांनुमा', यानी पूरी दुनिया को देखने वाली मस्जिद। इसके बाद आगे चलकर इस मस्जिद का नाम 'जुमा मस्जिद' पड़ा। 
मस्जिद का पहला इमाम और इमाम-ए-सल्तनत की पदवी
शाहजहां किसी विशेष व्यक्ति को ही मस्जिद का इमाम बनाना चाहते थे। बादशाह शाहजहां ने उज्बेकिस्तान के शहर बुखारा के बादशाह को एक खत लिखा कि जामा मस्जिद की इमामत के लिए एक बेहतरीन आलिम और अपने जमाने की निहायत बुजुर्ग शख्सियत को भेजा जाए। 
इसके बाद बुखारा के बादशाह ने सैयद अब्दुल गफूर शाह बुखारी को दिल्ली भेजा। इमाम सैय्यद अब्दुल गफूर शाह को बुखारी से दिल्ली लाया गया और 24 जुलाई 1656 को जामा मस्जिद में पहली बार नमाज अदा की गई। शाहजहां ने नमाज के बाद इमाम अब्दुल गफूर को इमाम-ए-सल्तनत की पदवी दी।
400 साल से चली आ रही है शाही इमाम की परंपरा
दुनिया के कई देशों में बादशाहत रही और ख़त्म हो गई। मुग़ल सम्राट आए और चले गए। अंग्रेज़ों को भी गए हुए दशकों बीत गए, लेकिन दिल्ली की ऐतिहासिक जामा मस्जिद के शाही इमाम की 400 साल से चली आ रही सदियों पुरानी परंपरा दिल्ली की जामा मस्जिद में आज भी जारी है।
एक लंबे समय से एक ही परिवार की सरपरस्ती में मस्जिद में चलती आ रही इबादत पर और मस्जिद का असली मालिक कौन है इस पर विवाद रहा है। जामा मस्जिद की निगरानी करने वाले दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड ने इसके ख़िलाफ़ कई बार आवाज़ उठाई।
शाहिद सिद्दकी का कहना है कि इमामत का मामला अब शाही विरासत से साझी विरासत तक जा पहुंचा है। सवाल उठ रहे हैं कि जामा मस्जिद की इमामत का हकदार कौन होगा? क्या शाही इमाम की पीढ़ियों के अलावा मुस्लिम समुदाय के किसी दूसरे जानकार मौलाना या धर्मगुरु इसके वारिस हो सकते हैं?
ऐसे तमाम सवालों के हल खुद मुस्लिम समुदाय ढूंढने में लगा है। इमामत के लिए शाही इमाम के दावे को अब क़ौम की तरफ से ही चुनौती मिल रही है।
प्रोटेक्टिव मॉन्यूमेंट बनाने की बात उठी
जामा मस्जिद को कभी प्रोटेक्टिव मॉन्यूमेंट बनाने के भी बात उठी। लेकिन 20 अक्टूबर 2004 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने शाही इमाम को एक खत लिखा जिसमें उन्होने जामा मस्जिद को प्रोटेक्टिव मॉन्यूमेंट ना घोषित करने का भरोसा दिलाया। भारत सरकार भी एक लंबे समय से जामा मस्जिद के रखरखाव में पैसे खर्च करती आई है।
ये खर्च तब हो रहा है जब जामा मस्जिद आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय सम्पत्ति नहीं है।
1977 के फतवे से भारतीय राजनीति में आया भूचाल
1977 के लोकसभा चुनावों में जामा मस्जिद के इमाम का एक दूसरा पक्ष लोगों के सामने आया। इमाम ने कांग्रेस के खिलाफ फतवा जारी कर दिया और मुसलमानों से जनता पार्टी को समर्थन देने की अपील कर डाली। धार्मिक गुरु के इस राजनीतिक फतवे से भारतीय राजनीति में जबरदस्त हलचल हुई। इंदिरा गांधी चुनाव हार गई।
1977 में इंदिरा गांधी के चुनाव हारने और जनता पार्टी के चुनाव जीतने का अब कारण चाहे जो रहा हो, लेकिन इन दो चुनावों नतीजों से नेताओं को लगने लगा कि इमाम जिसे चाहें उसे चुनाव जितवा सकते हैं। इसके बाद मुसलमानों को रिझाने के लिए बड़े-बड़े राजनेता जामा मस्जिद शीश नवाने पहुंचने लगे।
इसी बीच अहमद बुखारी अपने पिता की छत्रछाया में राजनीति को नियंत्रित करने की अपनी महत्वाकांक्षा के साथ सियासी मैदान में कूद पड़े। इमाम बुखारी का राजनीति या कहे कि राजनीतिक दलों से बहुत लगाव रहा है।
पार्टी दर पार्टी बदलती रहा इमाम का राजनीतिक झुकाव
एक वक्त था जब अहमद बुखारी कांग्रेस के बेहद करीब थे, लेकिन जब बीजेपी का सियासी उत्थान हुआ तो बुखारी का राजनीतिक झुकाव भी वक्त के साथ बदल गया। फिर इमाम बुखारी ने समाजवादी पार्टी की साइकिल के साथ भी खूब दौड लगाई।
2012 में जब यूपी में विधानसभा चुनाव हो रहे थे तो बुखारी ने समाजवाद पार्टी को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। इसी बीच खबर आई कि सपा ने इमाम साहब के दामाद उमर अली खान को सहारनपुर की बेहट विधानसभा सीट से उम्मीदवार बनाया है।
सपा ने जिस इमाम साहब से यह सोचकर समर्थन मांगा था कि इससे यूपी के मुसलमान सपा से जुड़ेंगे खुद बुखारी के दामाद चुनाव हार गए। और वह भी एक ऐसी सीट से जहां कुल वोटरों में से 80 फीसदी मुसलमान थे। दामाद के हार जाने के बाद भी अहमद बुखारी ने हार नहीं मानी। उन्होंने उमर को विधान परिषद का सदस्य बनवा दिया। फिर अनाचक इमाम बुखारी समाजवादियों के खिलाफ खड़े गए। वह अखिलेश यादव, मुलायाम सिंह यादव, आजम खान सबके विरोध में उतर आए।
2014 के लोकसभा चुनावों में जारी किया फतवा
हाल ही के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी का रास्ता रोकने के लिए इमाम बुखारी ने मुस्लमानों से बिहार में लालू की पार्टी आरजेडी बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और पूरे देश में कांग्रेस का समर्थन करने की घोषणा कर डाली।
लेकिन अहमद बुखारी के लिए लोकसभा चुनाव के नतीजे बेहद अफशोसजनक रहे। नजीतों से साफ हो गया कि अहमद बुखारी के फतवे का कोई भी असर नहीं हुआ। इमाम बुखारी का मुस्लिम वोटरों पर किसी तरह का कोई असर वाकई नहीं होता उसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
मुस्लिम बहुल मटिया महल विधानसभा जो जामा मस्जिद  क्षेत्र में स्थित है। पिछले तीन चुनावों में इमाम बुखारी ने खुले तौर पर शोएब इकबाल का विरोध किया, उनके खिलाफ फतवा जारी  किया।
लेकिन हर चुनाव में शोएब और अधिक मतों से जीतते चले गए।
हर एक चुनाव से पहले सियासी दलों की नजर इमाम बुखारी पर टिकी रहती है कि वो किस दल को मुस्लमानों को वोट करने की अपील करते हैं। अब मुस्लमान उनकी अपील को कितना मानते हैं इसका कोई पुख्ता आकड़ां तो कभी सामने नहीं आ पाया लेकिन, एक बात जरूर साबित हो हुई है कि इमाम बुखारी की इन्हीं अपीलों की वजह से मुस्लिमानों पर मुस्लिम वोट बैंक का ठप्पा लग चुका है।
शशि वर्धन

ज़ी मीडिया ब्‍यूरो



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