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डियर जिंदगी: हिम्‍मत कहां से मिलेगी!

हम अपने सपने के लिए कितने पागल हैं, बच्‍चों की दिशा तय करने में यह पागलपन सबसे अधिक भूमिका निभाता है. इसमें योग्‍यता जितना ही यह जरूरी है कि आप कितना जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं.

डियर जिंदगी: हिम्‍मत कहां से मिलेगी!

हम सब उम्र के अलग-अलग मोड़ पर जिंदगी में किसी न किसी से प्रेरणा लेते हैं. प्रेरणा परिचित और अपरिचित दोनों जग‍ह से मिल सकती है. इसके लिए किसी व्‍यक्‍ति के संपर्क में आना जरूरी नहीं है, लेकिन हिम्‍मत के साथ ऐसा नहीं है! हम दूसरों की सफलता की कहानी पढ़ते ही उसके जैसा काम करने के लिए प्रेरि‍त होते हैं, लेकिन उस मंजिल तक जाने के लिए प्रेरणा से अधिक हौसले की जरूरत होती है, सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह हौसला, हिम्‍मत कहां से आएगी. यह कहां मिलेगी?

एक सरल उदाहरण से समझते हैं. हम मीडिया में एक सत्रह बरस के बच्‍चे सचिन तेंदुलकर के सफल होने की कहानी पढ़ते हैं. उसे मिल रही शोहरत, पैसा हमें प्रेरित करता है कि हम बच्‍चों को खेल की ओर प्रेरित करें, लेकिन उसे मैदान पर भेजने के दौरान हमें याद आता है कि बच्‍चे का स्‍कूल छूट जाएगा, उसकी पढ़ाई रुक जाएगी. यह तो बड़ा भारी जोखिम है! मध्‍यमवर्गीय परिवार के सामने विकल्‍प नहीं है. बच्‍चे के खेलने से उसकी खर्चे बढ़ेंगे, उसकी नौकरी की संभावनाएं स्‍कूल की जगह मैदान पर तय होंगी. फिर क्रिकेट में तो पहले से ही इतने बच्‍चे हैं.

डियर जिंदगी: तनाव में आप क्‍या करते हैं...

ये सवाल आधे से अधिक बच्‍चों को तो मैदान पर जाने से पहले ही रोक लेते हैं. असल में मैदान में जो हैं और जो नहीं हैं, इन दोनों की सामाजिक-आर्थिक हैसियत में अधिक अंतर नहीं होता. अंतर अगर होता है तो केवल सोच, साहस में. हम अपने सपने के लिए कितने पागल हैं, बच्‍चों की दिशा तय करने में यह पागलपन सबसे अधिक भूमिका निभाता है. इसमें योग्‍यता जितना ही यह जरूरी है कि आप कितना जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं.

यह तो हुई परिवार की बात. अगर माता-पिता बच्‍चे के सपने के जोखिम को पूरा करने से पीछे हट रहे हैं, जबकि वह ऐसा कर सकते हैं, तो उन्‍हें समझाया जा सकता है. संवाद से ही रास्‍ते निकलते हैं. लेकिन इस बीच हमें मिले ईमेल और संदेशों में अधिकांश ऐसी छात्राओं, लड़कियों के हैं, जो पढ़ना और करियर बनाना चाहती हैं, लेकिन परिवार अभी भी सामंती विचार छोड़ने को तैयार नहीं हैं. उनके लिए लड़कियां दूसरे दर्जे की ही नागरिक हैं. उन्‍हें अभी भी बेटियों को बराबरी का हक देने के लिए सौ बार सोचना पड़ रहा है.

डियर जिंदगी : अपनी जिंदगी में दूसरे का ‘हिस्‍सा’

ऐसी सोच साक्षरता से नहीं आती. इसके लिए समाज का शिक्षित होने के साथ अपने दिमाग की खिड़की को दुनिया के लिए खोलना कहीं अधिक जरूरी है.

तो इन लड़कियों को हिम्‍मत कहां से मिलेगी. कहां से लेनी चाहिए! इन सबको सबसे पहले काम के रूप में खुद को भीतर से मजबूत करना होगा. बात-बात पर दुखी होकर घर बैठने और माता-पिता की हर बात मानने से बात नहीं बनेगी. आपको अपने हक के लिए बड़ों को समझाना होगा. उनके न समझने पर उनके साथ संघर्ष भी करना पड़ेगा.

डियर जिंदगी: बेशकीमती होने का अर्थ!

बड़ों का सम्‍मान करना और उनके हर फैसले को मानने में बड़ा अंतर होता है. हमें इस अंतर को स्‍वीकार करना होगा. इसे जीवन में उतारना होगा, बिना इसके बात नहीं बनेगी.

अपने हिस्‍से की हिम्‍मत, आपको खुद उठानी होगी. तभी आप अपनी आंखों में बुन रहे ख्‍वाबों को जिंदगी में उतार पाएंगी. अपने सपनों के लिए दुनिया से लोहा लेने से कहीं अधिक मुश्किल काम है, अपनों को उस बात के लिए तैयार करना, जिसके लिए उनके दिमाग में 'न' है.

मन, ‍दिमाग और घर की दीवारों पर लिखकर टांग दीजिए. जिनका जिंदगी में विरोध नहीं होता. उनकी उम्र लंबी भले हो, लेकिन जिक्र हमेशा छोटा होगा. समाज में उनका कोई योगदान नहीं होता. इसलिए जितना हो सके, विरोध सहने की शक्ति बढ़ाइए.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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