पीपुल्स लिबरेशन आर्मी या पार्टी की तरफ झुकाव वाले साथी?

एक आधुनिक संप्रभु देश की प्रोफेशनल आर्मी में जो सामान्य गुण होने चाहिए, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना की पीएलए उस 'प्रोफेशनल' ढांचे में कहीं फिट ही नहीं होती. यहां तक कि उसके नाम में जुड़े ये तीनों शब्द यानी 'पीपल्स', 'लिबरेशन' और ‘आर्मी’ कहीं से भी इसके साथ जुड़ते नहीं दिखाई देते, बल्कि आपस में ही विरोधाभासी लगते हैं.

पीपुल्स लिबरेशन आर्मी या पार्टी की तरफ झुकाव वाले साथी?

हाल ही में भारत-चीन के सैनिकों के बीच पूर्वी लद्दाख में हुई झड़प की चर्चा दुनियाभर में हुई है.लोग उसके कई पहलुओं से जुड़ी मान्यताओं, विश्लेषण और उसमें छुपे निहितार्थों पर चर्चा कर रहे हैं. इसके तहत मीडिया के समझदार वर्ग से लेकर सरकारी चीनी मीडिया की अतिरंजनापूर्ण मान्यताएं तक आती हैं. हालांकि गलवान घाटी की घटना में कई अर्न्तप्रवाह हैं. लंबे समय तक इनका रणनीतिक प्रभाव हो सकता है, लेकिन एक पहलू जिसकी लगातार उपेक्षा की जा रही है, वह है वो तरीका जो हमले के लिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) ने अपनाया.

भारत ने गलवान घाटी की इस घटना को सुनियोजित बताया. हालांकि सीसीपी, अभी भी झड़प में मारे गए चीनी सैनिकों की संख्या और उनकी पहचान आदि को छुपा रही है, इधर भारतीय पीएम मोदी सीमा पर सैनिकों से मिलने के लिए लद्दाख का दौरा भी कर चुके हैं. कोई भी सम्माननीय सेना अपने सैनिकों के बलिदान को छुपाने में यकीन नहीं रखती. लेकिन पीपल्स लिबरेशन आर्मी को हताहत सैनिकों की संख्या बताने से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक भविष्य पर पड़ने वाले असर की भी चिंता करनी पड़ती है.

भारतीय सेना के बारे में सीपीपी ने पाली गलतफहमी
सेनाओं को वापस भेजने के समझौते के बावजूद इस तरह की योजनाबद्ध हिंसक झड़प को अंजाम देना एक तरह की बेईमानी है. 6 जून को ही भारत-चीन के मिलिट्री कमांडर्स के बीच बातचीत में तय हो गया था कि दोनों की सेनाएं पीछे हटेंगी.और ऐसा लगता है कि इस तरह की हरकतें सीसीपी के विस्तारवादी एजेंडे को परवान चढ़ाने के लिए उनकी मानक प्रक्रिया का एक हिस्सा बन चुके हैं. साउथ चाइन सी में भी सीसीपी सामुद्रिक सीमा में गड़बड़ी के चलते अपने दावे करने के लिए इसी तरह के हथकंडे अपनाने पर जोर दे रही है. जाहिर है सीसीपी मानती है कि इतिहास के प्रति अपनी एकतरफा व्याख्या और अपनी सुविधा के हिसाब से वो अपने एकसूत्रीय एजेंडे प्रोपेगेंडा के तहत उत्तेजित करने वाली वाली हरकतों से, अपने विस्तारवादी लक्ष्यों को प्राप्त कर लेगी. हालांकि सीसीपी और पीएलए दोनों ने इस बार प्रोफेशनल और तमाम युद्दों की तजुर्बेकार भारतीय सेना के बारे में कुछ गलतफहमी पालकर उत्तेजना बढ़ाने वाली ये हरकत कर दी थी.

इसके बावजूद कि भारतीय सेना को भी नुकसान हुआ, लेकिन दशकों बाद ये पहली बार हुआ है कि चीन की सेना को भी अपने सैनिकों की मौत देखनी पड़ी हो. छोटे से फायदे के लिए चीन ने लगता है भारत को हमेशा के लिए खो दिया और दोनों के बीच के रिश्ते दशकों पीछे चले गए हैं. एक आधुनिक संप्रभु देश की प्रोफेशनल आर्मी में जो सामान्य गुण होने चाहिए, सीसीपी की पीएलए उस 'प्रोफेशनल' ढांचे में कहीं फिट ही नहीं होती. यहां तक कि उसके नाम में जुड़े ये तीनों शब्द यानी 'पीपल्स', 'लिबरेशन' और ‘आर्मी’ कहीं से भी इसके साथ जुड़ते नहीं दिखाई देते, बल्कि आपस में ही विरोधाभासी लगते हैं.

PLA कभी भी 'लिबरेशन' के कार्य में शामिल नहीं रही
ऐसा लगता है जैसे चीनी नागरिकों की नहीं बल्कि सीसीपी की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व कर रही हो. पीपल्स लिबरेशन आर्मी कभी भी 'लिबरेशन' के कार्य में शामिल नहीं रही बल्कि इसके विपरीत इस शिनझियांग प्रांत में उइगर मुसलमानों और तिब्बत में तिब्बतियों के जाति संहार में इसे लगाया गया, ये आरोप उनके विरोधियों और वहां से सब छोड़छाड़ कर भागने वाले स्थानीय लोगों ने लगाए. गलवान घाटी की घटना समेत तमाम संघर्षों में पीएलए का आचरण पिछले कई सालों में एक आधुनिक आर्मी की तरह नहीं रहा है. बजाय इसके, पीएलए सत्तारूढ़ पार्टी का वर्दी में एक ऐसा षडयंत्रकारी गुप्त दल लगता है, जो केवल उनके हितों को पूरा करने के लिए ही बनाया गया हो.

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सीसीपी की विस्तारवादी योजनाओं को पूरा करने के लिए पीएलए काफी हद तक कमीनेपन, गंदे प्रचार, हरकतें करके झूठ बोलने और उकसावे की हरकतें करने पर निर्भर रही है. मीडिया के जरिए तमाम प्रोपेगेंडा फैलाने के बावजूद हालिया जमीनी और सामुद्रिक संघर्षों ने पीएलए के अनप्रोफेशनल रवैये, चरित्र और रणनीतिक कमियों का खुलासा कर दिया है. साउथ सूडान में 2016 में हुए एक वाकये के जरिए भी पीएलए का अनप्रोफेशनल रवैया दुनियां भर में चर्चा का विषय बना था. यूनाइटेड नेशंस के एक कैम्प की रखवाली करने वाली पीएलए के सैनिक उस वक्त अपने हथियार और साजो-सामान छोड़कर भाग खड़े हुए थे, जब साउथ सूडान के हथियार बंद लड़ाकों ने उन पर हमला बोल दिया था. जिसका नतीजा ये हुआ कि यूएन के उस मिशन में काम कर रही तमाम महिला कार्यकर्ताओं को उनकी बदतमीजी का सामना करना पड़ा और कई नागरिकों को जान से हाथ धोना पड़ा था. इस घटना ने यूएन की शांति सेनाओं की छवि पर भी बड़ा धब्बा लगा दिया था.

इन संघर्षों में भी पीएलए अपनी इज्जत बमुश्किल बचा पाई
कोरियाई प्रायद्वीप, रूस और वियतनाम में हुए संघर्षों में भी पीएलए अपनी इज्जत बमुश्किल बचा पाई थी. युद्धों के अनुभव से आने वाली ऑपरेशनल और रणनीतिक स्तर की परिपक्वता की कमी के चलते पीएलए नीतिगत मसलों में लड़ाकू रवैया रखती है. ये निश्चित है कि पीएलए की युद्धों में अनुभवहीनता उसके पड़ोसियों के लिए इसे खतरनाक बना देती है. अपनी अनुभव और प्रोफेशनलिज्म की कमी को दूर करने के लिए पीएलए गैर-पारंपरिक और असंयमित युद्ध के तरीकों और हथियारों को इस्तेमाल करती है, जैसा कि इसने गलवान घाटी में किया था. 

पीएलए खुद को दुनिया की सबसे प्रोफेशनल आर्मी बताने वाली झूठी छवि तैयार करने के लिए बहुत हद तक ग्लोबल टाइम्स और वी चैट के प्रोपेगैंडा पर निर्भर करती है.पीएलए में राजनीतिक हस्तक्षेप भी बहुत ज्यादा रहता है. मिलिट्री कमीशन का चेयरमेन सीसीपी का नेता भी है. पीएलए के सारे बड़े निर्णय चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की कमेटियों द्वारा लिए जाते हैं, जिनमें दबदबा योग्यता से बढ़े प्रशिक्षित मिलिट्री ऑफिसर्स का नहीं बल्कि राजनीतिक झुकाव वाले 

मिलिट्री ऑफिसर्स का होता है. सीसीपी का कोई राजनीति विरोधी नहीं है, ये पीएलए पर पूरा नियंत्रण रखती है. परिपक्व लोकतांत्रिक देश भारत में ऐसा नहीं है, जहां सेनाएं राजनीतिक हस्तक्षेप से दूर रखी जाती हैं. पीएलए के सभी कैरियर ऑफिसर्स सीसीपी के सदस्य भी होते हैं, और एक स्थानीय विभाग का अध्यक्ष तक भी मिलिट्री कमांडर से मजबूत हैसियत रखता है. सभी के फायदे के लिए मिलिट्री ऑफिसर्स और सीसीपी नेताओं को एक साथ रखने वाली व्यवस्था बनाई गई है.

पीएलए प्रोफेशनल लड़ने वाली सेना नहीं
एक चीनी सैनिक शामिल होते वक्त पीएलए के प्रति निष्ठा की शपथ लेता है, ना कि चीन के संविधान के प्रति. हाल ही में पीएलए डेली में पीएलए के जनरल पॉलटिकल डिपार्टमेंट का एक लेख छपा, इस लेख मे लिखा था कि आर्मी जवानों का प्रमोशन या प्लेसमेंट करते वक्त सतर्कता और बढ़ाए. जनरल पब्लिक डिपार्टमेंट जिस पर अनुशासन से जुड़े मामलों और मानव संसाधन विभाग की जिम्मेदारी है, ने लिखा कि आर्मी अफसरों की समीक्षा इस आधार पर होनी चाहिए कि उन्होंने 'शी जिनपिंग के निर्देशों का कितना पालन किया', 'सिद्धांतों के बड़े मुद्दों पर उनका रुख' क्या था और 'धन और प्रसिद्धि को लेकर उनका रवैया' कैसा है.

ये पर्याप्त साक्ष्य हैं, ये साबित करने के लिए कि पीएलए एक प्रोफेशनल लड़ने वाली सेना नहीं है. इसके बजाय पीएलए को इस तरह से समझना चाहिए कि ये 'सीसीपी की आर्म्ड विंग' है. पीएलए को ये उपाधि देने के लिए इतिहास के कई वाकए शामिल हैं और हाल ही के वर्षों में इसकी हरकतों ने इस धारणा की पुष्टि ही की है. 

पीएलए की इस प्रकृति को समझने से इसके नाराज पड़ोसी जमीन और समुद्र में सीसीपी की आक्रामक और उकसाने वाली हरकतों के खिलाफ सफल रणनीति बनाने में समर्थ होंगे. अब पीएलए या पार्टी की तरफ झुकाव वाले सहयोगी को अपने सच्चे मिजाज के हिसाब से अपना नाम बदलकर सीसीपी की आर्मी, सीसीपी की नेवी और सीसीपी की एयरफोर्स रख लेने चाहिए.