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लड़कियों के शोषण का अड्डा हैं प्लेसमेंट एजेंसियां

महानगरों में जिस तरह से एकाकी परिवारों और कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ी है, उससे घरेलू नौकरानियों की मांग भी बढ़ी. प्लेसमेंट एजेंसियां इस मांग को पूरा करने के लिए छोटी लड़कियों को बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आसाम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश आदि पिछड़े राज्यों से बहला-फुसला कर दिल्ली लाती हैं और घरों में नौकरानी बना देती हैं. 

लड़कियों के शोषण का अड्डा हैं प्लेसमेंट एजेंसियां

यह राजधानी दिल्ली की एक दिल दहला देने वाली घटना थी. देश की एक बेटी के साथ ऐसा भी हो सकता है, यह सोच कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं. एक लड़की को निर्मम तरीके से इसलिए 12 टुकड़ों में काट दिया जाता है, क्योंकि वह काम के बदलते अपना मेहनताना मांग रही थी!!! जिस 15 साल की लड़की सुनीता (परिवर्तित नाम) की लाश बाहरी दिल्ली के एक नाले में मिली थी, वह झारखंड की रहने वाली थी. करीब तीन साल पहले, जब उसकी उम्र महज 12 साल थी, उसे एक दलाल अच्छी नौकरी का झांसा देकर दिल्ली ले आया और एक घर में गुलाम बना दिया. 

पुलिस ने हत्या के आरोप में जिस मंजीत कारकेटा को गिरफ्तार किया है, उसने स्वीकार किया है कि अच्छी नौकरी का झांसा देकर वह झारखंड से गरीब लड़कियों को फंसा कर दिल्ली लाता था. वह उन्हें घरेलू नौकरानी का काम दिलवाता था और तनख्वाह खुद रख लेता था. आखिरकार, तंग आकर सुनीता एक दिन जब कारकेटा के पास अपनी सालों की बकाया तनख्वाह मांगने पहुंची तो उसने दो अन्य साथियों के साथ मिलकर उसकी नृशंस हत्या कर दी. उसकी लाश के टुकड़े-टुकड़े कर डाले. कहानी इतनी साधारण नहीं है जितनी सुनने में लग रही है. दरअसल, देश की राजधानी में संसद की नाक के नीचे एक बड़ा गोरखधंधा चल रहा है, जिसकी शिकार सुनीता जैसी हजारों लड़किया हो रही हैं. उनका जीवन नारकीय बना हुआ है. 
     
इस गोरखधंधे की जड़ में मंजीत कारकेटा जैसे प्लेसमेंट एजेंसियां चलाने वाले लोग हैं. एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर में 6000 हजार से ज्यादा प्लेसमेंट एजेंसियां हैं, इनमें केवल तकरीबन 1000 प्लेसमेंट एजेंसियां ही शॉप एंड कामर्शियल स्टेबलिस्मेंट एक्ट के तहत रजिस्टर्ड हैं. महानगरों में ये प्लेसमेंट एजेंसिया लड़कियों के शोषण का अड्डा बनी हुई हैं. इन प्लेसमेंट एजेंसियों को रेगुलेट करने के लिए केंद्र सरकार का कोई कानून नहीं है. छत्तीसगढ़ के अलावा न ही किसी राज्य ने अभी तक इसके लिए कोई कानून बनाया है. 2008 में राष्ट्रीय महिला आयोग ने प्लेसमेंट एजेंसियों की गैरकानूनी गतिविधियों पर नकेल कसने के लिए एक कानून बनाने की कोशिश की थी और भारत सरकार को इसका एक ड्राफ्ट बना कर भेजा भी था. जो अब ठंडे बस्ते में चला गया है.

सरकार की उदासीनता की वजह से हजारों लड़कियों का बचपन कोठियों और फ्लैटों में सिसक रहा है. कई बार ये लड़कियां मालिकों और प्लेसमेंट एजेंसियों के दलालों की हवस का शिकार भी बनती हैं. सितंबर 2014 में बचपन बचाओ आंदोलन की एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली के उपराज्यपाल को निर्देश दिया था कि वे प्लेसमेंट एजेंसियों का पंजीकरण करें और नियमन के लिए कानून बनाएं. कानून तो अभी तक नहीं बना है, अलबत्ता तकरीबन हजार प्लेसमेंट एजंसियों को शॉप एंड कामर्शियल स्टेबलिस्मेंट एक्ट के तहत रजिस्टर्ड जरूर किया गया है. अभी भी हजारों प्लेसमेंट एजेंसियां गैरकानूनी तरीके से संचालित हो रही हैं.

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की साल 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक हर घंटे में एक बच्चा बाल दुर्व्यापार (ट्रैफिकिंग) का शिकार हो जाता है. प्लेसमेंट एजेंसिया बाल दुर्व्यापार का एक बड़ा जरिया हैं और इसकी आड़ में यह धंधा खूब फल फूल रहा है. प्लेसमेंट एजेंसियों की आड़ में ही दलाल देश के विभिन्न हिस्सों से लड़कियों को अच्छी नौकरी का झांसा देकर और बहला-फुसला कर महानगरों में लाते हैं और उन्हें घरेलू नौकर बना देते हैं. जबकि 14 साल तक बाल श्रम पूरी तरह से प्रतिबंधित है. पिछले साल हमारे देश में बाल और किशोर मजदूरी के खिलाफ कानून बना. इसमें 14 साल तक बाल श्रम पूरी तरह से प्रतिबंधित है. जबकि 14 से 18 साल तक की उम्र तक खतरनाक उद्योगों में बाल मजदूरी पर रोक लगा दी गई है. इसमें घरेलू बाल श्रम भी शामिल है. 

दलाल तीन साल पहले जब सुनीता को बहला-फुसला कर दिल्ली लाया था, तब उसकी उम्र महज 12 साल थी. यह उम्र उसकी खेलने-कूदने और पढ़ने लिखने की थी. शिक्षा के अधिकार के तहत उसे मुफ्त शिक्षा और अन्य बहुत सी सुविधाएं मिलनी चाहिए थी. लेकिन हमारा सरकारी तंत्र इतना नाकारा हो चुका है कि उसे सुनीता जैसों की चिंता ही नहीं है. तीन साल वह देश की राजधानी में गुलामी का जीवन जीती रही, लेकिन सिस्टम ने उसकी कोई मदद नहीं की. समाज भी इतना असंवेदनशील होता जा रहा है कि सुनीता जिस घर में बाल मजदूरी कर रही थी, उसके आसपास के किसी पड़ोसी ने भी पुलिस से बच्चों के शोषण के इस गैरकानूनी काम की शिकायत नहीं की. 

ऐसी लड़कियां अगर किसी एनजीओ या फिर परिवार के प्रयास से छूट भी जाती हैं तो वह इतने सदमें में होती है कि उनका जीवन फिर से शुरु करना इतना आसान नहीं होता. उन्हें इलाज और मानसिक आघात से उबरने के लिए काउंसलिंग की जरूरत होती है. इस बारें में कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन ने एक अच्छी पहल की है और उसने रेड़ एफएम के साथ मिल कर यौन शोषण और ट्रैफिंकिंग की शिकार सुनीता जैसे बच्चों के इलाज और काउंसिलिंग आदि के लिए एक मुहिम शुरु की है. इसके लिए फाउंडेशन ने एक “सुरक्षित बचपन फंड” की स्थापना भी की है.       

महानगरों में जिस तरह से एकाकी परिवारों और कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ी है, उससे घरेलू नौकरानियों की मांग भी बढ़ी. प्लेसमेंट एजेंसियां इस मांग को पूरा करने के लिए छोटी लड़कियों को बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आसाम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश आदि पिछड़े राज्यों से बहला-फुसला कर दिल्ली लाती हैं और घरों में नौकरानी बना देती हैं. आजादी के बाद सरकारों के नकारेपन की वजह से पिछड़ों इलाके में गरीबी और बढ़ी है. जिसका फायदा दलाल उठाते हैं और गरीब मां-बाप को बच्चियों को अच्छी नौकरी और अच्छी पगार का झांसा देकर दिल्ली लाते हैं. ये दलाल एक मुश्त रकम लेकर लोगों को लड़कियों को बेच देते हैं या फिर हर महीने की उनकी तनख्वाह अपने पास लेते रहते हैं. इस तरह से ये लड़कियां घरों में एक तरह से गुलाम बन जाती हैं.     

दिल्ली-एनसीआर में करीब 25 लाख घर हैं. एक अनुमान के मुताबिक तकरीबन आधे घरों में नौकरों से घरेलू काम कराया जाता है. स्लम बस्तियों में काम करने वाले ज्यादातर परिवार की महिलाएं, बच्चे और बच्चियां भी घरों में काम करती हैं. लेकिन असंगठित क्षेत्र में होने की वजह से इन्हें भी उचित मेहनताना नहीं मिल पाता है. और न ही रोजगार की कोई गारंटी रहती है. 

सरकार को फौरन इस दिशा में कदम उठाना चाहिए. सबसे पहला काम तो उसे प्लेसमेंट एजेंसियों को रेगुलेट करने के लिए एक कानून बनाना चाहिए. बाल दुर्व्यापार को रोकने के लिए भी एक सख्त कानून की जरूरत है. सरकार ने इस संबंध में एक बिल तैयार किया है, जिसे कैबिनेट की मंजूरी मिल चुकी है. लेकिन जबतक यह संसद में पास नहीं होगा, तब तक कानून की शक्ल अख्तियार नहीं कर पाएगा. इसलिए सरकार इसे अतिशीघ्र संसद में पास कराकर देश के बच्चों का बचपन सुरक्षित बना सकती है. 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)