बच्चों की परवरिश मां-बाप दोनों की जिम्मेदारी, एक से नहीं चलेगा काम

पैरेंट्स को अपने बच्चों को समय देना पड़ेगा. जो समय आप आज देंगे, उसे निवेश मानें. जितना बढ़िया इन्वेस्टमेंट, उतना बढ़िया परिणाम. हर पैरेंट्स को अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी से कुछ समय हर हाल में निकालना होगा और अपनी संतान को देना होगा. 

बच्चों की परवरिश मां-बाप दोनों की जिम्मेदारी, एक से नहीं चलेगा काम

नई दिल्ली : पिछले हफ्ते का वाकया है, एक दंपत्ति मेरे पास आये और बोले कि बेटे की जरा सी न सुनो तो बार-बार पुलिस के पास जाने की धमकी देता है. अभी सिर्फ 13 वर्ष का ही है फिर भी बार-बार धमकी मेरी समझ से परे है. मैंने अगले दिन बेटे को लेकर आने को कहा. वह आया भी अपने मम्मी-पापा के साथ. मैंने पूछा तो बोला अंकल- मेरे पापा के पास पैसा है नहीं. समय ये देते नहीं. हर बात को टालना कोई इनसे सीखे. क्या करूं? धमकी देने से कई बार बात बन जाती है.

'कहानी घर घर की'
उसने जो खुलासा किया वह और चौंकाने वाला है. बोला-अंकल कोरोना के पहले पापा के फोन में एक वीडियो देखा. मेरी उम्र का एक बच्चा थाने पहुंच गया पापा की शिकायत लेकर. तब पुलिस ने बात सुनी, उसके पापा को बुलाकर फटकार लगाई और आगे से ऐसा न करने का फरमान भी सुनाया. मैंने दिमाग पर जोर लगाया तो याद आया कि यह किस्सा इटावा का था. वहां एक किशोर थाने पहुंच गया था वो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. यह कहानी केवल इस या उस मासूम की नहीं, बहुत से बच्चों की है. तब इटावा के बच्चे ने कहा था कि उसके पापा दुकान बंद करके दिन दिन भर गायब रहते हैं. मम्मी कुछ कहती हैं तो उनसे भी लड़ाई करते हैं. जब नुमाइश दिखाने की बात की तो डांटने लगे. धमकी दी तो बोले, जो करना हो कर लो इसलिए मैं पुलिस के पास आ गया. 

बच्चों का मनोविज्ञान
दरअसल इस मासूम की सिर्फ इतनी इच्छा है कि पुलिस उसके पापा को डांट लगा दे. न माने तो पिटाई कर दे लेकिन वही मासूम यह भी कहता है कि, मेरे पापा अच्छे हैं लेकिन जब भी गुस्सा करते हैं तभी गड़बड़ हो जाती है. कुछ ऐसी ही बात या शिकायत इस बच्चे ने भी की थी. उसे भी पापा का समय चाहिए लेकिन पापा का कहना है कि इस कठिन समय में दाल-रोटी का जुगाड़ करूं या इन्हें समय दूं मम्मी तो दिन रात इनकी सेवा में है. यह भारत के अनेक घरों की कहानी है, खास तौर पर कहें तो शहरी घरों में बच्चों को समय न देने की परम्परा बढ़ती जा रही है. सब भौतिकवाद की ऐसी दौड़ में जुटे हैं कि बच्चे उनकी प्राथमिकता से बाहर होते जा रहे हैं.

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रवैया बदलने की जरूरत
पैरेंट्स को अपने बेटे-बेटी को समय देना पड़ेगा. जो समय आप आज देंगे, उसे निवेश मानें. जितना बढ़िया इन्वेस्टमेंट, उतना बढ़िया परिणाम. हर पैरेंट्स को अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी से कुछ समय हर हाल में निकालना होगा और अपनी संतान को देना होगा. मम्मी को भी और पापा को भी. असल में मासूस को दोनों का प्यार चाहिए. किसी एक से उसका काम नहीं चलता है. अगर आप को लगता है कि मम्मी, पापा के बदले आया का समय काम आएगा तो मुगालते में हैं. असल में उसे तो दादा-दादी, नाना-नानी का भी प्यार चाहिए, पर यह तो हर किसी के नसीब में है नहीं. और होगा भी कैसे, जब बेटा अपनी बुजुर्ग मां को घर से बाहर निकाल देगा तो भला मासूम को इस अमूल्य प्यार से तो महरूम ही रहना होगा. अब पति-पत्नी, दोनों के कॅरियर की वजह से संतानों का वाजिब हक उन्हें नहीं मिल पा रहा है.

ये हो सकता है आदर्श तरीका
बच्चा जब किसी की गोद में रो रहा हो तो उसे उठाइए और मां की गोद में दे दीजिए. देखिए, मां जैसे ही गले लगाकर पीठ पर प्यार की थपकी देगी, मासूम के सभी दुःख कम हो जाते हैं. वह चुप हो जाता है. इसे एक नहीं, अनेक बार आप आजमा सकते हैं. हर बार यह फार्मूला कारगर साबित होगा. एक ही सूरत में यह फेल होगा, जब मासूम को ज्यादा तकलीफ होगी और वह बता भी नहीं पाएगा. बच्चे के ऐसे सभी दुःख मां आसानी से पकड़ लेती है.

फैमिली प्लानिंग से पहले दें ध्यान
इसका मतलब मैं लड़कियों के कॅरियर का बिल्कुल विरोध नहीं कर रहा हुं. लेकिन यह सुझाव जरूर देना चाहता हुं कि जब भी बेबी प्लान करें तो पति-पत्नी एक साथ बैठें और सोचें कि अगर दोनों का अपना कॅरियर चलते रहने देना है तो क्या विकल्प हो सकता है. एक महत्वपूर्ण विकल्प बच्चे की दादी या नानी हो सकते हैं. इन दोनों रिश्तों में से किसी को आप अपने पास रोक सकते हैं तो यह फायदे की बात होगी. लेकिन उन्हें यह नहीं लगना चाहिए कि आपने उन्हें इस्तेमाल करने के लिए बुलाया है. 

उन्हें इस बात का एहसास कराना होगा कि वे आपके जीवन का अहम हिस्सा हैं. दादी, नानी को रखने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि आप आया नहीं रखिए. जरूर रखिए. इससे उन्हें लगेगा कि आप उनका भी ख्याल रखते हो. इसके दो सीधे फायदे होंगे. एक-आपके बच्चे की पूरी सुरक्षा होगी. दो-समाज भी आपको अच्छी नजर से देखेगा क्योंकि आप अपनी माँ को उसका वाजिब हक दोगे. अगर कोई ऐसा तालमेल बन पाए कि दादा-दादी या नाना-नानी, बारी बारी चारों का प्यार इस बच्चे को मिले तो सोने पर सुहागा. पर, यह सब एक दिन में नहीं होगा. बेबी प्लान करने से पहले ही यह बातचीत करनी होगी. बल्कि, माँ और सासू माँ को भी इस प्लान का हिस्सा बनाएं. उन्हें भी अच्छा लगेगा और वे दोनों मानसिक रूप से तैयार भी रहेंगे. ऐसा हुआ तो इटावा की घटना दोहराई नहीं जाएगी और मासूमों को उनका हक भी आसानी से मिल सकेगा.

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