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क़िस्सा-ए-कंज़्यूमर: जिंदगी के साथ, लेकिन जिंदगी के बाद नहीं!

याद रखिए- बीमा का पूरा खेल आपके भरोसे पर चलता है, भरोसा तोड़ना ठीक नहीं.

क़िस्सा-ए-कंज़्यूमर: जिंदगी के साथ, लेकिन जिंदगी के बाद नहीं!

मुंबई का किस्सा है. एक भाई साहब थे. उनकी पत्नी का देहांत हो गया. कैंसर से. उन्होंने 5 लाख का जीवन बीमा ले रखा था. किसी ऐसी-वैसी कंपनी से नहीं, एलआईसी से. लेकिन जरूरत पड़ी तो बीमा कंपनी रकम देने से मुकर गई. क्यों भई? कंपनी का कहना था कि जिस वक्त इन्हें पॉलिसी इश्यू की गई उस वक्त इन्हें बीमारी की जानकारी थी लेकिन इन्होंने बताया नहीं. यानी जानकारी छुपा ली. धोखा किया. लिहाजा हम पैसे नहीं देंगे. बीमा कंपनी के रुख से झल्लाए भाई साहब कोर्ट पहुंचे. पहले छोटे कंज्यूमर कोर्ट गए, केस हार गए. फिर उससे बड़ी अदालत गए, वहां भी हार गए.

चूक कहां हुई?
अदालत में जिरह के दौरान साबित हुआ कि कैंसर का पता चला था 22 जुलाई  2011 को. और इंश्योरेंस पॉलिसी इश्यू की गई 30 जुलाई 2011 को. यानी बीमारी का पता चलने के 8 दिन बाद. लेकिन भाई साहब ने कंपनी को कुछ नहीं बताया. क्यों नहीं बताया? अब इसको ज़रा गौर से सुनियेगा. भाई साहब ने सोचा कि पॉलिसी के लिए प्रपोज़ल फॉर्म तो मैं भरकर भेज चुका हूं, यानी कागज तो जा चुका है, अब तो पॉलिसी इश्यू हो ही जाएगी. इसके बाद अगर कुछ ऊंच-नीच पता चली तो कंपनी की जिम्मेदारी. कुछ बताने की जरूरत क्या है?

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आखिर पॉलिसी इश्यू होने के बाद भी तो बीमारी हो सकती है! लेकिन दिक्कत ये है कि बीमारी का पता पॉलिसी इश्यू होने के बाद नहीं चला, पॉलिसी का प्रपोजल भरने के बाद चला. अदालत में ये बात साबित हो गई. अदालत ने भी मान लिया- भाई साहब ने गड़बड़ की, समय रहते साफ-साफ बता देना चाहिए था. दिसंबर 2018 में ये किस्सा मीडिया के सामने आया.  

हम गलती कहां करते हैं?
जब भी हम कोई जीवन बीमा पॉलिसी लेते हैं, मेडिकल इंश्योरेंस लेते हैं या फिर टर्म इंश्योरेंस लेते हैं तो आम तौर पर बीमा कंपनी हमसे लंबा चौड़ा फॉर्म भरवाती है. उसमें ढेर सारे सवाल होते हैं. मसलन- आपको कोई बीमारी तो नहीं? किसी तरह का इलाज तो नहीं चल रहा? परिवार में किसी बीमारी की हिस्ट्री तो नहीं? आपको शुगर या ब्लड प्रेशर तो नहीं? है तो कितना है? सिगरेट तो नहीं पीते? शराब तो नहीं पीते? पीते हैं तो कितना पीते हैं?

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अब होता ये है कि आपकी इस स्वघोषित मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर आपके पॉलिसी की कीमत तय होती है. कोई बीमारी है या सिरगरेट शराब जैसे शौक हैं तो प्रीमियम बढ़ जाता है. इसी प्रीमियम पर पैसे बचाने के लिए हम कई बार जानबूझकर कुछ बातें छुपा जाते हैं, या यूं कहें कि ईमानदारी से पूरी जानकारी नहीं देते. याद रखिए- बीमा का पूरा खेल आपके भरोसे पर चलता है, भरोसा तोड़ना ठीक नहीं.

सबक क्या है?
कोई भी कंपनी हो, सरकारी या प्राइवेट वो मूल रूप से बिजनेस करने के लिए होती है, मुनाफा कमाने के लिए होती है. आप ये मानकर चलें तो बेहतर होगा कि कंपनी अपने मुनाफे के लिए आपका क्लेम रिजेक्ट करने के लिए बहाने ढूंढती है, लूप-होल्स तलाशती है. इसलिए आप अपनी तरफ से हरगिज़ ये मौका न दें. जो कुछ है, जैसा है, साफ-साफ बताएं.

जिस कंज़्यूमर की कहानी आपको बताई उससे सबसे खास सबक ये है कि प्रपोज़ल फॉर्म भर देने के बाद भी, कंपनी की तरफ से आपका मेडिकल टेस्ट हो जाने के बाद भी अगर आपको पॉलिसी इश्यू नहीं हुई है और इस बीच किसी गंभीर बीमारी का पता चलता है तो बीमा कंपनी को फौरन जानकारी दे दें. बताने का जो भी फौरी नतीजा होगा देखा जाएगा. हो सकता है कंपनी पॉलिसी देने में ना-नुकुर करे, हो सकता है प्रीमियम बहुत महंगा कर दे. लेकिन कम से कम पॉलिसी धारक के गुज़र जाने के बाद कंपनी की तरफ से झटका लगने की गुंजाइश तो नहीं रहेगी!

(लेखक गिरिजेश कुमार ज़ी बिज़नेस से जुड़े हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)