नर्सरी एडमिशन : EWS के नाम पर क्यों आती है 'हिचकी'!

शिक्षा का अधिकार लागू होने के बाद हर स्कूल में चाहे वो किसी भी वर्ग का प्रतिनिधित्व करता हो, उन्हें अपने स्कूल में 25 फीसदी सीट आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए रखना जरूरी है.

नर्सरी एडमिशन : EWS के नाम पर क्यों आती है 'हिचकी'!

हाल ही में रानी मुखर्जी की फिल्म 'हिचकी' का ट्रेलर रिलीज हुआ. यह फिल्म एक ऐसी लड़की की कहानी बताती है जिसे टुरेट सिंड्रोम (Tourette syndrome) है. इसे टिक डिसऑर्डर के तौर पर भी समझा जा सकता है जिसमें मरीज के चेहरे की कई पेशियों या कभी-कभी एक वोकल में खिंचाव होता है. यह खिंचाव शरीर में कभी भी हो जाता है जिसके बाद मरीज के मुंह से अजीब सी आवाज निकलने लगती है या फिर उसके मुंह का आकार थोड़ा बदल जाता है. 'हिचकी' में रानी मुखर्जी इसी डिसऑर्डर से ग्रसित लड़की की भूमिका निभा रही हैं जो स्कूल टीचर बनना चाहती है. लेकिन उसे किसी भी स्कूल में नौकरी नहीं मिल रही है और वह दिल से टीचर बनने के लिए उत्सुक है. मुश्किल से उसे एक स्कूल में पढ़ाने का मौका मिलता है लेकिन सिर्फ उन बच्चों को जिन्हें स्कूल में EWS यानि आर्थिक रूप से कमजोर श्रेणी में दाखिला मिला है.

शिक्षा का अधिकार लागू होने के बाद हर स्कूल में चाहे वो किसी भी वर्ग का प्रतिनिधित्व करता हो, उन्हें अपने स्कूल में 25 फीसदी सीट आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए रखना जरूरी है. हालांकि सरकार इस श्रेणी के छात्रों के दाखिले पर निजी स्कूलों को 1598 रू. प्रति छात्र देती भी है. लेकिन नर्सरी में दाखिले के नाम पर हर बच्चे से लाखों रु. वसूलने वाले निजी स्कूलों के सुरसा जैसे मुंह में यह राशि तो मूंगफली के दाने जैसी है जो किसी सड़े हुए दांत की कैविटी में ही फंस कर रह जाती है.

यही वजह है कि महंगे स्कूलों के प्रबंधन को यह सीट देना हमेशा नागवार गुजरता है क्योंकि इन आरक्षित सीट पर दाखिला लेने वाले बच्चों को उन्हें मुफ्त पढ़ाई के साथ-साथ पाठ्य सामग्री और स्कूल यूनिफॉर्म भी मुहैया करवानी होती है. ऐसे में प्रबंधन किसी अनारक्षित सीट वाले बच्चों को यह कहते हुए भी बरगलाते मिलते हैं कि आपके बच्चे का दाखिला तो हो जाता लेकिन 25 फीसदी सीट तो हमें आरक्षित वर्ग को देनी पड़ रही है इसलिए स्कूल में दाखिला मुश्किल है. गोया उनका स्कूल इसी 25 फीसदी पर केंद्रित है और सारे बच्चों को जिन्हें दाखिला नहीं मिला है उन्हें इसी आरक्षित सीट की वजह से दाखिला नहीं मिल सका है.

यह तो स्कूल का पक्ष हुआ. एक पक्ष अभिभावकों का भी है. सामाजिक तौर पर खुद को प्रतिष्ठित और श्रेष्ठ मानने वाला मध्यम वर्ग जो कुलीन होने की हड़बड़ी में है और कुलीन वर्ग जो खुद को उत्कृष्ट में सर्वोच्च मान कर ही पला बढ़ा है. उसे लगता है अगर उनका बच्चा कम आयवर्ग के बच्चों के साथ पढ़ेगा तो उनके बच्चों की परवरिश पर बुरा असर पढ़ सकता है और उनकी तथाकथित सभ्य समाज की प्रतिष्ठा पर चोट पहुंच सकती है.

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स्कूल प्रबंधन भी इसी बात का लाभ लेता है और अलग-अलग वजहें देकर अभिभावकों से यह कह कर पैसे ऐंठता रहता है कि वो इस 25 फीसदी की छाया भी, उस सभ्य 75 फीसदी पर नहीं पड़ने देंगे. इसी के चलते कई नामी -गिरामी स्कूलों में कम आय वर्ग के बच्चों की क्लासें, दूसरे बच्चों से अलग समय पर लगती हैं. मसलन अगर सामान्य श्रेणी (सरकार इस श्रेणी को 'सामान्य' शब्द से ही इंगित करती है) के बच्चे सुबह के समय स्कूल जाते हैं तो EWS बच्चों के स्कूल का समय दोपहर में किया जाता है. कुछ स्कूलों ने सिर्फ फीस माफ कर दी है और बच्चों से यूनिफॉर्म और पाठ्य सामग्री के भी पैसे लेने लगे हैं. इसे लेकर भी दिल्ली सरकार ने निजी स्कूलों को चेताया है कि अगर उन्हें जानकारी मिलती है कि कोई स्कूल सामग्री मुहैया नहीं करवाया रहा है तो उसके खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है.

दिल्ली में नर्सरी के दाखिले का सर्कस शुरू हो चुका है. ऐसे में फरवरी माह में आने वाली हिचकी फिल्म की चर्चा भी प्रासंगिक हो जाती है. फिल्म के ट्रेलर में एक जगह स्कूल का चपरासी बोलता है कि गलती इन बच्चों की नहीं है मैडम, यहां के टीचर और बच्चों ने इन्हें कभी एक्सेप्ट ही नहीं किया है इसलिए ये पढ़ाई कम और बगावत ज्यादा करते हैं.

इस संवाद से कुछ साल पहले का एक वाकया याद आ गया. हमारे घर काम में हाथ बंटाने के लिए आने वाली घरेलू कर्मचारी के बेटे का EWS श्रेणी के तहत पूर्वी दिल्ली के नामी गिरामी स्कूल में दाखिला हुआ. इस दाखिले का एक अहम पहलू यह भी था कि उस बच्चे का दाखिला करवाने वाली मैडम उसी प्रसिद्ध स्कूल की टीचर थीं. शायद उनके मार्गदर्शन की बदौलत ही उस बच्चे को बगैर किसी ज्यादा मशक्कत के उस ख्यातिप्राप्त (अच्छा नहीं कहूंगा क्योंकि नामी स्कूल होना इस बात का सूचक नहीं है कि स्कूल अच्छा भी हो) स्कूल में दाखिला मिल गया. खैर, स्कूल में दाखिला मिलना ही काफी नहीं होता है. EWS के बच्चे का उस कुलीन वर्ग के साथ सामंजस्य बैठाना और वो भी तब जब- स्कूल प्रबंधन से लेकर टीचर और अभिभावक से लेकर उनकी सीख के साथ बढ़ रहे बच्चों तक सभी की आंख में वो किरकिरी की तरह हो- एक मुश्किल काम है. इस बात की जानकारी भी हमें घर आने वाली घरेलू कर्मचारी से ही मिली की उनके बच्चे के स्कूल का समय दूसरे बच्चों के साथ नहीं होता. वो रोजाना अपने बच्चे की हमसे शिकायत करतीं. उन्हें लगता कि उनके बच्चे का इतने महंगे स्कूल में दाखिला हो गया है और वो पढ़ाई में मन नहीं लगाता. वो आए दिन उसकी पिटाई करने की बात हमें बतातीं जिसको लेकर हम अक्सर उसे डांटते कि इस तरह मारने से बच्चे में विरोध पनपेगा. खैर, वो उसकी पिटाई करती रहीं और एक दिन वो रोती हुईं हमारे घर पर आईं. जब हमने वजह जानी तो पता चला कि स्कूल ने उसके बच्चे को अंग्रेजी में फेल कर दिया है. अब वह बच्चे की दोबारा अंग्रेजी की परीक्षा लेंगे और अगर वो उसमें भी फेल हो जाता है तो उसे स्कूल से निकाल दिया जाएगा. यह तब की बात है जब उस महिला का बेटा तीसरी कक्षा में पढ़ रहा था. शिक्षा के अधिकार नीति 2010 के तहत प्राथमिक कक्षा में बच्चों को फेल करने का प्रावधान नहीं है. हालांकि 2017 में केंद्रीय सलाहकार बोर्ड की एक उपसमिति ने सरकार से 8वीं कक्षा तक फेल नहीं करने की नीति की समीक्षा करने की सिफारिश की है जिसके तहत बाल नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिकार संशोधन विधेयक में एक प्रावधान बनाने की बात कही गई है. इसके तहत राज्यों को मुख्य परीक्षा में फेल होने पर छात्रों को पांचवीं और आठवीं कक्षा में रोकने की मंजूरी दी जाने की बात कही गई है. गौरतलब है कि 12 जुलाई 2010 को केंद्र सरकार ने राज्यों को यह निर्देश जारी किया था वह किसी भी बच्चे को एक क्लास में न रोके और न ही किसी बच्चे को प्राथमिक शिक्षा पूरी करने से पहले स्कूल से निकाला जाए.

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खैर स्कूल ने उस बच्चे की दोबारा अंग्रेजी विषय की परीक्षा ली और इस बार उसे अच्छे नंबर मिले. लेकिन यह बात तो तय थी कि बच्चे का अंग्रेजी में फेल होना, कम नंबर लाना, बार-बार उसकी मस्ती करने की शिकायत का आना, लगातार उसे असभ्य बताना कहीं न कहीं बच्चे को और उसके अभिभावकों को हताश करने का एक तरीका था जिससे वो खुद ही परेशान होकर अपने बच्चे को स्कूल से निकाल लें. जबकि सामान्य श्रेणी का बच्चा अगर इतनी ही शरारत करे, या कम पढ़ाई करे तब शिकायत बहुत सहज तरीके से की जाती है कि बच्चे तो ऐसा करते ही हैं. साथ ही स्कूल यह संदेश भी दे देता है कि कम आय वर्ग के बच्चों की जगह वो सरकारी स्कूल ही हैं जिनके नाम से ही सब नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं.

सरकारी स्कूल को गरीबों का स्कूल माना जाना, निजी स्कूल, खास कर महंगे स्कूलों में कम आय वर्ग के बच्चों के साथ इस तरह का रवैया बताता है कि हमारे इस सभ्य समाज को जब तक ऐसी बातों पर हिचकी आती रहेगी तब तक शिक्षा के अधिकार से कितने भी कानून लागू कर लिए जाएं, हम बच्चों को पढ़ा तो लेंगे, लेकिन शिक्षित नहीं कर पाएंगे.

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
(डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)