बीजेपी के 38 सालः हिन्दुत्व और सोशल इंजीनियरिंग का कमाल

जनता पार्टी के बिखराव के बाद जब 1980 में भारतीय जन संघ के पुराने साथियों ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का गठन किया तो किसी को यह अनुमान नहीं था कि यह पार्टी कुछ ही वर्षों में सत्ता के शीर्ष पर पहुंच जाएगी.

बीजेपी के 38 सालः हिन्दुत्व और सोशल इंजीनियरिंग का कमाल

जनता पार्टी के बिखराव के बाद जब 1980 में भारतीय जन संघ के पुराने साथियों ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का गठन किया तो किसी को यह अनुमान नहीं था कि यह पार्टी कुछ ही वर्षों में सत्ता के शीर्ष पर पहुंच जाएगी. 1984 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मात्र दो सीटें मिलीं थीं, जो 1951 में जनसंघ को मिलीं तीन सीटों से एक कम ही थी. यानी जनता पार्टी के विफल प्रयोग के बाद बीजेपी को वहीं से शुरुआत करनी पड़ी थी, जहां से उसने 1951 में किया था. लेकिन इसने जल्द ही सारे अनुमानों को गलत ठहरा दिया. केंद्र में इसकी सरकार तो 1996 में ही बन गई थी, लेकिन वह केवल 13 दिन चल सकी थी. 1998 के लोकसभा चुनाव बाद बनी बीजेपी की सरकार भी 13 महीने ही चल सकी. 1999 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 1998 की भांति 182 सीटें ही मिलीं, लेकिन इस बार सरकार पांच साल चली. पर बीजेपी की ये दोनों सरकारें कुछ दलों के सहयोग पर चलीं. यानी लोकसभा में बीजेपी के पास अकेले बहुमत नहीं था. ऐसा पहली बार 2014 के लोकसभा चुनाव में हुआ, जब बीजेपी के पास अकेले बहुमत योग्य संख्या थी, हालांकि उसने गठबंधन की ही सरकार बनाई. केंद्र ही नहीं, आज 20 राज्यों में भी इसकी सरकारें हैं. बीच में 2004 से लेकर 2014 की अवधि ऐसी थी, जब बीजेपी का ग्राफ नीचे चला गया था. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि बीजेपी ने यह मुकाम कैसे हासिल किया?

बीजेपी अपने गठन के बाद भी एकात्म मानववाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित हिन्दुत्व को ही आधार बनाकर राजनीति करती रही, लेकिन हिन्दुत्व पर इसका नजरिया जन संघ की भांति कठोर नहीं था. इसने अपने जनाधार को व्यापक बनाने के लिए उदार हिन्दुत्व का रुख अपनाया, लेकिन यह रणनीति कारगर नहीं रही. 1984 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बुरी तरह से हार मिली. इसके बाद पार्टी ने हिन्दुत्व के प्रति दृढ़ रुख अपनाया और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए हिन्दुओं की आवाज बन गई. लेकिन इसी दौरान वीपी सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के कारण सामाजिक न्याय की राजनीति ने जोर पकड़ ली. आरक्षण के मसले पर हिन्दू समाज में जातीय आधार पर विभाजन बढ़ने लगा और बीजेपी पर अगड़ों की पार्टी होने का आरोप लगने लगा. इस आरोप को हल्के में खारिज नहीं किया जा सकता था. क्रिस्टोफ जफ्रेलोट द्वारा जनसंघ की कार्य समिति (1954-67 एवं 1972-77) और बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति (1980-91 एवं 1993-95) के तुलनात्मक अध्ययन से इसकी पुष्टि होती है. 

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उस समय जन संघ में शीर्ष स्तर पर अगड़ी जातियों, खासकर ब्राह्मण और बनिया का ज्यादा प्रतिनिधित्व था. हालांकि बीजेपी की कार्यकारिणी में इस क्षेत्र में कुछ कमी आई थी, फिर भी वह ज्यादा थी. सांसदों के मामले में यह प्रवृत्ति इस पैमाने पर नहीं थी. यह वही काल था, जब संगठन और संसद में पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व बीजेपी में धीरे-धीरे बढ़ा. आखिर यह सब कैसे हुआ?

पारंपरिक सोच वाली बीजेपी के लिए यह आसान नहीं था, खासकर उस स्थिति में जब हिन्दू समाज में जातिगत रुढ़िवाद काफी मजबूत था. लेकिन मंडल आंदोलन से उत्पन्न परिस्थितियों ने बीजेपी को मजबूर कर दिया कि वह अपने उच्च जातीय आधार से निकले और पिछड़ों एवं दलितों को भी पार्टी में समुचित भागीदारी दे, ताकि वह संपूर्ण हिन्दू समाज की प्रतिनिधि पार्टी बन सके. इस रणनीति को प्रायः ‘सोशल इंजीनियरिंग’ कहा जाता है, जिसने धीरे-धीरे गति पकड़ी. लेकिन संघ पृष्ठभूमि वाले कुछ नेता इस बदलाव के लिए सहज भाव से तैयार नहीं थे. इसके अलावा इस रणनीति के राजनीतिक खतरे भी थे. खतरा यह था कि पिछड़ों-दलितों के प्रति ज्यादा रुझान दिखाने पर अगड़ी जातियों के वोट खिसकने का भय था. यह रणनीति तभी सफल हो सकती थी, जब सामाजिक धरातल पर अगड़ों, पिछड़ों और दलितों में एक दूसरे के प्रति सहज स्वीकार का भाव हो. परिस्थिति की नजाकत को भांपते हुए तब संघ ने 1996 में ‘समरस्य संगम’ कार्यक्रम के अंतर्गत हिन्दुओं की विभिन्न जातियों में व्याप्त अंतर्विरोध को दूर करने और उनमें सामाजिक सद्भाव एवं मेलजोल कायम करने के लिए अभियान चलाया.

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समाज में परिवर्तन की प्रक्रिया धीमी होती है, लेकिन राजनीति समय का इंतजार नहीं करती. सपा, बसपा जैसी पिछड़ों-दलितों के आधार वाली पार्टियों के उभार ने बीजेपी पर दबाव बना दिया कि वह अगड़ी जातियों की पार्टी की छवि से बाहर निकले. इसके तहत पार्टी ने हुकुमदेव नारायण यादव, उमा भारती, करिया मुंडा, सूरजभान जैसे नेताओं को आगे बढ़ाना शुरू किया. अभी सबसे ज्यादा दलित सांसद बीजेपी में हैं, पिछड़ों का प्रतिनिधित्व भी बीजेपी में बढ़ गया है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछड़ी जाति के हैं. इसके बावजूद बीजेपी को अगड़ी जातियों की पार्टी कहा जाता है, तो इसे हिन्दू विरोधी एजेंडा का हिस्सा ही माना जाएगा. क्या अगड़ों का दानवीकरण करना ही धर्मनिरपेक्षता की कसौटी है? ऐसे दलों या व्यक्तियों के सामने समस्या यह है कि पिछड़े-दलित समुदाय के ये नेता हिन्दुत्ववादी आग्रह रखते हैं. ये भूल जाते हैं कि पिछड़े-दलित भी उतने ही हिन्दू हैं, जितने अगड़े. ऐसी परिस्थिति में बीजेपी के लिए यही उपयुक्त होगा कि वह पिछड़ों और दलितों को तरजीह दे. इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए अब सामाजिक परिस्थितियां भी अनुकूल हैं, क्योंकि अगड़ी जातियां भी हिन्दुत्व की व्यापक भावना के तहत इन्हें स्वीकार करने की मनःस्थिति में आ रही हैं.

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)