Breaking News

चांद पर घर बनाने के लिए ईंटें हुई तैयार, पढ़ें इसे बनाने की पूरी Exclusive जानकारी

इस स्पेस ब्रिक के निर्माण के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने लूनर सोइल सिमूलेन्ट (Lunar soil simulant) (चन्द्रमा पर पाई जाने वाली मिट्टी के जैसी) का उपयोग किया है. 

चांद पर घर बनाने के लिए ईंटें हुई तैयार, पढ़ें इसे बनाने की पूरी Exclusive जानकारी

नई दिल्‍ली : जिस तरह से अंतरिक्ष में इंसान की पहुंच दिन पर दिन बढ़ती जा रही है वो दिन दूर नहीं जब इंसान अंतरिक्ष पर बसने की कोशिश भी करेगा. दूसरे ग्रहों के बारे ये बात फिलहाल दूर की कौड़ी नज़र आती हो, पर कम से कम चांद को ले कर ये सपना अब ज्‍यादा दूर नहीं है. चंद्रमा की यात्रा से लेकर चांद पर जमीन खरीदने की खबरें आती रहती है. जाहिर है जब इंसान चन्द्रमा पर जमीन खरीदेगा तो वहां बसने की भी सोचेगा. बसने के लिए मकान की जरूरत होगी, जिन्हें बनाने के लिए ईंट, गारा की भी आवयश्कता पड़ेगी. कैसी होगी वो ईंट? क्या धरती की ईंट का इस्तेमाल चंद्रमा पर किया जा सकेगा? वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी भी ग्रह पर किसी भी निर्माण के लिए उस ग्रह के द्रव्यों का इस्तेमाल हो तो बेहतर क्योंकि वो वंहा के वातावरण के अनुकूल होते है.

इसी बात को ध्यान में रखकर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज और इसरो ने मिलकर "स्पेस ब्रिक" का निर्माण किया है जो विशेष रूप से चंद्रमा पर किसी भी प्रकार के मकान या इमारत खड़ी करने में कामयाब होगी.

इस स्पेस ब्रिक के निर्माण के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने लूनर सोइल सिमूलेन्ट (Lunar soil simulant) (चन्द्रमा पर पाई जाने वाली मिट्टी के जैसी) का उपयोग किया है. ये मिट्टी इसरो द्वारा तैयार की गई है, जिसको इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज की एक युवा वैज्ञानिक टीम ने डेवेलप किया है. लगभग 3-4 साल की मेहनत के बाद वो ऐसी ईंट बनाने में कामयाब 

हो गए हैं जो ना सिर्फ मजबूत है, बल्कि टिकाऊ भी है. ऐसे में जब चन्द्रमा पर किसी इमारत को खड़ा किया जाएगा तो वो इमारत बिलकुल उतनी ही मजबूत होगी, जितनी हमें धरती पर खड़ी कोई इमारत नज़र आती है. हालांकि इस प्रयोग में अभी प्रगति की काफी संभावना बाकी है. स्पेस साइंस से जुड़े कई देश इस तरह ईंटो के निर्माण पर काम कर रहे हैं पर हाल के वर्षों में ये कहा जा सकता है कि ये सबसे सफल प्रयोग है.

भारतीय वैज्ञानिकों के लिए ये इतना आसान नहीं था. इसरो द्वारा मिट्टी मिलने के बाद उपयुक्त बैक्टरियां ढूंढना सबसे बड़े चुनौती का काम था, जो इस मिट्टी में मिलकर इसकी आर्गेनिक ग्रोथ करवा सके. आखिर सफलता मिली जब एक विशेष बैक्टरिया ने ट्यूब के अंदर LSS की ग्रोथ करवा दी, पर जब ईंट पर हल्का दवाब दिया गया तो वो भरभरा कर चूर चूर हो गई. वैज्ञानिकों ने धैर्य नहीं खोया और अब लुनर साइल, बैक्टरिया के साथ उन्होंने गौर गम का प्रयोग किया. इस बार के नतीजे चेहरे पर मुस्कुराहट लाने वाले थे. ऑर्गेनिकली डेवलप हुई इस बार की ईंट ना सिर्फ ठोस थी, बल्कि काफी मजबूत भी थी. दूसरे कई मापदंड से गुजरने के बाद इस बात की पुष्टि कर ली गई कि इन ईंटों से चंद्रमा पर भवन का निर्माण किया जा सकता है और वो कामयाब होगा. बायो सीमेंटेशन टेक्नोलॉजी द्वारा ईंटों का निर्माण किया गया है,जबकि इसे ऑर्गेनिकली प्रक्रिया के लिए  "Microbial induced calcite precipitation" का उपयोग किया गया है.

किसी इमारत को खड़ी करने के लिए हजारों ईंटों की जरूरत होती है. लैब में मिली कामयाबी ने ये तो निश्चित कर दिया कि मजबूत ईंट बनाई जा सकती है पर इसे बड़ी संख्या में निर्माण करना इन वैज्ञानिकों की अगली चुनौती है. वैज्ञानिक मानते हैं कि चन्द्रमा पर बसने की कोशिश में कम से कम 4 से 5 वर्ष का समय और लगेगा ऐसे में उनके पास भी इतना समय है जब वो इसमे भी सफलता हासिल कर लेंगे.