डियर जिंदगी : आपको भी निर्णय नहीं लेने की आदत है!

जब बात अपनी हो, अपने बारे में फैसले करने की हो तो हम एकदम से बैकफुट पर चले जाते हैं. इतने पीछे की कई बार ‘अंपायर’ की बात सुनकर भी क्रीज पर नहीं लौटते. बल्कि इसे इस तरह से समझिए कि लौट ही नहीं पाते. क्‍योंकि पांव पर ‘अ’निर्णय की जंजीरें पड़ी रहती हैं.

डियर जिंदगी : आपको भी निर्णय नहीं लेने की आदत है!

दूसरों के बारे में कोई फैसला नहीं करना, उनकी मदद नहीं करने को गलत कहा जा सकता है, लेकिन जब कोई अपनी ही मदद न करना चाहे तो उसे क्‍या कहना चाहिए! भारतीय कुछ विषयों के जन्‍मजात विशेषज्ञ होते हैं. जैसे क्रिकेट और राजनीति. इन दोनों पर आपको लोग ऐसे राय बनाते\निर्णय सुनाते दिख जाएंगे कि आपको लगेगा कि इनसे बेहतर कौन है.

लेकिन जब बात अपनी हो, अपने बारे में फैसले करने की हो तो हम एकदम से बैकफुट पर चले जाते हैं. इतने पीछे की कई बार ‘अंपायर’ की बात सुनकर भी क्रीज पर नहीं लौटते. बल्कि इसे इस तरह से समझिए कि लौट ही नहीं पाते. क्‍योंकि पांव पर ‘अ’निर्णय की जंजीरें पड़ी रहती हैं. हम बस सोचते रहते हैं. कुछ करते नहीं. बातें करना भारतीयों का प्रिय शगल रहा है, इसमें कोई बुराई नहीं, जब तक आप केवल बातें ही न करते रह जाएं.

‘जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल’ में इस बार कम से कम ऐसे पच्‍चीस से तीस लोगों से मुलाकात हुई, जो पिछली मुलाकातों में भी थे. इनमें से लगभग सभी वैसे ही हैं, जैसे एक दशक से हैं.

केवल दो बदले हुए मिले. एक ने पत्रकारिता को छोड़कर अपने उस सपने की राह पकड़ी जिसके लिए वह दो दशक से तैयारी कर रहे थे. वह अब अपने उस सपने के सुपरिचित चेहरे हैं, जो वह होना चाहते थे. तो दूसरे वह जिन्‍होंने एक दशक पहले नौकरी छूट जाने के बाद नौकरी नहीं करने का फैसला किया. क्‍योंकि वह उस सपने के पीछे हाथ धोकर पड़ जाना चाहते थे, जो उन्‍होंने लगभग बचपन से पाल रखा था.

यह भी पढ़ें- डियर जिंदगी : जयपुर लिटरेचर फेस्‍टिवल; रास्‍ता न सही पगडंडी सही…

इन दोनों ने अपना सबकुछ दांव पर लगाकर उस ओर जाने का निर्णय किया, जहां जाने की योजना, तैयारी वह अपने अवचेतन में दशकों से कर रहे थे. यहां योजना और तैयारी के अंतर को समझना होगा. हम भारतीय ज्‍यादातर योजना ही बनाते रहते हैं. योजना में जब तक तैयारी नहीं होगी, वह बस ख्‍याली पुलाव बनकर रह जाएगी. तैयारी के लिए हमें उस चीज़़ में अपना कौशल विकसित करने की जरूरत है, जो हम होना चाहते हैं. जिसके कुछ लक्षण तो हमारे भीतर हैं, लेकिन हम वह होने के लिए उन लक्षणों को हुनर में बदलना चाहते हैं. इसे ही तैयारी कहा करते हैं.

यह भी पढ़ें- डियर जिंदगी : समाधान 'भीतर' ही हैं...

एक दशक से परिचित चेहरों के बीच केवल दो ऐसे लोगों से भेंट हुई, जिन्‍होंने सपनों की सवारी करने का फैसला किया और मुश्किलों से ‘लोहा’ लेना तय किया. जिंदगी में आसानी से केवल वही मिलता है, जो किसी को भी मिल सकता है. और जो सबको मिल सकता है, उसे हासिल करने से हमारा कोई ख्‍वाब अपने अरमानों की मंजिल तक नहीं पहुंच सकता.

इसलिए निर्णय लेने वाले हमेशा कहीं न कहीं पहुंचते ही हैं. वह भटक सकते हैं, तूफानों में फंस सकते हैं. जिंदगी संकट में पड़ सकती है. लेकिन कहानी के अंत में वही विजेता होते हैं, क्‍योंकि उन्‍होंने निर्णय लेने का फैसला किया है.

जो भी करना है, होना है. वह निर्णय से करिए. दूसरों के निर्णय, इच्‍छा से नकल करके हम कुछ नहीं सीखते. यह भी नहीं कि नकल करने से कुछ हासिल नहीं होता.

एक मित्र हैं. क्रिकेट, हॉकी और लगभग सभी खेलों के जानकार हैं. सबने प्रयास किया कि वह अपनी ऐसी नौकरी से बाहर आ जाएं, जहां न पहचान है, न ही आगे का ऐसा रास्‍ता जिसकी चाह में ‘पथिक’ उम्र गुजार दे. वह कोई पांच बरस से योजना बना रहे हैं. सोच रहे हैं. जब उनसे कहा जाता है कि अभी आ जाओ. तो वह कहते हैं कि अभी कैसे! सोचने का समय दो.

यह भी पढ़ें- डियर जिंदगी : तनाव और 'अ'सोशल टेक्‍नोलॉजी

और जब सोचने का समय दिया जाता है तो वह कोई छह-सात महीने, बरस तक सोच ही नहीं पाते. अपने सपने और उस राह, चाह के सफर में सबसे बड़ी बाधा वह खुद हैं. क्‍योंकि अपने सपने के लिए कोई जोखिम नहीं चाहते. असल में बात उतनी जोखिम की नहीं, जितनी निर्णय की है.

निर्णय लेना एक आदत है. गौर से देखिए. कैसे कुछ लोग छोटी-छोटी चीजों में निर्णय ले लेते हैं. घूमना है. खाना है. सिनेमा देखना है. पढ़ना है. नहीं पढ़ना है. नहीं घूमना है. बात नहीं करनी है.

और बहुत से लोग इसी सोच में दिन, महीने गुजार देते हैं कि करे या न करें.

निर्णय लेने का जितना असर भौतिक है, उससे कहीं अधिक यह सीधे हमारे अवचेतन मन और संकल्‍प शक्ति से जुड़ा है. जो निर्णय नहीं ले पाते, वह धीरे-धीरे बिना किसी के जाने और बताए भीतर से कमजोर पड़ते जाते हैं. अनिर्णय में रहना, गलत निर्णयों की लंबी कतार से कहीं अधिक घातक है.

यह भी पढ़ें-  डियर जिंदगी : 'जागते' रहो को भूलते हुए...

इसलिए निर्णय लीजिए. जो भी राह चुनिए निर्णयपूर्वक चुनिए. अपने निर्णय पर अटल रहिए. निर्णय लेने और निरंतर लेते रहने की आदत हमें भीतर से साफ, सक्षम, स्‍वतंत्र और सुंदर बनाती है. निर्णय लेने की आदत कुछ और नहीं हमारे भीतर चेतना का दीया जलते रहना है. जो निर्णय नहीं ले पाते, वह भीतर से कमजोर, दुखी और बीमार होते जा रहे हैं.

इसलिए अपने मित्रों और परिवार को निर्णय लेने का अभ्‍यास कराइए. यह उनके जीवन के लिए नई सुबह जैसा है, क्‍योंकि हम ऐसे ही लोगों से घिरे हैं, जो बस निर्णय टालते रहते हैं.

उम्‍मीद है, आप कोई तो निर्णय लेगें ही.

सभी लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें : डियर जिंदगी

(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

(https://twitter.com/dayashankarmi)

(अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें: https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)