Mount Everest की चोटी पर पहली बार मिला इतना प्रदूषण, हैरान हुए वैज्ञानिक

माउंट एवरेस्ट (Mount Everest) पर ढेर सारा कचरा जमा हो गया है. एवरेस्ट पर माइक्रोप्लास्टिक (Microplastic) के छोटे-छोटे फाइबर 8850 मीटर की चोटी से कुछ सौ मीटर की दूरी पर पाए गए हैं. इस स्थान को बालकनी (Balcony) कहा जाता है.

Mount Everest की चोटी पर पहली बार मिला इतना प्रदूषण, हैरान हुए वैज्ञानिक
Mount Everest पर जमा हुआ ढेर सारा कचरा

नई दिल्ली: माउंट एवरेस्ट (Mount Everest) की चोटी पर जाना कोई आसान काम नहीं है. हालांकि लोग वहां भी गंदगी फैलाने से बाज नहीं आ रहे हैं. दुनिया के सबसे गहरे पॉइंट मारियाना ट्रेंच पर प्लास्टिक का मलबा मिलने के बाद अब एवरेस्ट पर माइक्रोप्लास्टिक (Microplastic) से प्रदूषण भी देखने को मिला है. यह चोटी पर मौजूद बर्फ के बेहद करीब है.

एवरेस्ट पर माइक्रोप्लास्टिक के छोटे-छोटे फाइबर 8850 मीटर की चोटी से कुछ सौ मीटर की दूरी पर पाए गए हैं. इस स्थान को बालकनी (Balcony) कहा जाता है.

माइक्रोप्लास्टिक का मिला भरमार

एवरेस्ट पर 11 जगहों से सैंपल लिए गए, जिनमें से सभी में माइक्रोप्लास्टिक पाई गई है. यहां सबसे ज्यादा प्रदूषण बेस कैंप के आस-पास मिला है, जहां पर्वतारोही और ट्रैकर सबसे ज्यादा समय बिताते हैं. वैज्ञानिकों ने बताया कि सबसे ज्यादा फाइबर कपड़ों, तंबू और रस्सियों से आता है, जिनका पर्वतारोही इस्तेमाल करते हैं.

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साल 2019 में 880 लोगों ने एवरेस्ट पर चढ़ाई की थी लेकिन पहली बार माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण पर स्टडी की गई है, जो 5 मिलीमीटर से कम आकार के होते हैं. सैंपल्स में औसतन हर लीटर पानी में 30 माइक्रोप्लास्टिक पार्टिकल (Microplastic Particle) मिले, जबकि सबसे ज्यादा मिले पार्टिकल्स की संख्या 119 है. इनके अलावा आठ जगहों पर पानी के स्ट्रीम से भी सैंपल लिए गए लेकिन सिर्फ तीन में ही माइक्रोप्लास्टिक मिले.

माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण पर स्टडी

एवरेस्ट के अलावा Swiss Alps और French Pyrenees में भी माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण मिला है. इससे पता चलता है कि ये पार्टिकल हवा के साथ दूर तक जाते हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ प्लाईमाउथ की लीड रिसर्चर इमोजन नैपर के मुताबिक, उन्हें यह देखकर हैरानी हुई है कि माइक्रोप्लास्टिक हर सैंपल में मिली है. उन्होंने कहा कि माउंट एवरेस्ट को हमेशा दूरस्थ और साफ-सुथरा माना जाता रहा है. 

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जहरीले पदार्थ और जीवाणु होते हैं

नैपर ने कहा कि प्लास्टिक वेस्ट के बड़े सामान को कम करना, दोबारा इस्तेमाल करना और रीसाइकल करना जरूरी है क्योंकि उनसे माइक्रोप्लास्टिक पैदा होती है. ये सिंथेटिक फाइबर (Synthetic Fiber) से बने कपड़ों से भी निकलते हैं, इसलिए इनकी जगह कॉटन के ज्यादा इस्तेमाल की भी जरूरत है.

हर साल लाखों टन प्लास्टिक पर्यावरण को गंदा करती है. इसमें जहरीले पदार्थ और जीवाणु होते हैं जिनसे जीवों को नुकसान पहुंचता है. जानवर गलती से इन्हें खाना समझ लेते हैं और लोगों के अंदर खाने, पानी या सांस लेने से भी पहुंचता है.

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