गौतमबुद्ध नगरः शहर में शिक्षा का अधिकार कानून की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही है। राइट टू एजुकेशन कानून के मुताबिक शहर में सीबीएसई और आईसीएसई के 80 से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं, जहां 25 फीसदी सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित होनी चाहिए। लेकिन शिक्षा को बाजार बनाकर बैठी निजी संस्थाएं गरीब बच्चों को आसपास फटकने भी नहीं देती।

खुद को ऑटोनॉमस बॉडी बताती हैं संस्थाएं
गरीब बच्चों के लिए केवल गौतमबुद्ध नगर के करीब 745 शासकीय विद्यालय हैं, जिनमें परिषदीय, शासकीय, जिला विद्यालय और सहायता प्राप्त विद्यालय हैं। शिक्षा प्रसार के लिए काम करने वाले समाजसेवी विनीत चौधरी का कहना है कि नियमों की धज्जियां उड़ा रही इन संस्थाओं पर आरटीई कानून का भी असर नहीं होता। इनके मुताबिक निजी संस्थाएं ऑटोनॉमस बॉडी के तौर पर काम करते हैं, जिनका प्रदेश सरकार से कोई लेना-देना नहीं है। विनीत के मुताबिक एक पंचर बनाने वाले के
बच्चे के एडमिशन के लिए मुझे कई चक्कर लगाने पड़े। उसके गारंटी देने पर कहीं जाकर उसका एडमिशन हो पाया।

दो जून की रोटी की तलाश में है देश का भविष्य
सरकारी योजनाओं की अनदेखी के चलते ही गरीब तबके के कई बच्चे शिक्षा की राह छोड़कर कम उम्र में ही दो जून की रोटी जुटाने निकल जाते हैं। देश का भविष्य कहीं होटल में बर्तन साफ करते तो कहीं गैरेज पर ऑइल से सटे काले हाथों के साथ खड़ा नजर आता है।

 

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Privates Schools breaking RTE rule
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शिक्षा से दूर गरीब बच्चे, निजी स्कूल उड़ा रहे RTE की धज्जियां

शिक्षा से दूर गरीब बच्चे, निजी स्कूल उड़ा रहे RTE की धज्जियां
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