हम आजाद तो हुए, लेकिन देश को ‘सेटिंग के खेल’ से भी चाहिए आजादी

इनकम टैक्स की चोरी करके, फर्जी बिल लगाकर, काली कमाई को सफेद बनाकर, नियम विरुद्ध कामों के लिए खर्चा-पानी की संस्कृति को बढ़ावा देकर क्या हम उसी राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं, जिसका सपना आजादी के मतवालों ने देखा था?

हम आजाद तो हुए, लेकिन देश को ‘सेटिंग के खेल’ से भी चाहिए आजादी

देश ने धूमधाम के साथ अपना 74वां स्वतंत्रता दिवस मनाया. आजादी के इस पर्व पर कोरोना का असर जरूर नजर आया, लेकिन लोगों के जोश और उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी. यह दिन हमें याद दिलाता है कि हम आजाद हैं, हमने गुलामी की बंदिशों को तोड़ दिया है, हम अंग्रेजी हुकूमत के काले अध्याय को पीछे छोड़ आये हैं, लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? इस सवाल का जवाब आज हमें अपने आप से पूछना चाहिए, क्योंकि हम ही इसका सबसे बेहतर जवाब दे सकते हैं.

केवल स्‍वच्‍छंद घूमना ही आजादी नहीं है. आजादी का असली मतलब है ऐसे विचारों को, आदतों को खुद से दूर करना, जो देश और समाज के लिए अहितकारी हैं. इसके लिए हमें बड़े-बड़े उदाहरणों को तलाशने की जरूरत नहीं है. दिन की शुरुआत से लेकर अंत तक हमारे द्वारा किया जाने वाला हर काम अपने आप में यह दर्शाता है कि क्या आजादी हमारे लिए महज एक शब्द है या फिर हम इसे आत्मसात भी करते हैं.

असुरक्षा को उत्पन्न करने वाली खामोशी से आजाद
यदि आज से आप ट्रैफिक नियम तोड़ना बंद कर देते हैं, तो आप हादसों को जन्म देने वाली बुराई से आजाद हैं. आप गलती के लिए किसी को माफ कर देते हैं, तो आप प्रतिशोध की मानसिकता से आजाद हैं. आप ‘सुदीक्षा भाटी’ जैसी देश की बेटियों के साथ होने वाले अपराध के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो आप डर और असुरक्षा को उत्पन्न करने वाली खामोशी से आजाद हैं और यदि आप दंड से बचने के लिए रिश्वत नहीं देते, तो आप भ्रष्टाचार रूपी दानव से आजाद हैं.

हममें से अधिकांश लोगों के लिए आजादी केवल वही है, तो 1947 में मिली. हमारे स्वतंत्रता सैनानियों ने 1947 में हमें अंग्रेजों के शासन से आजाद करवाया, लेकिन देश को नफरत और बुराई से आजादी दिलाने की ज़िम्मेदारी हमारे कंधों पर थीं. तो क्या हम उस जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी से निभाने में सफल रहे हैं? राष्ट्र निर्माण में हर व्यक्ति का बराबर का योगदान होता है, इसलिए जरा सोचिये कि आपका योगदान क्‍या है.

इनकम टैक्स की चोरी करके, फर्जी बिल लगाकर, काली कमाई को सफेद बनाकर, नियम विरुद्ध कामों के लिए खर्चा-पानी की संस्कृति को बढ़ावा देकर क्या हम उसी राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं, जिसका सपना आजादी के मतवालों ने देखा था?

‘सेटिंग के खेल’ से भी आजादी
इन बुराइयों के साथ ही देश को ‘सेटिंग के खेल’ से भी आजादी चाहिए. यह ‘सेटिंग’ हमारे खून में बिल्कुल वैसे ही मिल गई है, जैसे कि दूध में पानी. जहां नजर घुमाओ, वहां कोई न कोई किसी न किसी के साथ सेटिंग करता दिखाई दे जाता है. सरकारी दफ्तरों में बाबू से सेटिंग, ऑफिस में बॉस से सेटिंग, आईएएस की नेता से सेटिंग और नेता की उद्योगपतियों से सेटिंग. इस सेटिंग के खेल ने उन तमाम बुराइयों को फलने-फूलने की आजादी दी है, जिन्हें एक आजाद देश में नहीं होना चाहिए.

यदि हम वास्तव में आजाद कहलाना चाहते हैं, तो हमें आजादी का मतलब समझना होगा. हमें समझना होगा कि नियम-कानूनों का पालन किये बिना, बुरे विचारों को कोरोना मानकर उनसे उचित दूरी बनाये बिना और मानसिक गुलामी से बाहर निकले बिना आजादी नहीं मिल सकती. हमें यह भी स्वीकारना होगा कि आजादी का अर्थ मनमानी नहीं होता. बगैर अनुशासन आजादी अराजकता में भी बदल सकती है.

लेखक: अभिषेक मेहरोत्रा Zee News के Editor (Digital) हैं.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं.) 

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