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डर का मनोविज्ञान: हम हॉरर फिल्म देखना क्यों पसंद करते हैं?

डर का मनोविज्ञान: हम हॉरर फिल्म देखना क्यों पसंद करते हैं?

डर का अपना एक मनोविज्ञान है। यह मनोविज्ञान हमें विभिन्न प्रवृत्तियों के माध्यम से हमारे मन में रोमांच पैदा करती है। इस रोमांच का मजा हम अधिक्तर हॉरर फिल्मों के माध्यम से ले पाते हैं। इस तरह की फिल्मों का प्लॉट अलौकिक शक्ति, भयानक राक्षस, भूत-प्रेत आदि हुआ करते हैं। भय और हिंसा हमारे मन की सहज पवृत्ति है और जब हम इस तरह की प्रवृत्ति सिने पर्दे पर देखते है तो अपने-आप को रोमांचित फील करते हैं। 

इस तरह के डरावनी फिल्मों को देखते समय हमारी हथेलियों और मांसपेशियों का तनाव व रक्तचाप बढ़ जाता है और धीरे-धीरे शरीर का तापमान बढ़ने से हम पसीने से तर हो जाते है। शरीर में इस तरह की हरकत होने पर फिल्मों को हम पूरी तरीके से एन्जॉइ कर पाते है।

यूनानी दार्शनिक अरस्तू का मानना था कि रेचन प्रक्रिया (Catharsis) के द्वारा डरावनी कहानियों और हिंसक नाटकों के माध्यम से नकारात्मक भावनाओं को दूर किया जा सकता है और लोगों में इस तरह की नाटकों और कहानियों प्रति आकर्षण भी है। 

जिज्ञासा मनुष्य की एक सहज पवृत्ति है। सक्रिय मस्तिष्क को लेकर हरेक इंसान पैदा होता है। वह अपने से एक अलग दुनिया को जानने-समझने की कोशिश करता है। इस जिज्ञासा के कारण लोग इस तरह की हॉरर फिल्में देखना पसंद करते हैं। 

कुछ लोग भावनात्मक तीव्रता के कारण आतंक और हिंसा देखना पसंद करते हैं।

सनसनी भी इस मनोविज्ञान का एक हिस्सा है। इसी कारण हम टेबुलाइड पेपर, सनसनी भरी खबरें देखना पसंद करते हैं।

'डर का मनोविज्ञान' के बारे हम कुल मिलाकर यह कह सकते है कि हमारी प्रवृत्ति 'डर के आगे जीत' की है।