एलोवेरा के एक आइडिया ने ऐसे बदल दी छुटमलपुर की जिंदगी

By Gitika Verma | Last Updated: Monday, June 29, 2015 - 10:03
एलोवेरा के एक आइडिया ने ऐसे बदल दी छुटमलपुर की जिंदगी

सहारनपुर: पारंपरिक फसलों खेती को छोड़कर एलोवेरा की खेती करने की पहल ने आज छुटमलपुर गांव के लोगों की जिंदगी बदल दी। इस गांव के करीब 70 फीसदी लोगों के लिए यह आइडिया जिंदगी बदलने वाला साबित हुआ।

उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर बसे सहारनपुर जनपद से करीब 22 किलोमीटर दूर स्थित छुटमलपुर गांव में करीब 25 से 30 हज़ार लोग रहते हैं। गांव में प्रवेश करते ही भीड़- भाड़ वाले चौराहे और हरी सब्जी से सजे बाज़ार आपका स्वागत करेंगे। खास बात ये है कि ये गांव गंगा-जमुनी तहज़ीब की नायाब मिसाल है। यहां हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग एक साथ रहते हैं। गांव के किसान मतलूब अहमद आज सभी ग्रामीणों के लिए मिसाल बन गये हैं। दरअसल, परंपरागत खेती से हटकर इस पहल की ओर रूख करने वाले वो पहले शख्स थे।


फसल के बारे में जानकारी देते किसान

एलोवेरा की खेती ने पूरे गांव को एक अलग पहचान दी है। दरअसल, यहां के किसान मतलूब अहमद के पास पास महज सात एकड़ खेत है। जिनमें वो धान, मक्का और गन्ने जैसी परंपरागत फसलें उगाते थे, लेकिन पांच साल पहले मतलूब ने इन परंपरागत फसलों का मोह छोड़कर एलोवेरा की खेती की ओर रुख किया। जिसकी बदौलत पिछले पांच साल में वो दौलतमंद हो गए हैं। नतीजा ये है कि छुटमलपुर का पास ही फतेहपुर गांव में एलोवेरा जूस का प्लांट भी लगा लिया गया है। अब वे खुद जूस तैयार करके बाजार में आपूर्ति कर रहे हैं।

Aloevera Field
एलोवेरा की खेती करते किसान

मतलूब से शुरू हुआ एलोवेरा की खेती का ये सिलसिला गांव और आसपास के करीब 100 से अधिक किसानों तक पहुंच चुका है। बाजार में एलोवेरा की मांग अधिक होने से वह लाभ में भी हैं। मतलूब की मानें तो पिछले कई सालों से तेजी से करवटे बदल रहे मौसम की बदमिजाजी के चलते परंपरागत खेती को छोड़कर उन्होंने विकल्प के रूप में एलोवेरा की खेती शुरू कर दी। बताया कि खेत की जुताई करके एक बार पौधा लगाने पर कई सालों तक चलता रहता है। 

एलोवेरा की खेती में एक बीघा जमीन में इसके करीब 2500 पौधे लगते हैं और पांच-छह हजार रुपये का खर्च आता है। साल में चार-पांच बार सिंचाई और निराई की जरूरत होती है। इसमें रासायनिक खाद और कीटनाशकों के प्रयोग की भी कोई खास जरूरत नहीं पड़ती है। इतना ही नहीं ओलावृष्टि, पाला और बेमौसम बारिश का इस पर कोई विपरीत असर भी नहीं पड़ता है। मतलूब बताते हैं कि एलोवेरा को कम छायादार वृक्षों के साथ भी उगाया जा सकता है। साल में दो बार इसकी पत्ती काटते हैं और एक साल में औसतन 15 से बीस हजार रुपये प्रति बीघा आय भी प्राप्त कर रहे हैं।

औषधि में एलोवेरा के इस्तेमाल के साथ ही इसकी जड़ों से अनेक पौधे निकलते रहते हैं। जिन्हें उखाड़कर पौधे के रूप में बेचा जाता है। मतलूब के अनुसार एलोवेरा की पत्ती की कीमत सात से आठ रुपये प्रति किलो है। कई बड़ी कंपनियों में इसकी मांग लगातार बनी रहती है। एक बीघा एलोवेरा के खेत से साल में दो बार करीब 40 क्विंटल पत्तियां प्राप्त होती है।

Aloevera Lab
लैब में एलोवेरा की प्रोसेसिंग

उत्तर प्रदेश के ही फतेहपुर में बनाए गए एलोवेरा के प्रोसेसिंग यूनिट में ताजी पत्तियों को काटकर, सफाई करके इसे मशीन में डालते हैं। जिसके बाद इसके ताजे जूस को बोतल में पैक कर बाजार में भेजा जाता है। मतलूब बताते हैं कि प्रदूषण को नियंत्रित करने में भी एलोवेरा की अहम भूमिका है।

एक तरफ जब पूरे देश के किसान बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से परेशान थे तब एलोवेरा की खेती करने वाले किसान तरक्की की राह पर थे। आज इनकी स्थिति देखकर ये कहना गलत नहीं होगा की वो दिन दूर नहीं जब सहारनपुर जनपद के छुटमलपुर गांव का नाम दुनिया भर में एलोवेरा के गढ़ के रूप में जाना जाएगा।

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